दिल्ली आबकारी नीति केस से जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने खुद को सुनवाई से किया अलग
News in short
- जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने केस की सुनवाई से खुद को अलग किया।
- सीबीआई ने निचली अदालत के डिस्चार्ज आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
- जस्टिस ने ‘आप’ नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की।
- सोशल मीडिया पोस्ट और अदालत बहिष्कार को लेकर विवाद बढ़ा।
- अब मुख्य केस दूसरी बेंच सुनेगी, अवमानना केस अलग से चलेगा।
INTRO
दिल्ली आबकारी नीति मामले में नया मोड़ आया है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सीबीआई की अपील पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है। अब मामला दूसरी बेंच को जाएगा। साथ ही ‘आप’ नेताओं के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही अलग से चलेगी।
News in Detail
सुनवाई से अलग हुए जस्टिस, दिल्ली आबकारी नीति केस में बड़ा मोड़
दिल्ली उच्च न्यायालय में आबकारी नीति से जुड़े बहुचर्चित मामले में बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करने से खुद को अलग कर लिया है, जिसमें अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को निचली अदालत से मिली राहत को चुनौती दी गई थी। अब यह पूरा मामला हाईकोर्ट की किसी अन्य बेंच को सौंपा जाएगा, जो इस अपील पर आगे की सुनवाई करेगी।
यह मामला पहले से ही राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर काफी संवेदनशील माना जा रहा था, लेकिन जस्टिस के ताजा फैसले के बाद इसमें एक नया मोड़ आ गया है। अदालत में यह स्पष्ट किया गया कि यह निर्णय व्यक्तिगत इच्छा से नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी अनिवार्यता के तहत लिया गया है।
अवमानना कार्यवाही शुरू होने के बाद बढ़ा विवाद
दरअसल जस्टिस सूर्यकांता ने इसी मामले से जुड़े कुछ आरोपियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की है। नियमों के अनुसार, जब कोई जज किसी पक्ष के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करता है, तो वह उसी पक्ष से जुड़े मूल मामले की सुनवाई नहीं कर सकता। इसी कारण उन्हें इस केस से अलग होना पड़ा।
जस्टिस ने अदालत में यह भी कहा कि उनके और न्यायपालिका के खिलाफ सोशल मीडिया पर लगातार अपमानजनक और निंदनीय टिप्पणियां की जा रही थीं। उन्होंने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि अब वह इस पर चुप नहीं रह सकतीं। जस्टिस ने मौखिक टिप्पणी करते हुए यह भी कहा कि संवैधानिक पद पर रहते हुए कई बार व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़ती है।
अदालत बहिष्कार और पक्षपात के आरोपों से बढ़ा तनाव
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। दरअसल, अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की ओर से अदालत में पेश न होने का फैसला लिया गया था। उन्होंने जस्टिस पर पक्षपात के आरोप लगाते हुए उनसे खुद को मामले से अलग करने की मांग की थी, जिसे अदालत ने पहले ही खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करते हुए कहा था कि वे न तो व्यक्तिगत रूप से पेश होंगे और न ही अपने वकील भेजेंगे।
निचली अदालत के फैसले से शुरू हुआ पूरा मामला
इस केस की शुरुआत तब हुई जब 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और अन्य 22 आरोपियों को सीबीआई मामले में डिस्चार्ज कर दिया था। इसके बाद सीबीआई ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कुछ प्रारंभिक टिप्पणियां भी की थीं, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील हो गया।
अब स्थिति यह है कि सीबीआई की अपील पर नया जज फैसला करेगा कि निचली अदालत का डिस्चार्ज आदेश सही था या नहीं और आरोपियों के खिलाफ आगे ट्रायल जारी रहेगा या नहीं। दूसरी ओर, अवमानना का मामला अलग से चलेगा, जिसमें संबंधित नेताओं को सोशल मीडिया टिप्पणियों और अदालत बहिष्कार के मुद्दे पर जवाब देना होगा।
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