महंगी होगी हवाई यात्रा! ईंधन की किल्लत से 25% तक किराया बढ़ने का अनुमान

Aman Vaishnav | Jun 25, 2026, 11:30 IST
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रिफाइनरी उत्पादन में कमी के कारण 2026 में हवाई किराया 25 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। दुनिया की 40% एटीएफ सप्लाई करने वाले देशों ने अपना उत्पादन घटा दिया है। यह जानकारी वैश्विक सलाहकार कंपनी मैकिंजी ने अपनी रिपोर्ट में दी है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • साल 2026 में हवाई किराया 20% से लेकर 25% तक बढ़ सकता है।
  • विमान ईंधन यानी एटीएफ की वैश्विक आपूर्ति बाधित हो रही है।
  • एटीएफ सप्लाई करने वाले कई देशों ने अपना उत्पादन घटा दिया है।
  • एयरलाइन के टिकट की कुल कीमत में 30% हिस्सा ईंधन की लागत का होता है।
  • कच्चे तेल के दाम घटकर 4 महीने के निचले स्तर 75.55 डॉलर प्रति बैरल पर आ गए हैं।

अगर आप आने वाले समय में हवाई यात्रा करने की सोच रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है। रिफाइनरियों में काम कम होने की वजह से विमान ईंधन की सप्लाई में दिक्कत आ रही है।



इस स्थिति को देखते हुए वैश्विक सलाहकार कंपनी मैकेंजी ने एक बड़ी बात कही है। मैकेंजी का कहना है कि साल 2026 में हवाई किराया 20% से लेकर 25% तक बढ़ सकता है।



आखिर क्यों बढ़ रहा हवाई किराया?

मैकेंजी की रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे तेल और उससे बनने वाले विमान ईंधन की कीमत के बीच का अंतर बहुत ज्यादा बढ़ने की आशंका है। इस अंतर को तकनीकी भाषा में क्रैक स्प्रेड कहा जाता है।



आमतौर पर यह अंतर 20% के आसपास होता है। अब इसके 50 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर निकलने का डर है।



रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि वैसे तो कच्चे तेल के दाम बढ़ने से विमान ईंधन महंगा हुआ है, लेकिन असली मुसीबत ईंधन की कम सप्लाई की है।



  • खाड़ी देश और एशिया के बड़े विमान ईंधन निर्यातक देश मिलकर दुनिया की 40% सप्लाई संभालते हैं, लेकिन इन्होंने अपना उत्पादन घटा दिया है।
  • चीन, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी इसके निर्यात पर आंशिक प्रतिबंध लगा दिए हैं।

विमानन कंपनियों पर कैसा पड़ेगा असर?

जब विमान ईंधन महंगा होता है, तो विमानन कंपनियों का पूरा बजट बिगड़ जाता है।



इसे नीचे दिए गए बिंदुओं से आसानी से समझ सकते हैं।



  • किसी भी हवाई टिकट की कुल कीमत का लगभग 30% हिस्सा अकेले ईंधन की लागत का होता है।
  • जब भी विमान ईंधन (ATF) की लागत दोगुनी होती है, तो हवाई किराया अमूमन 20 से 25% तक बढ़ जाता है।
  • एयरलाइंस अपनी बढ़ी हुई ऑपरेशन लागत का एक बड़ा हिस्सा खुद उठाने के बजाय यात्रियों की जेब पर ही डालती हैं।

इन कारणों से किराए में वृद्धि थमने के आसार नहीं

जानकारों का मानना है कि हवाई किराए में होने वाली यह बढ़ोतरी जल्द थामने वाली नहीं है। इसकी मुख्य रूप से तीन बड़ी वजहें हैं:



  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: यहां से तेल के टैंकरों का ट्रैफिक पूरी तरह सामान्य होने पर दाम घट सकते हैं। जिसकी संभावना अब थोड़ी बढ़ी है।
  • रणनीतिक भंडार: दिक्कत यह है कि ज्यादातर देश अपना रणनीतिक तेल भंडार भरने में लगे हैं। इसलिए कीमतें लगातार ऊंची बनी रह सकती हैं।
  • रिफाइनरी की क्षमता : दुनिया भर की रिफाइनरियों में पहले से ही बहुत ऊंची क्षमता के साथ काम हो रहा है। इसलिए अलग से ज्यादा उत्पादन करने की गुंजाइश बहुत सीमित है।

4 महीने के निचले स्तर पर आया कच्चा तेल

इस पूरी चिंता के बीच एक राहत भरी खबर भी आई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 4 महीनों के सबसे निचले स्तर पर आ गई है।



बुधवार 24 जून को अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड के दाम में करीब 2% की गिरावट देखी गई। यह घटकर 75.55 डॉलर प्रति बैरल रह गया।



दरअसल, पश्चिम एशिया में चल रहा तनाव अब थोड़ा कम हुआ है। इसके साथ ही होर्मुज जल मार्ग से तेल के टैंकरों की आवाजाही भी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। इससे क्रूड ऑयल की कीमतों में बड़ी गिरावट आई है।



बता दें कि ईरान युद्ध के समय ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर तक पहुंच गई थी। इससे तुलना करें तो मौजूदा कीमत करीब 37% कम है। फ्लाइट टिकट



FAQ

  1. 2026 में हवाई किराया कितना बढ़ सकता है?
    मैकिंजी की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2026 में हवाई किराया 20% से लेकर 25% तक बढ़ सकता है। इसकी मुख्य वजह विमान ईंधन की वैश्विक आपूर्ति में आ रही बाधा और रिफाइनरी प्रोडक्शन में कमी है।
  2. हवाई टिकट की कुल कीमत में ईंधन की कितनी हिस्सेदारी होती है?
    किसी भी एयरलाइन टिकट की कुल कीमत का करीब 30% हिस्सा अकेले विमान ईंधन (ATF) की लागत का होता है। यही कारण है कि ईंधन महंगा होने पर एयरलाइंस इसका बोझ यात्रियों पर डाल देती हैं।
  3. कच्चे तेल की कीमतों में हाल ही में क्या बड़ी गिरावट आई है?
    हां, कच्चे तेल के दाम पिछले 4 महीनों के सबसे निचले स्तर पर आ गए हैं। बुधवार को ब्रेंट क्रूड का दाम करीब 2% गिरकर 75.55 डॉलर प्रति बैरल रह गया है। यह ईरान युद्ध के समय के 120 डॉलर के स्तर से करीब 37% कम है।

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