AI से बच्चों की सोचने की क्षमता पर असर, खो रहे थिंकिंग स्किल, MIT मीडिया लैब की स्टडी में खुलासा
अब छात्र अपनी पढ़ाई और होमवर्क के लिए AI पर पूरी तरह से निर्भर होते जा रहे हैं। MIT (Massachusetts Institute of Technology, US) मीडिया लैब की एक स्टडी में हैरान कर देने वाली रिपोर्ट सामने आई है। AI का ज्यादा इस्तेमाल करने से यूजर्स का दिमाग कमजोर हो रहा है।
डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि, इससे छात्रों की क्रिटिकल थिंकिंग (गंभीर सोच) खत्म हो सकती है। भारत में 24 साल से कम उम्र के युवा सबसे ज्यादा ChatGPT का इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर AI को क्लासरूम में सही नीति के बिना लाया गया तो ये खतरनाक साबित हो सकता है।
छात्रों की पहली पसंद बना AI
गुरुग्राम की 14 साल की साची अग्रवाल पिछले साल से Claude, Perplexity AIऔर ChatGPT इस्तेमाल कर रही थीं। पहले यह सिर्फ मदद के लिए था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनकी पहली जरूरत बन गई।
साची के स्कूल द श्री राम स्कूल अरावली में उनके दोस्तों के साथ भी यही हो रहा था। कोर्सवर्क, ट्यूशन, मॉडल यूएन और कम्युनिटी सर्विस का दबाव देखकर छात्रों को AI आसान तरीका लगता था। साची कहती हैं कि मेरी सोच रोबोट जैसी हो गई थी।
असल खतरा तब सामने आया जब उनकी इंग्लिश टीचर ने उनसे एक एनालिसिस पर सवाल किया। साची के पास इसका कोई जवाब नहीं था क्योंकि वह विश्लेषण AI ने किया था उन्होंने खुद नहीं किया था।
MIT स्टडी ने खोली आंखें
MIT मीडिया लैब की स्टडी Your Brain on ChatGPT ने हैरान कर देने वाले नतीजे दिए। जो छात्र निबंध लिखने के लिए ChatGPT पर निर्भर थे, वे दिमागी भाषा और प्रैक्टिकल हर पहलू में कमजोर पाए गए। वहीं जो छात्र सिर्फ गूगल या कोई और टूल नहीं इस्तेमाल करते थे वे सबसे बेहतर पाए गए।
स्टडी की लीड ऑथर नटालिया कोस्म्याना ने टाइम मैगजीन से कहा कि, एलएलएम (Large Language Model) को बिना पूरी जांच के बाजार में उतार दिया गया। उनकी चिंता ये थी कि युवाओं का दिमाग अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ है। अभी युवाओं का दिमाग विकास की अवस्था में है। इस पर AI का लंबे समय तक गहरा असर हो सकता है।
यह स्टडी अभी पीयर रिव्यू से नहीं गुजरी है और इसमें सिर्फ 54 लोग शामिल थे। इसे जल्द ही जारी करने के पीछे AI के तेज प्रसार की चिंता थी।
दिमाग पर क्या असर पड़ता है?
