बेटी का PPF फंड उसका अपना, गुजारा-भत्ता में इस्तेमाल नहीं कर सकता पिता- हाईकोर्ट
समझें क्या है पूरा मामला...
- दिल्ली हाईकोर्ट ने पीपीएफ को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
- पिता ने बेटी के नाम जमा पीपीएफ रकम गुजारे में खर्च की थी।
- कोर्ट ने कहा, बच्चे के नाम निवेश उसी के भविष्य के लिए होता है।
- यह फैसला पति-पत्नी के विवाद मामले में आया है।
- पिता को पूरी रकम 8 प्रतिशत ब्याज सहित लौटानी होगी।
पीपीएफ को लेकर बड़ा फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम मामले में साफ फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पिता अपनी बेटी के नाम जमा पीपीएफ (PPF) रकम का इस्तेमाल गुजारा भत्ते में नहीं कर सकते। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने यह टिप्पणी की।
उनका कहना था कि बच्चे के नाम किया गया निवेश उसी के भविष्य के लिए होता है। इसे माता-पिता के आपसी विवाद में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। यह फैसला कई परिवारों के लिए मिसाल बन सकता है।
क्या था पूरा मामला
यह मामला सुधीर कवात्रा और शामली कवात्रा के बीच था। सुधीर कवात्रा ने साल 1999 में बेटी शामली के नाम पीपीएफ खाता खुलवाया था। यह खाता बेटी की पढ़ाई और भविष्य के लिए खोला गया था। सालों तक इस खाते में रकम जमा होती रही। शामली को उम्मीद थी कि यह पैसा उसकी पढ़ाई में काम आएगा। वहीं, आगे चलकर मामला अलग मोड़ ले गया।
बेटी को कैसे चला पता
साल 2017 में शामली पीपीएफ की अवधि पूरी होने पर बैंक पहुंची। वहां उसे बड़ा झटका लगा। पता चला कि उसके पिता ने साल 2016 में ही पूरी रकम निकाल ली थी। यह रकम आठ लाख रुपए से भी ज्यादा थी। खाता भी उसी समय बंद कर दिया गया था। शामली को इसकी कोई जानकारी पहले नहीं दी गई थी। इससे वह हैरान और परेशान हो गई।
बेटी ने खटखटाया कोर्ट का दरवाजा
शामली का कहना था कि यह रकम उसकी पढ़ाई और भविष्य के लिए रखी गई थी। वहीं, इसका इस्तेमाल उसकी शिक्षा पर नहीं हुआ। इससे नाराज होकर उसने कानूनी रास्ता चुना। वह रकम वापस पाने के लिए अदालत पहुंची। पहले निचली अदालत ने भी उसके पक्ष में फैसला दिया था। इसके बाद पिता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
पिता ने दी यह दलील
पिता की ओर से कोर्ट में अलग तर्क रखा गया। उनका कहना था कि पति पत्नी के बीच विवाद के चलते वे अलग रह रहे थे। फैमिली कोर्ट के आदेश पर पत्नी को गुजारा भत्ता देना जरूरी था। उसी जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए यह रकम खर्च हुई। उन्होंने यह भी कहा कि वे पत्नी को अतिरिक्त भत्ता भी दे रहे थे। उनका दावा था कि इसका फायदा बेटी को भी मिल रहा था।
कोर्ट ने दलील को नहीं माना
दिल्ली हाईकोर्ट ने पिता की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि पत्नी का गुजारा भत्ता और बच्चे की परवरिश दोनों अलग जिम्मेदारियां हैं। एक जिम्मेदारी को दूसरे से नहीं जोड़ा जा सकता। कोर्ट ने साफ कहा कि पिता बेटी के नाम जमा रकम को अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में इस्तेमाल नहीं कर सकते। यह टिप्पणी कानूनी तौर पर काफी अहम मानी जा रही है।
रकम पर किसका हक
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि खाता भले ही पिता ने खोला हो। लेकिन यह पूरी तरह बेटी के फायदे के लिए था। पिता सिर्फ अभिभावक के तौर पर इसे संभाल रहे थे। बेटी के बालिग होने के बाद इस रकम पर पूरा अधिकार उसी का बनता है। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की परवरिश का खर्च माता पिता की खुद की जिम्मेदारी होती है। इसे बच्चे के नाम जमा पैसे से पूरा नहीं किया जा सकता।
आखिर में क्या रहा फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेश को पूरी तरह सही ठहराया। कोर्ट ने पिता को निर्देश दिया कि वे बेटी की पूरी पीपीएफ रकम लौटाएं। इस रकम पर आठ प्रतिशत ब्याज भी देना होगा। यह फैसला बच्चों के नाम जमा निवेश की सुरक्षा को लेकर अहम माना जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला आगे भी नजीर बनेगा।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर सीधे तौर पर बच्चों के आर्थिक अधिकार और कानूनी सुरक्षा से जुड़ी है। कोर्ट का यह फैसला बताता है कि बच्चे के नाम जमा निवेश सिर्फ उसी के लिए सुरक्षित रहना चाहिए। यह भारतीय संविधान में बच्चों के अधिकारों की भावना के अनुरूप है।
परिवार विवाद में बच्चों का हक न छिने, यह सामाजिक और कानूनी नैतिकता का जरूरी पहलू है। यह खबर पूरी तरह अदालत के सार्वजनिक फैसले पर आधारित है। इसमें किसी की निजता या छवि को नुकसान पहुंचाने वाली कोई बात शामिल नहीं है। इसलिए हर अभिभावक और आम नागरिक के लिए इसे जानना जरूरी है।
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