Oct 1, 2025
रावण के 10 सिर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार (मद) और ईर्ष्या (मत्सर) जैसे दस बड़ी बुराइयों के प्रतीक थे। दशहरा पर हम इन्हीं दुर्गुणों को खत्म करने का संदेश देते हैं।
Credit: The Sootr
एक पौराणिक कहानी के अनुसार, रावण ने अपनी कठिन तपस्या में ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए दस बार अपना सिर काटकर भेंट कर दिया था। रावण की इस तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी ने उसे 10 सिरों का वरदान दिया।
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रावण एक बहुत बड़ा विद्वान था। उसके 10 सिर उसके गहन ज्ञान का भी प्रतीक थे, जिसका मतलब था कि उसे चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) और छह शास्त्रों की पूरी जानकारी थी।
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कुछ कहानियों के अनुसार, रावण के 10 सिर असली नहीं, बल्कि उसकी मायावी शक्ति का हिस्सा थे। इस शक्ति से वह लोगों में यह भ्रम पैदा कर देता था कि उसके दस सिर हैं।
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रावण को भले ही अमरता का सीधा वरदान नहीं मिला था, पर उसे एक गुप्त वरदान मिला। उसकी जान या 'अमृत' उसकी नाभि में छिपा हुआ था। यही उसकी मृत्यु का रहस्य भी था।
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दशहरा के दिन रावण के 10 सिरों को जलाया जाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है और हमें काम, क्रोध जैसी अपनी नकारात्मक आदतों को खत्म करने का संदेश देता है।
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