Feb 24, 2025
मान्यता है कि भगवान शिव ने अपने गणों के साथ पहली बार भस्म होली खेली थी। इस परंपरा से मृत्यु के भय से मुक्ति और शिव कृपा प्राप्त होती है।
Credit: The Sootr
रंगभरी एकादशी के अगले दिन भक्तगण चिता की राख से एक-दूसरे संग होली खेलते हैं। साधु, संत, अघोरी और शिव भक्त इस अनुष्ठान में शामिल होते हैं।
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ऐसा माना जाता है कि, ये होली जीवन और मृत्यु के चक्र को स्वीकार करने का प्रतीक है। काशी में मृत्यु को मोक्ष प्राप्ति का माध्यम माना जाता है।
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इस घाट को मोक्षदायिनी भूमि कहा जाता है, जहां अंतिम संस्कार से आत्मा मुक्त हो जाती है। यहां सदैव चिताएं जलती रहती हैं, जो जीवन की नश्वरता का संदेश देती हैं।
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मसान होली का विशेष आयोजन हर 12 साल में बड़े स्तर पर किया जाता है। इस दौरान अघोरी और तांत्रिक साधना के अनुष्ठान भी संपन्न होते हैं।
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साधु और अघोरी इस दिन विशेष रूप से शिव तांडव नृत्य करते हैं। तांत्रिक विधियों के मुताबिक, यह मृत्यु भय से मुक्ति का मार्ग है।
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बारह वर्षों के चक्र में गुरु ग्रह की स्थिति के अनुसार इसका महत्व बढ़ जाता है। इस अवधि में तंत्र-साधना और मोक्ष प्राप्ति के विशेष अनुष्ठान होते हैं।
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इस दिन पूरे घाट पर भक्त महाशिवरात्री हर-हर महादेव के जयकारे लगाते हैं। पूरा वातावरण शिवमय हो जाता है, जिससे भक्तों को अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
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वर्ष 2025 में मसान होली 11 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन भक्तगण वाराणसी में इकट्ठा होकर शिव की आराधना करेंगे और भस्म होली खेलेंगे।
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