केजरीवाल और सिसोदिया के लिए दिल्ली हाई कोर्ट नियुक्त करेगा 'अदालत मित्र',आप नेताओं की ओर से करेंगे पैरवी

Sanjay Dhiman | May 05, 2026, 19:14 IST
Photograph: (the sootr)
दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के लिए 'अदालत मित्र' (amicus curiae) नियुक्त किए हैं। यह फैसला न्यायिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। दोनों नेताओं ने शराब नीति मामले की सुनवाई का बहिष्कार किया है।

दिल्ली की राजनीति में हलचल थमती नजर नहीं आ रही है। ताजा मामला दिल्ली हाई कोर्ट से जुड़ा है। यहां शराब नीति घोटाले में घिरे आम आदमी पार्टी (AAP) के दिग्गज नेताओं—अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक के मुकदमों की सुनवाई चल रही है। इन नेताओं ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करने का मन बना लिया। अब सवाल यह है कि अगर आरोपी और उनके वकील ही कोर्ट नहीं आएंगे, तो जज साहब फैसला कैसे करेंगे? इसी पहेली को सुलझाने के लिए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने एक बड़ा कानूनी निर्णय लिया है।



कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह इन नेताओं की पैरवी के लिए 'एमिकस क्यूरी' यानी "अदालत मित्र" नियुक्त करेगी। यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि भले ही नेता खुद पेश न हों, लेकिन उनके कानूनी पक्ष को कोई अनुभवी सीनियर वकील अदालत के सामने मजबूती से रख सके।



क्या होता है 'अदालत मित्र' और क्यों पड़ी इसकी जरूरत?

सरल भाषा में कहें तो 'एमिकस क्यूरी' (Amicus Curiae) वह सीनियर वकील होता है, जो न तो सरकार की तरफ से होता है और न ही आरोपी की तरफ से। उसे अदालत खुद चुनती है ताकि वह पेचीदा कानूनी मामलों में निष्पक्ष राय दे सके।



जस्टिस शर्मा की बेंच ने संकेत दिया कि वह यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि सुनवाई पूरी तरह से निष्पक्ष हो। जब आप (AAP) नेताओं ने सुनवाई में आने से इनकार कर दिया, तो अदालत के पास दो ही रास्ते थे, या तो एकतरफा फैसला सुना दे या फिर किसी निष्पक्ष वकील को नियुक्त करे। कोर्ट ने दूसरा रास्ता चुना ताकि लोकतंत्र और न्याय की गरिमा बनी रहे।



केजरीवाल और सिसोदिया का 'सत्याग्रह' वाला रास्ता

यह पूरा मामला तब गरमाया जब केजरीवाल और सिसोदिया ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत से खुद को अलग करने (Recusal) की मांग की थी। उनका तर्क था कि जज के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के पैनल में वकील हैं, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, 20 अप्रैल को जस्टिस शर्मा ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया।



इसके जवाब में, दोनों नेताओं ने गांधीवादी तरीका अपनाया। उन्होंने जज को चिट्ठी लिखकर साफ कह दिया कि वे न तो खुद कोर्ट आएंगे और न ही उनका कोई वकील पेश होगा। उन्होंने इसे "सत्याग्रह" का नाम दिया। नेताओं का कहना है कि जब उन्हें निष्पक्ष न्याय की उम्मीद ही नहीं है, तो वे कार्यवाही का हिस्सा क्यों बनें?



ट्रायल कोर्ट के फैसले पर सीबीआई की घेराबंदी

आपको याद होगा कि 27 फरवरी को एक निचली अदालत (Trial Court) ने इन नेताओं को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई का केस टिकने लायक ही नहीं है। लेकिन सीबीआई इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंच गई।



हाई कोर्ट की जस्टिस शर्मा ने प्रारंभिक टिप्पणियों में कहा कि निचली अदालत का फैसला "प्रथम दृष्टया त्रुटिपूर्ण" लग रहा है। इसी के बाद सीबीआई की अपील पर सुनवाई शुरू हुई, जिसका अब आप नेता बहिष्कार कर रहे हैं। अब शुक्रवार को कोर्ट उन वरिष्ठ वकीलों के नाम तय करेगी जो इस हाई-प्रोफाइल मामले में 'अदालत मित्र' की भूमिका निभाएंगे।



सियासी गलियारों में चर्चा और कानूनी पेच

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह दिल्ली सरकार और केंद्र की एजेंसियों के बीच चल रही लंबी जंग का एक नया अध्याय है। एक तरफ जहाँ केजरीवाल और सिसोदिया इसे "राजनैतिक प्रतिशोध" बता रहे हैं, वहीं अदालत ने अपनी प्रक्रिया को कानून के दायरे में आगे बढ़ाने का फैसला किया है। 'अदालत मित्र' की नियुक्ति से अब यह तय हो गया है कि नेताओं की गैर-मौजूदगी में भी केस बंद नहीं होगा, बल्कि दलीलें और भी तीखी हो सकती हैं।



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