क्या रोबोट्स और AI लेंगे मजदूरों की नौकरी? जानिए इस नए खतरे के बारे में

Sanjay Dhiman | Apr 13, 2026, 18:40 IST
Photograph: (the sootr)
AI और रोबोट्स के लिए डेटा इकट्ठा करने के बदले भारत के मजदूर कैमरे पहनकर अपनी हरकतें रिकॉर्ड करा रहे हैं। क्या यह उनके रोजगार के लिए खतरा बन सकता है?

News in Short

  • रोबोट्स की ट्रेनिंग: भारतीय मजदूर सिर पर कैमरे पहनकर AI और रोबोट्स को काम करना सिखा रहे हैं।
  • सस्ता डेटा: अमेरिका के मुकाबले भारत में इंसानी मोशन डेटा इकट्ठा करना कंपनियों के लिए बहुत सस्ता है।
  • नौकरी पर खतरा: भविष्य में यही रोबोट सिलाई और पैकिंग जैसे कामों में मजदूरों की जगह ले लेंगे।
  • डिजिटल शोषण: मजदूरों को पता भी नहीं है कि उनकी मेहनत का डेटा उनकी बेरोजगारी का कारण बनेगा।
  • भविष्य की चुनौती: टेक्नोलॉजी के इस दौर में गरीब मजदूरों के रोजगार पर बड़ा संकट मंडरा रहा है।

News in Detail

क्या आपने कभी सोचा है कि एक लोहे की मशीन (रोबोट) को यह कैसे पता चलता है कि सुई में धागा कैसे डालना है या भारी कार्टन को कैसे उठाना है? इसके पीछे की कहानी किसी फिल्मी थ्रिलर से कम नहीं है। आज भारत की छोटी-छोटी फैक्ट्रियों और गोदामों में एक अजीब सा नजारा दिख रहा है। मजदूरों के सिर पर गो-प्रो (Go-Pro) जैसे कैमरे लगे हैं। वे जो भी कर रहे हैं—चाहे वो सिलाई हो, पैकिंग हो या ईंट ढोना—सब कुछ रिकॉर्ड हो रहा है।



मजदूरों के सिर पर लगे कैमरे 'डेटा हार्वेस्टिंग' कर रहे है। इसे आसान भाषा में कहें तो यह मशीनों को "इंसानी काम" सिखाने की क्लास है। बड़ी-बड़ी AI कंपनियां भारतीय मजदूरों के "मोशन डेटा" (हिलने-डुलने का तरीका) को चुरा नहीं रहीं, बल्कि बहुत ही सस्ती दर में खरीद रही हैं।



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भारत ही क्यों बना 'डेटा हार्वेस्टिंग' का केंद्र?

अब सवाल उठता है कि ये कंपनियां अमेरिका या यूरोप क्यों नहीं जातीं? जवाब बहुत सीधा है—पैसा। अमेरिका में अगर किसी मजदूर का डेटा रिकॉर्ड करना हो, तो उसे एक घंटे के हजारों रुपए देने पड़ेंगे। लेकिन भारत में मजबूरी और सस्ती लेबर का फायदा उठाया जा रहा है।



यहां मजदूर को पता भी नहीं है कि उसके सिर पर लगा कैमरा उसकी मेहनत को डिजिटल कोड में बदल रहा है। कंपनियां इसे 'गिग इकोनॉमी' का नाम दे रही हैं, लेकिन हकीकत में यह एक ऐसी खेती है जहां फसल तो मजदूर उगा रहा है, मगर उसका अनाज कोई और ले जाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह डेटा उन रोबोट्स को तैयार करने के लिए इस्तेमाल हो रहा है जो भविष्य में इन्हीं मजदूरों की जगह लेंगे।



क्या मजदूर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं?

इस 'डेटा हार्वेस्टिंग'को लेकर अब नई बहस छिड़ गई है। क्या सरकार को इसके लिए कोई कानून नहीं बनाना चाहिए? एक तरफ हम 'डिजिटल इंडिया' की बात करते हैं, और दूसरी तरफ वही डिजिटल ताकत रोजगार छीनने की तैयारी कर रही है। जब रोबोट सिलाई करना सीख जाएगा, तो क्या कोई कंपनी किसी टेलर को पैसे देगी? जब वेयरहाउस में सामान उठाने वाला रोबोट तैयार हो जाएगा, तो क्या किसी कुली या हेल्पर की जरूरत पड़ेगी?



यह एक कड़वा सच है। आज मजदूर जिस डेटा को थोड़ी सी मजदूरी के लिए खुशी-खुशी दे रहा है, कल वही डेटा उसे बेरोजगार बना सकता है। रोबोट थकते नहीं हैं, वे छुट्टी नहीं मांगते और न ही वे यूनियन बनाते हैं। कंपनियों के लिए यह मुनाफे का सौदा होगा, लेकिन आम आदमी के लिए यह खतरे की घंटी है।



सरकार और कंपनियों का पक्ष: क्या यह नया अवसर है?

कंपनियां तर्क देती हैं कि AI आने से नए तरह के काम पैदा होंगे। वे कहती हैं कि किसी को उन रोबोट्स को रिपेयर भी तो करना होगा। लेकिन एक अनपढ़ या कम पढ़ा-लिखा मजदूर जो आज बोझा ढो रहा है, क्या वह रातों-रात रोबोटिक इंजीनियर बन जाएगा?



हमें यह समझना होगा कि टेक्नोलॉजी का स्वागत होना चाहिए, लेकिन इंसानी गरिमा की कीमत पर नहीं। अगर डेटा कलेक्शन हो रहा है, तो मजदूरों को उसका सही मुआवजा और भविष्य की सुरक्षा मिलनी चाहिए।



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