मुंबई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सिद वारियर कहते हैं कि AI का इस्तेमाल दोनों तरफ (एआई के फायदे और नुकसान) जा सकता है। बचपन से AI के साथ बड़े हुए हैं तो इसे बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं।
वहीं यदि शुरुआत से ही सोचना बंद कर दिया तो दिमाग उन स्किल्स को विकसित क्यों करेगा? उन्होंने फोन नंबर याद न करने का उदाहरण दिया।
जब से फोन में नंबर सेव होने लगे हैं हम भूलने लगे हैं। इसे ही कॉग्निटिव ऑफलोडिंग (Cognitive Offloading) कहते हैं। यानी हम अपना दिमाग का काम मशीन को सौंप देते हैं। इससे हमारी फोकस करने विश्लेषण करने और सवाल पूछने की क्षमता कम हो जाती है।
AIIMS दिल्ली के साइकियाट्री प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर कहते हैं कि युवाओं का दिमाग न्यूरोप्लास्टिक होता है। यानी यह अभी भी बदलने और विकसित होने में सक्षम है। विकास के दौरान जो अनुभव मिलते हैं वही दिमाग की बनावट को प्रभावित करते हैं।
इन अनुभवों की जगह AI ले लेगा तो हमारी याददाश्त और क्रिएटिविटी दोनों पर असर पड़ सकता है।
सोशल मीडिया से सीखें सबक
LLM का व्यापक इस्तेमाल भले नया हो पर सोशल मीडिया का असर पहले से जांचा जा चुका है। 2024 में नेचर जर्नल में छपी एक स्टडी ने बताया था कि, सोशल मीडिया का लंबे समय तक इस्तेमाल बच्चों में ध्यान भटकने की समस्या बढ़ाता है। इससे पढ़ाई और होमवर्क से भी मन उचटने लगता है।
डॉ. वारियर कहते हैं कि अभी समाज में दिमागी गिरावट नजर नहीं आ रही है, लेकिन किसी भी तकनीक का असर दिखने में वक्त लगता है। जिस दिशा में हम जा रहे हैं वह बिल्कुल साफ है।
भावनाएं हमारे दिमाग की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती हैं लेकिन उन्हें संभालने के लिए हमें कॉग्निटिव स्किल्स की जरूरत होती है। इन स्किल्स के बिना फैसले गलत हो सकते हैं। साथ ही इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।
क्लासरूम में AI की दस्तक
OpenAI ने अगस्त में भारत में लर्निंग एक्सेलेरेटर लॉन्च किया था। इसके तहत पांच लाख ChatGPT लाइसेंस छात्रों और शिक्षकों को दिए जाएंगे। सरकारी स्कूलों के छात्र भी इसमें शामिल हैं।
पुणे, बेंगलुरु और हैदराबाद में स्थित इंडस इंटरनेशनल स्कूल ने 2019 में ही AI-संचालित ह्यूमनॉइड रोबोट को सहायक शिक्षक बना लिया था। स्कूल का कहना है कि इससे हर साल औसत छात्र प्रदर्शन 15% बेहतर हुआ है। अब यह रोबोट पूरी तरह से कन्वर्सेशनल जेनरेटिव AI पर काम कर रहा है।
ChatGPT-5 का स्टडी मोड भी आया है। यह पूरे जवाब देने की जगह छात्रों को कदम-दर-कदम सोचने पर मजबूर करता है। यह एक सकारात्मक बदलाव है।
भारत में समान पहुंच की चुनौती
डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन के संस्थापक ओसामा मंजर भी चेतावनी देते हैं कि, AI पर ज्यादा जोर उन छात्रों को पीछे छोड़ सकता है, जिनके पास इंटरनेट और डिजिटल संसाधन नहीं हैं।
NEP (National Education Policy में समावेशिता की बात की गई है, लेकिन अगर शिक्षकों को सही तरीके से प्रशिक्षण नहीं मिला तो डिजिटल शिक्षा का उल्टा असर हो सकता है।
एकलव्य फाउंडेशन के संस्थापक राजू केंद्रे एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हैं। वे कहते हैं कि मौजूदा LLM मॉडल शहरी और उच्च आय वर्ग की सोच पर आधारित हैं।
उनका सुझाव है कि भारत को अपना खुद का AI मॉडल बनाना चाहिए, और सरकार को नीति और निगरानी के जरिए इसमें मौजूद पूर्वाग्रहों को सुधारना चाहिए।
साची की वापसी, अपनी सोच की तरफ
अपनी उस शर्मनाक घटना के बाद साची ने एक बहुत जरूरी फैसला लिया। अब वह AI का इस्तेमाल सिर्फ पढ़ाई के लिए करती हैं असाइनमेंट बनाने के लिए नहीं। उन्होंने ChatGPT को फाइनमेन तकनीक (Feynman Technique) के जरिए भारत के चुनाव आयोग के बारे में सिखाने के लिए कहा न कि लिखने के लिए।
साची कहती हैं कि पहले सोचती थीं यह असाइनमेंट 10 साल बाद किसी काम नहीं आएगा तो क्यों मेहनत करें। अब समझ आया कि सब कुछ जुड़ा हुआ है। प्राथमिकताएं लिखना और सोचकर काम करना यही असली बदलाव है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर हर उस परिवार, शिक्षक और नीति निर्माता के लिए जरूरी है जो भारत के युवाओं के भविष्य की चिंता करता है। AI तकनीक तेजी से शिक्षा में घुस रही है। इसके दीर्घकालिक असर पर बहस अभी शुरू भी नहीं हुई है।
जब MIT जैसी संस्था यह कह रही हो कि AI पर निर्भरता दिमाग को कमजोर करती है, तो यह सिर्फ एक रिसर्च पेपर नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक चेतावनी है।
भारत में पहले से ही डिजिटल विभाजन मौजूद है। अगर AI आधारित शिक्षा को बिना समान पहुंच और बिना प्रशिक्षित शिक्षकों के लागू किया गया, तो यह संविधान में दिए गए समान शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है। यह खबर हमें यह सिखाती है कि तकनीक का इस्तेमाल सोच-समझकर करना चाहिए, न कि अंधाधुंध।
FAQ
- क्या AI का इस्तेमाल करने से सच में बच्चों का दिमाग कमजोर होता है?
