कैंसर का इलाज होगा सस्ता, 543 दवाओं की कीमतों में हुई कटौती, 9 नवंबर से लागू होंगे नए रेट
हालांकि, कीट्रूडा जैसी कई महंगी दवाओं की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कुछ दवाएं इतनी सस्ती कैसे हो गईं, जबकि कई दवाएं अब भी महंगी क्यों हैं?
कैंसर की 543 दवाओं के दाम बदले
एनपीपीए ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली 543 दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) में बदलाव किया है। इस फैसले से कई महंगी दवाओं की कीमत काफी कम हो गई है। कुछ दवाएं तो पहले के मुकाबले 90 फीसदी से ज्यादा सस्ती हो गई हैं।
इसका फायदा उन मरीजों को मिल सकता है, जिन्हें लंबे समय तक महंगी दवाएं लेनी पड़ती हैं। हालांकि, सभी कैंसर की दवाओं के दाम नहीं घटे हैं। कुछ महंगी दवाएं पहले की कीमत पर ही मिलेंगी।
40 हजार की दवा अब 2,720 रुपए में
ब्रेस्ट कैंसर के कुछ मरीजों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली पाल्बोसिक्लिब दवा के एक ब्रांड और पैक की कीमत में बड़ी कटौती हुई है। पहले इसकी कीमत 40 हजार 421 रुपए थी। अब इसे घटाकर 2720 रुपए कर दिया गया है। यानी इस खास ब्रांड और पैक की कीमत में 90 फीसदी से ज्यादा कमी आई है।
इसी तरह कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली थायोटेपा दवा की एक शीशी की कीमत भी घटाई गई है। पहले इसकी कीमत करीब 80 हजार 72 रुपए थी। अब इसकी कीमत 7150 रुपए हो गई है। इसके अलावा डासैटिनिब, लेंवाटिनिब और ओलापैरिब जैसी दवाओं के दाम भी काफी कम किए गए हैं।
कीट्रूडा जैसी महंगी दवाओं के दाम क्यों नहीं घटे?
कई दवाओं की कीमतों में बड़ी कटौती हुई है, लेकिन कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ बेहद महंगी दवाओं के दाम अब भी पहले जैसे हैं। इनमें इम्यूनोथेरेपी की दवा कीट्रूडा भी शामिल है। इसका इस्तेमाल 21 से ज्यादा तरह के कैंसर के इलाज में किया जाता है। कीट्रूडा की कीमत अब भी 2 लाख 16 हजार 500 रुपए बनी हुई है।
इसी तरह ब्रेस्ट कैंसर में इस्तेमाल होने वाली रिबोसाइक्लिब की कीमत 24 हजार 435 रुपए है। इसमें भी कोई बदलाव नहीं हुआ है। टैग्रिसो, टेसेंट्रिक, डार्जालेक्स और इम्फिन्जी जैसी महंगी दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत भी नहीं बदली गई है।
कुछ दवाओं की कीमतें क्यों नहीं बदलीं?
मरीजों के अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (AIDAN) की मालिनी ऐसोला ने इस मामले में सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक कई पेटेंट वाली दवाओं की कीमतों में बदलाव नहीं होने की एक वजह पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम (PAP) है। इस प्रोग्राम के तहत दवा कंपनियां मरीजों को कुछ दवाएं मुफ्त या कम कीमत पर देती हैं।
उदाहरण के लिए, किसी मरीज को दवा की दो शीशियां खरीदने पर तीसरी शीशी मुफ्त दी जा सकती है। मालिनी ऐसोला का कहना है कि ऐसे प्रोग्राम वाली दवाओं को कीमतों में कटौती के दायरे से बाहर रखना ठीक नहीं है। उनका आरोप है कि इससे अस्पतालों और बिचौलियों को ज्यादा कमाई करने का मौका मिलता है।
दवाओं की बिक्री पर कितना मुनाफा मिलता है?
मालिनी ऐसोला ने दवाओं की बिक्री पर मिलने वाले मुनाफे को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक दवाओं की कीमतों में बड़ी कटौती के बाद भी अस्पतालों और वितरकों के लिए 42.8 फीसदी तक मुनाफे की गुंजाइश बनी हुई है।
उन्होंने कहा कि अगर सरकार मुनाफे की सीमा और कम रखती, तो मरीजों को दवाएं इससे भी सस्ती मिल सकती थीं। यानी दवा कंपनियों से लेकर मरीज तक दवा पहुंचने के बीच होने वाली कमाई भी इलाज के खर्च को प्रभावित करती है।
सुप्रीम कोर्ट में भी उठा महंगी दवाओं का मामला
कैंसर की दवाओं की बढ़ती कीमतों और उनकी बिक्री पर मिलने वाले मुनाफे का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। अदालत उन दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय करने के सवाल पर विचार कर रही है, जिनकी कीमतें सरकारी नियंत्रण के दायरे में नहीं आती हैं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रखा है। अब देखना होगा कि अदालत दवाओं की कीमतों और बिक्री पर मिलने वाले मुनाफे को लेकर क्या फैसला सुनाती है।
9 नवंबर से लागू होंगी नई कीमतें
एनपीपीए ने कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर आने वाली कैंसर की 137 दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय करने का फैसला किया है। इसके तहत व्यापारिक मार्जिन को अधिकतम खुदरा कीमत के 30 फीसदी तक सीमित किया जाएगा। इस फैसले के बाद संशोधित कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी। इससे कई कैंसर मरीजों को इलाज के दौरान दवाओं पर होने वाले खर्च में राहत मिल सकती है।
क्या कैंसर का पूरा इलाज सस्ता हो जाएगा?
दवाओं की कीमतें घटने से मरीजों का खर्च कम होगा, लेकिन कैंसर का पूरा इलाज सस्ता हो जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं होगा। दरअसल, कैंसर के इलाज में केवल दवाओं पर ही पैसा खर्च नहीं होता। मरीजों को कई तरह की जांच, सर्जरी और अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत भी पड़ सकती है।
इसके अलावा कीमोथेरेपी और दूसरी चिकित्सा सेवाओं पर भी खर्च होता है। ऐसे में दवाओं की कीमतों में कटौती मरीजों के लिए राहत जरूर है, लेकिन इलाज का कुल खर्च मरीज की बीमारी, दवाओं और अस्पताल की सेवाओं पर निर्भर करेगा।
मरीजों को दवा खरीदते समय नई अधिकतम खुदरा कीमत जरूर देखनी चाहिए। साथ ही डॉक्टर की सलाह के बिना अपनी दवा या उसकी खुराक नहीं बदलनी चाहिए।