बोल हरि बोल: दिल्ली वाले साहब की प्रदेश में घुसपैठ, कमिश्नर साहब की बल्लेबाजी और सूबे के पुराने सरदार की सियासत?
वहीं, कुछ अफसरों को अच्छे काम का इनाम मिलेगा और उन्हें कुर्सी नसीब होगी। संगठन का रुख करें तो बीजेपी के नए प्रदेश प्रभारी के तेवरों से पार्टी में हलचल है।
खैर, देश-प्रदेश में खबरें तो और भी हैं, पर आप तो सीधे नीचे उतर आइए और वरिष्ठ पत्रकार हरीश दिवेकर के लोकप्रिय कॉलम बोल हरि बोल (Bol Hari Bol) के रोचक किस्सों का आनंद लीजिए।
कड़वे दिनों में बदलेंगे कलेक्टर
लंबे इंतजार के बाद आखिर तबादलों की फाइल करवट लेने लगी है। खबर है कि प्रदेश में एक दर्जन से ज्यादा कलेक्टर इधर से उधर होने वाले हैं। महीने भर से सूची पक रही थी। कभी कोई राजनीतिक आयोजन आ गया तो कभी साहब व्यस्त हो गए। हर बार लिस्ट आते-आते रह गई। अब मीठे दिनों का इंतजार छोड़कर कड़वे दिनों में ही तबादलों का मुहूर्त निकाला गया है। चर्चा है कि इसी हफ्ते सूची बाहर आ सकती है।
तबादला लिस्ट में दो साल से एक ही जिले में जमे अफसरों की कुर्सी हिलना तय माना जा रहा है। इस बार लंबा सोचकर हिसाब लगाया जा रहा है। विधानसभा चुनाव तक कौन-कहां टिकेगा... इसका गुणा-भाग अभी से हो रहा है। कोशिश यही है कि ऐसी जमावट हो जाए कि चुनाव के पहले फिर कुर्सियाँ न हिलानी पड़ें। कलेक्टरों के साथ कुछ आईपीएस अफसरों की लिस्ट भी आ सकती है।
खुफिया तंत्र में घुसपैठ!
खाकी वाले साहब रिटायर होकर भले ही सलाहकार बनकर दिल्ली पहुंच गए हों, लेकिन उनका दिल अब भी प्रदेश की गलियों में ही घूम रहा है। वैसे भी खबर रखने की पुरानी आदत भला कुर्सी जाने से कहां जाती है। सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि खुफिया तंत्र के कुछ पुराने संपर्क आज भी साहब तक नेताओं और अफसरों का गुपचुप फीडबैक पहुंचा रहे हैं। साहब भी पुराने खिलाड़ी हैं। सूचना को कब और कहां इस्तेमाल करना है, यह हुनर उन्हें बखूबी आता है।
डॉक्टर साहब जब दिल्ली पहुंचते हैं तो साहब के पास बताने को कुछ नया जरूर होता है। किस नेता की चाल बदली, कौन अफसर किस तरफ देख रहा है, कौन नाराज है और कौन नजदीक आने की कोशिश में है, वे डॉक्टर साहब को सब बता देते हैं। इधर, खुफिया विभाग के मौजूदा मुखिया शायद देखो समझो और फिर आगे बढ़ो की नीति पर हैं। मुश्किल सिर्फ इतनी है कि उनकी टीम के कुछ खिलाड़ी एक मैदान में खेलकर स्कोर कहीं और भी भेज रहे हैं।
लास्ट ओवर में तूफानी पारी...
एक कमिश्नर साहब ने रिटायरमेंट से पहले ऐसा बल्ला घुमाया है कि पुराने खिलाड़ी भी देखते रह गए हैं। पारी का आखिरी ओवर था, इसलिए सिंगल और डबल में समय खराब करने का सवाल ही नहीं था। चर्चा है कि साहब ने हर गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजने की ठान ली थी। कमिश्नरी रात नौ-नौ बजे तक गुलजार रही। सालों से फाइलों में धूल खा रहे जमीन के मामले अचानक दौड़ने लगे।
सुनवाई हुई और फैसले हुए। पुरानी फाइलों को ऐसी रफ्तार मिली, जैसे उन्हें पता चल गया हो कि अब समय कम बचा है। गलियारों में इस तेजी को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी रहीं। साहब की जल्दबाजी देखकर दलाल और कुछ कर्मचारी भी सक्रिय हो गए। किसने कितनी चांदी काटी, यह तो जांच का विषय है। हां, इतना जरूर है कि आखिरी दिनों में कमिश्नरी की रौनक देखने लायक थी।
मामा के अपने क्षेत्र में कमजोर हो रहीं जड़ें
मध्यप्रदेश की राजनीति में करीब 18 साल तक बड़ा चेहरा रहे मामा के लिए अब अपने ही इलाके से चिंता की खबरें आ रही हैं। नाराजगी सीधे मामा से कितनी है, यह अलग सवाल है। उनके आसपास घूमने वाले चंगू-मंगुओं से लोगों की शिकायतें जरूर बढ़ रही हैं। स्थिति यह है कि बीजेपी का मजबूत गढ़ माने जाने वाले भेलसा में अपनेपन की पुरानी दीवार में दरारें दिखाई देने लगी हैं। खास बात यह है कि यहां विपक्ष कोई बहुत बड़ी चुनौती नहीं है। इसके बावजूद लोग सोशल मीडिया पर खुलकर बोलने लगे हैं।
उधर, मामा की अपनी परेशानी भी कम नहीं बताई जाती। कभी जिस प्रशासन के लिए उनका इशारा काफी होता था, उसी व्यवस्था में अब प्रोटोकॉल को लेकर शिकायतें सुनाई दे रही हैं। राजनीति का पहिया भी बड़ा बेरहम है। कभी काफिला देखकर सड़क खाली होती है और कभी अपने ही इलाके में रास्ता तलाशना पड़ता है।
देब की रिपोर्ट में आखिर क्या है?
बीजेपी के प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देब भोपाल आए तो बैठक रस्म अदायगी बनकर नहीं रही। मंत्रियों और नेताओं ने उनके सामने अपनी उपेक्षा का पिटारा खोल दिया। किसकी बात नहीं सुनी जाती, किसका काम अटकता है, किसकी पूछ कम हुई है, अंदर जमा बहुत कुछ बाहर आ गया। देब ने भी दुखती रग पहचानने में देर नहीं लगाई। उन्होंने सवाल ऐसे किए कि नेताओं ने मन की गांठें खोलनी शुरू कर दीं। बैठक खत्म हुई, लेकिन उसके बाद नई चर्चा शुरू हो गई।
अब सत्ता और संगठन दोनों तरफ एक ही सवाल घूम रहा है कि देब अपनी रिपोर्ट में दिल्ली क्या लेकर गए हैं? किसकी तारीफ लिखी है, किसकी शिकायत लिखी है, किसकी कुर्सी मजबूत बताई है और किसके नीचे की जमीन कमजोर। असली बेचैनी इसी बात को लेकर है। एक बात देब ने पहली ही बैठक में साफ कर दी कि वे सिर्फ नाम के प्रदेश प्रभारी बनकर आने-जाने वाले नहीं हैं। तार भी छेड़ेंगे और जरूरत पड़ी तो सुर भी बदलवाएंगे।