स्कूलों में हिजाब की इजाजत नहीं, यूनिफॉर्म का नियम ही चलेगा, हाईकोर्ट का फैसला
समझें क्या है पूरा मामला...
- हाईकोर्ट ने स्कूल में हिजाब पहनने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है।
- कोर्ट ने कहा कि यूनिफॉर्म के नियम का पालन करना जरूरी है।
- इससे बच्चों में बराबरी की भावना बनी रहती है।
- कोर्ट ने एक नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज कर दी।
- छात्रा ने यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
सोमवार को दिए फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा कि स्कूल यूनिफॉर्म सिर्फ एक ड्रेस कोड नहीं है। यह स्कूल की अपनी पहचान भी बनाती है।
कोर्ट के मुताबिक यूनिफॉर्म की वजह से स्कूल में किसी तरह का धार्मिक भेदभाव नहीं दिखता। हर छात्र एक जैसा दिखता है और एक जैसा महसूस करता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कोई भी छात्र या छात्रा स्कूल के तय ड्रेस कोड को अपनी मर्जी से नहीं बदल सकता। अगर व्यक्तिगत आधार पर छूट दी जाने लगे, तो अनुशासन तय करने का अधिकार स्कूल के बजाय अलग-अलग छात्रों के हाथ में चला जाएगा।
नाबालिग छात्रा की याचिका खारिज
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिविजन बेंच ने यह फैसला सुनाया। बेंच के सामने एक नाबालिग छात्रा की याचिका थी।
छात्रा चाहती थी कि उसे स्कूल के तय यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने दिया जाए। कोर्ट ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि व्यक्तिगत आधार पर हिजाब की अनुमति देना यूनिफॉर्म के मूल विचार के खिलाफ होगा।
कर्नाटक से शुरू हुआ था विवाद
बता दें कि स्कूलों में हिजाब को लेकर कानूनी लड़ाई नई नहीं है। यह विवाद जनवरी 2022 में कर्नाटक (कर्नाटक में हिजाब विवाद) के उडुपी से शुरू हुआ था।
वहां एक सरकारी कॉलेज की कुछ मुस्लिम छात्राओं ने हिजाब पहनकर कक्षा में बैठने की मांग की थी। कॉलेज प्रशासन ने इसे यूनिफॉर्म नियम के खिलाफ बताया था।
धीरे-धीरे यह विरोध दूसरे कॉलेजों तक भी पहुंच गया। कुछ जगहों पर भगवा शॉल पहनकर जवाबी प्रदर्शन भी हुए। मामला (कर्नाटक हिजाब) इतना बढ़ा कि आखिरकार कर्नाटक हाईकोर्ट तक पहुंच गया।
15 मार्च 2022 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने छात्राओं की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसलिए स्कूल का तय ड्रेस कोड लागू कराया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में मामला अभी भी अटका
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 13 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने अपना फैसला सुनाया लेकिन दोनों जजों की राय अलग-अलग थी।
जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। उनका कहना था कि स्कूल का ड्रेस कोड सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होता है। उनके मुताबिक यह भी साबित नहीं हो सका कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है।
वहीं जस्टिस सुधांशु धूलिया की राय अलग थी। उन्होंने कहा कि यह तय करना जरूरी ही नहीं है कि हिजाब अनिवार्य धार्मिक प्रथा है या नहीं। उनके मुताबिक छात्रा की आस्था और पसंद को संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 के तहत देखा जाना चाहिए।
दोनों जजों की राय अलग होने की वजह से यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। एक बड़ी बेंच इस पर अंतिम फैसला सुनाएगी।
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