Mar 27, 2026
शास्त्रों के मुताबिक, भगवान राम का जन्म अभिजीत मुहूर्त में दोपहर 12 बजे हुआ था। इसलिए इसी समय सूर्य तिलक किया जाता है। दोपहर में सूर्य ठीक शीर्ष पर होता है, जिससे उसकी किरणें पूरी तीव्रता के साथ सीधे पृथ्वी पर पड़ती हैं। यही वह सटीक समय है जब सूर्य की रोशनी को बिना किसी बाधा के भगवान के मस्तक तक पहुंचाया जा सकता है।
Credit: The Sootr
साल 2026 का यह सूर्य तिलक कार्यक्रम कुल 9 मिनट तक चला। इसकी शुरुआत ठीक दोपहर 12 बजे हुई और यह 12:09 बजे तक जारी रहा। इस दौरान सूर्य की किरणें निरंतर रामलला के ललाट पर चमकती रहीं, जिसे देख श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए। पहली बार यह ऐतिहासिक परंपरा साल 2024 में शुरू हुई थी, जो अब हर साल रामनवमी का मुख्य आकर्षण बन गई है।
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56 भोग और पंचामृत का अर्पण जन्मोत्सव के इस पावन मौके पर भगवान को बेहद खास भोग लगाया गया। इसमें 5 क्विंटल पंजीरी और 56 प्रकार के विभिन्न व्यंजन शामिल थे। इसके साथ ही प्रभु को पंचामृत का भोग भी लगाया गया। इसे बाद में भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। प्रभु रामलला को अत्यंत सुंदर और भव्य स्वर्ण जड़ित पीले वस्त्र (पीतांबर) पहनाए गए। इन दिव्य वस्त्रों को तैयार करने में कारीगरों को लगभग 2 महीने का समय लगा।
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विज्ञान और तकनीक का अनूठा मेल रामलला के मस्तक पर सूर्य की किरणों को केंद्रित करने के लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने विशेष लेंस और दर्पणों का उपयोग किया है। कई महीनों की मेहनत के बाद एक ऐसा सिस्टम तैयार किया गया जो सूर्य की रोशनी को परावर्तित कर ठीक 12 बजे गर्भगृह तक ले जाता है।
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सूर्यवंशी कुल की प्राचीन परंपरा भगवान राम सूर्यवंश के वंशज माने जाते हैं। इसलिए सूर्य तिलक की यह परंपरा उनके कुल और सूर्य देव के गहरे संबंध को दर्शाती है। यह इस बात का प्रतीक है कि स्वयं सूर्य देव अपने कुल के गौरवशाली नक्षत्र श्री राम का तिलक कर रहे हैं।
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