MIT मीडिया लैब की स्टडी 'Your Brain on ChatGPT' के अनुसार, जो छात्र निबंध लिखने के लिए ChatGPT पर निर्भर रहे, वे न्यूरोलॉजिकल और भाषाई परीक्षणों में उन छात्रों से पिछड़ गए जिन्होंने AI का इस्तेमाल नहीं किया। न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सिद वारियर के अनुसार, अगर बचपन में ही सोचने का काम AI को सौंप दिया जाए, तो दिमाग उन स्किल्स को विकसित करना बंद कर देता है। यह उसी तरह है जैसे फोन में नंबर सेव होने के बाद हम याद करना छोड़ देते हैं। AIIMS दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. राजेश सागर के मुताबिक युवाओं का दिमाग अभी विकसित हो रहा होता है। इस दौरान मिलने वाले अनुभव ही उसकी संरचना तय करते हैं। इसलिए AI पर अत्यधिक निर्भरता याददाश्त और क्रिएटिविटी दोनों को प्रभावित कर सकती है। - छात्रों को AI का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए ताकि नुकसान न हो?
AI को सोचने की जगह, सोचने में मदद करने वाले टूल की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे गुरुग्राम की साची अग्रवाल ने किया, उन्होंने ChatGPT को फाइनमेन तकनीक से किसी विषय को समझाने के लिए कहा, न कि असाइनमेंट लिखवाने के लिए। ChatGPT-5 का स्टडी मोड भी यही करता है, यह पूरा जवाब देने की बजाय छात्र को सोचने पर मजबूर करता है। एक्सपर्ट सुझाव देते हैं कि AI को अंतिम विकल्प की तरह इस्तेमाल करें, पहले खुद सोचें, लिखें, फिर जरूरत हो तो AI से जांच कराएं। यह तरीका दिमाग को सक्रिय रखता है और क्रिटिकल थिंकिंग को बचाता है। - भारत में AI शिक्षा से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
भारत में तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, डिजिटल विभाजन, जहां गांवों और दूर-दराज के इलाकों में इंटरनेट और डिजिटल संसाधन नहीं हैं। ऐसे में AI पर आधारित शिक्षा इन छात्रों को और पीछे छोड़ सकती है। दूसरी, शिक्षकों की तैयारी, अगर शिक्षकों को AI टूल्स के सही इस्तेमाल का प्रशिक्षण नहीं दिया गया तो यह तकनीक फायदे की जगह नुकसान करेगी। तीसरी, LLM में मौजूद पूर्वाग्रह, मौजूदा AI मॉडल ज्यादातर शहरी और उच्च आय वर्ग की सोच से बने हैं। इससे हाशिए के समुदाय खुद को AI की एकतरफा नजर से देखने लगते हैं। एकलव्य फाउंडेशन के राजू केंद्रे का सुझाव है कि भारत को अपना AI मॉडल बनाना चाहिए।
सोर्स
MIT मीडिया लैब प्रीप्रिंट स्टडी: Your Brain on ChatGPT
नेचर स्टडी: Long-term impact of digital media on brain development in children
OECD: AI Literacy Framework
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