कोर्ट से बरी होने पर गूगल से हटेगी आपराधिक जानकारी, राइट टू बी फॉरगॉटन को लेकर HC का फैसला
समझें क्या है पूरा मामला...
- दिल्ली हाई कोर्ट ने राइट टू बी फॉरगॉटन के अधिकार को निजता का मौलिक अधिकार माना है।
- केस से बरी हो चुके है व्यक्ति की आपराधिक जानकारी रखकर उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान नहीं पहुंचा सकते।
- निजता का मतलब सिर्फ अपनी जानकारी के सार्वजनिक होने पर व्यक्ति का नियंत्रण होना है।
- इंटरनेट पर पुरानी नकारात्मक जानकारी बने रहने से व्यक्ति पर बुरा असर पड़ता है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने डिजिटल दौर में आम लोगों के सम्मान को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया है कि भूल जाने का अधिकार (Right to be Forgotten) हमारे संविधान का हिस्सा है।
अदालत ने कहा कि इंटरनेट और गूगल जैसे सर्च इंजन पर अदालती रिकॉर्ड की हमेशा उपलब्धत रहती है। इससे यह किसी भी बेगुनाह व्यक्ति की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस सचिन दत्ता ने की है। जस्टिस ने कहा कि आज के डिजिटल युग में निजता का दायरा बढ़ गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई बात गुप्त रखी जाए।
इसका असली मतलब यह है कि किसी व्यक्ति की निजी जानकारी जब लोगों के सामने आए, तो उस पर उस व्यक्ति का खुद का पूरा नियंत्रण होना चाहिए।
बेगुनाह होने के बाद भी दाग क्यों?
सूचनात्मक गोपनीयता के तहत हर इंसान को सूचनात्मक आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए। इस बात पर भी हाईकोर्ट ने जोर दिया।
अदालत ने माना कि इंटरनेट पर मौजूद जानकारी लंबे समय तक बनी रहती है। कोई व्यक्ति किसी मामले में पूरी तरह बरी हो चुका है, तब भी इंटरनेट पर उसके खिलाफ लगे आरोपों की खबरें ऊपर दिखाई देती रहती हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि उस व्यक्ति को नौकरी मिलने में दिक्कत आती है। समाज में उसकी बदनामी होती है। साथ ही उसके निजी रिश्ते भी खराब होते हैं।
कोर्ट के अनुसार न्यायिक पारदर्शिता का मतलब किसी व्यक्ति का नाम हमेशा के लिए पुराने आरोप से जोड़कर रखना नहीं है। कोर्ट (दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला) ने उसे बेगुनाह मान लिया है, तो इंटरनेट पर उन आरोपों का बने रहना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
समाधान के दो बड़े रास्ते, डी-इंडेक्सिंग और मास्किंग
अदालत ने कहा कि लोगों की प्राइवेसी की रक्षा करने और कानूनी रिकॉर्ड की पारदर्शिता बनाए रखने के बीच संतुलन होना जरूरी है। इसके लिए कोर्ट ने दो बड़े और कानूनी उपायों का सुझाव दिया है।
| उपाय | यह कैसे काम करता है? | इसका क्या फायदा है? |
| डी-इंडेक्सिंग | इसमें मूल जानकारी या खबर को इंटरनेट से पूरी तरह मिटाया नहीं जाता। उसे इस तरह ब्लॉक किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति नाम सर्च करके उस तक आसानी से न पहुंच सके। | नाम से सर्च करने पर पुरानी आपराधिक खबरें सामने नहीं आएंगी। |
| मास्किंग | इसके तहत सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड से उस व्यक्ति का असली नाम या पहचान छिपा दी जाती है। | मूल रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है, लेकिन आम जनता के सामने व्यक्ति की पहचान उजागर नहीं होती। |
अमेरिका में कैसा कानून
बता दें कि अमेरिका में राइट टू बी फॉरगॉटन का कोई विशेष कानून नहीं है। अमेरिकी संविधान का पहला संशोधन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता देता है।
इसलिए यूरोप या भारत जैसा यह अधिकार अमेरिका में मान्य नहीं है। कोर्ट ने कहा है कि पुरानी सार्वजनिक जानकारी को सर्च इंजन से हटाना अमेरिकी संविधान के प्रतिनिधि स्वतंत्रता के सिद्धांत के विरुद्ध है।
चीन में डेटा डिलीट करने का अधिकार मौजूद
चीन में 2021 में लागू Personal Information Protection Law के तहत डेटा डिलीट करने का अधिकार मौजूद है। व्यक्ति अपने व्यक्तिगत डेटा का डिलीशन मांग सकता है।
यह EU के राइट टू बी फॉरगॉटन से मिलता-जुलता है। वहीं चीन में public interest और state security को भी ध्यान में रखा जाता है।
जापान में डिलीट डिमांड की सुविधा
जापान में APPI कानून के तहत डेटा डिलीट करने की मांग की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन वहां कोई स्पष्ट राइट टू बी फॉरगॉटन कानून मौजूद नहीं है।
जापान की सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में Google के खिलाफ RTBF का दावा खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक जानकारी तक पहुंच का अधिकार व्यक्तिगत गोपनीयता की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
हर मामले को अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार देखा जाता है।
रूस में राइट टू बी फॉरगॉटन कानून पर हस्ताक्षर
रूस में 14 जुलाई 2015 को राष्ट्रपति पुतिन (रुस के राष्ट्रपति पुतिन) ने राइट टू बी फॉरगॉटन कानून पर हस्ताक्षर किए थे। यह कानून 1 जनवरी 2016 से लागू हुआ।
इसके तहत यदि किसी व्यक्ति की जानकारी गलत हो गई हो, तो सर्च इंजन को 10 कार्यदिवसों में उस जानकारी को हटाना अनिवार्य है। यह अधिकार केवल व्यक्तियों को प्राप्त है कंपनियों को नहीं।
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