Jul 11, 2026
इस विशेष दिन 15 जुलाई (बुधवार) भगवान जगन्नाथ अपने चौदह दिनों के एकांतवास से बाहर आते हैं। रथ यात्रा से पहले पहली बार आम जनता को उनके दिव्य दर्शन करने का मौका मिलता है।
Credit: The Sootr
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि आज (16 जुलाई (गुरुवार)) इस महान रथ यात्रा का मुख्य शुभारंभ होता है। तीनों भाई-बहन के विशाल और भव्य रथों को खींचकर गुंडिचा मंदिर ले जाने का काम शुरू किया जाता है।
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जब भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर में विश्राम करते हैं, तब माता लक्ष्मी उनसे मिलने आती हैं। इस खास दिन (20 जुलाई (सोमवार)) को हेरा पंचमी के नाम से धूमधाम से मनाया जाता है।
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इस दिन (23 जुलाई (गुरुवार)) संध्या के समय गुंडिचा मंदिर में तीनों देवी-देवताओं के विशेष दर्शन होते हैं। इस समय भगवान के दर्शन करना बहुत ही पुण्यदायी और कल्याणकारी माना जाता है।
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इस पावन दिन (24 जुलाई (शुक्रवार)) पर भगवान की वापसी यानी उल्टी रथ यात्रा की शुरुआत होती है। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी के रथों को दोबारा मुख्य मंदिर की तरफ खींचा जाता है।
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जब तीनों रथ जगन्नाथ मंदिर के सामने पहुंच जाते हैं, तब यह अद्भुत रस्म (25 जुलाई (शनिवार)) होती है। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी को सोने के भारी आभूषणों से सजाया जाता है।
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सुना बेषा के अगले दिन (26 जुलाई (रविवार)) भगवान को एक बहुत ही स्वादिष्ट और मीठा पेय पिलाया जाता है। इस पारंपरिक पेय को अधर पना कहते हैं, जिसे घड़ों में भरकर भगवान को अर्पित करते हैं।
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यह पुरी रथ यात्रा का सबसे अंतिम (27 जुलाई (सोमवार)) और महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है। इस दिन तीनों देवी-देवताओं को दोबारा मुख्य मंदिर के गर्भगृह में रत्न सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है।डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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