इलाहाबाद हाई कोर्ट : गर्भावस्था को जारी रखना या गर्भपात कराना ये अब महिला का फैसला

Dolly patil | Jul 25, 2024, 12:57 IST
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि यह महिला का फैसला है कि वह गर्भावस्था को जारी रखना चाहती है या गर्भपात करना चाहती है। दरअसल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ये बात 15 साल की गर्भवती बलात्कार पीड़िता के मामले में कही थी।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि यह महिला का फैसला है कि वह गर्भावस्था को जारी रखना चाहती है या गर्भपात करना चाहती है। दरअसल इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ये बात 15 साल की गर्भवती बलात्कार पीड़िता के मामले में कही थी।



जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला ने पीड़िता और उसके माता-पिता को 32 सप्ताह के गर्भ में चिकित्सीय जोखिमों के बारे में परामर्श देने के बाद गर्भावस्था जारी रखने की अनुमति दी है।



इसी के साथ कोर्ट ने कहा कि एक महिला का यह निर्णय है कि उसे अपनी गर्भावस्था को समाप्त करना है या नहीं ये निर्णय किसी और को नहीं बल्कि उसे ही लेना है।



इलाहाबाद हाई कोर्ट ने और क्या कहा

इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि भले ही वो गर्भधारण करने और बच्चे को गोद देने का फैसला करती है। लेकिन राज्य का यह कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि यह काम निजी तौर पर किया जाए और यह भी सुनिश्चित करें कि बच्चा इस देश का नागरिक होने के नाते, संविधान में निहित मौलिक अधिकारों से वंचित रहे।



इसलिए यह सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है कि गोद लेने की प्रक्रिया भी कुशल तरीके से की जाए और बच्चे के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत का पालन किया जाए।



क्या था पूरा मामला

बलात्कार पीड़िता की उम्र 15 साल है, जैसा की उसकी हाई स्कूल मार्कशीट में जन्मतिथि दर्ज है। वो अपने मामा के घर रहती थी। इन्होंने धारा 363 आईपीसी के तहत एफआईआर दर्ज कराई थी।



इसमें आरोप लगाया गया था कि उसे एक आदमी बहला-फुसलाकर ले गया था। पीड़िता के ठीक होने पर आरोपी के खिलाफ बलात्कार के आरोप लगाए गए और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम 2012 की धारा 3/4 के तहत भी आरोप लगाए गए।



हालांकि इसके बाद यह पता चला कि पीड़िता 29 सप्ताह की गर्भवती थी। भले ही गुमशुदगी की रिपोर्ट जून में दर्ज की गई थी, और कथित घटना जून में हुई थी, लेकिन कोर्ट ने कहा कि चूंकि पीड़िता 15 साल की है। इसलिए यह बलात्कार की श्रेणी में आएगा और यह एक अपराध है।



डॉक्टरों की टीम ने किया इलाज

जानकारी के मुताबिक डॉक्टरों की तीन अलग-अलग टीमों ने पीड़ित का चेकअप किया था। इसी के साथ डॉक्टरों ने तीन मेडिकल जांच के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट दाखिल की।



इस मेडिकल रिपोर्ट में कहा गया कि गर्भावस्था जारी रहने से पीड़िता की शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर पड़ेगा। लेकिन इस स्तर पर गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन पीड़िता के जीवन को किसी भी तरह के खतरे के बिना संभव नहीं है।



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पीड़िता की तीन मेडिकल जांच के बाद मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट दाखिल की। मेडिकल रिपोर्ट में कहा कि गर्भावस्था जारी रहने से पीड़िता की शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर पड़ेगा, लेकिन इस स्तर पर गर्भावस्था का चिकित्सीय समापन पीड़िता के जीवन को किसी भी तरह के खतरे के बिना संभव नहीं है। कोर्ट द्वारा पूछे गए एक प्रश्न पर, यह कहा गया कि जोखिम के बावजूद, पीड़िता के माता-पिता गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए सहमति दे रहे थे।



गर्भपात कराने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न आदेशों को ध्यान में रखते हुए, जिसमें गर्भावस्था के बाद के चरणों में चिकित्सीय गर्भपात की अनुमति नहीं दी गई थी। इसी के साथ कोर्ट ने पीड़िता और उसके रिश्तेदारों को 32 सप्ताह में गर्भावस्था को समाप्त करने से जुड़े जोखिमों के बारे में परामर्श दिया। जिसके बाद याचिकाकर्ता और उसके माता-पिता ने गर्भपात कराने से इनकार कर दिया।



जन्म लेने वाले बच्चे को गोद देने का फैसला

कोर्ट ने राज्य को बच्चे के जन्म से संबंधित सभी खर्च वहन करने का निर्देश दिया, जिसमें परिवार और पीड़िता की यात्रा और रहने का खर्च भी शामिल है। इसके अलावा, केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण ( CARA ) के निदेशक को जन्म लेने वाले बच्चे को गोद लेने के लिए कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश जारी किए गए।



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