देश के आधे से ज्यादा हिस्से में सूखे की मार: किसानों की कमाई पर असर, अगली बुवाई के लिए पैसा नहीं
आईआईटी गांधीनगर के इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के मुताबिक, 16 सितंबर 2026 तक देश के 52.5% हिस्से में सूखे या सूखे जैसी स्थिति थी। एक महीने पहले यह आंकड़ा करीब 38% था। मानसून के दौरान बारिश की कमी ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में फसलों को ज्यादा नुकसान हुआ है।
फसल खराब होने से किसानों की कमाई घट गई है। कई किसानों के लिए खेती पर लगाया पैसा वापस निकालना भी मुश्किल हो रहा है। ऐसे में अगली फसल की बुवाई के लिए बीज, खाद और सिंचाई का खर्च जुटाना बड़ी चुनौती बन गया है।
महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में ज्यादा असर
सूखे का असर कई राज्यों में दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा में सोयाबीन और कपास की फसल को नुकसान पहुंचा है। इससे किसानों की आमदनी पर असर पड़ा है। कर्नाटक में शुरुआती आकलन के मुताबिक, 101 तालुकों में फसल का नुकसान करीब 18 हजार करोड़ रुपए आंका गया। वहीं, आंध्र प्रदेश में जून से अगस्त के बीच सामान्य से 53.4% कम बारिश हुई।
आंध्र प्रदेश सरकार ने 21 जिलों के 388 मंडलों को सूखाग्रस्त घोषित किया। इनमें 283 मंडलों को गंभीर रूप से प्रभावित बताया गया। बारिश की कमी और फसल खराब होने से किसानों के सामने आर्थिक संकट बढ़ रहा है। इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं है। गांवों में खेतों पर काम करने वाले मजदूरों को भी परेशानी हो रही है। फसल खराब होने से खेती के काम कम हो जाते हैं। इससे मजदूरों को काम और कमाई दोनों के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
खेती पर लाखों खर्च, कमाई उससे भी कम
सूखे के कारण किसानों को खेती की लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महाराष्ट्र के यवतमाल में किसान चितामन विट्ठल भोयर ने खेती पर करीब 2.75 लाख रुपए खर्च किए। लेकिन इस बार फसल से लगभग 90 हजार रुपए की कमाई होने का अनुमान है।
सामान्य साल में उनके खेत से करीब 25 क्विंटल सोयाबीन पैदा होता था। इस बार उत्पादन घटकर केवल 5 क्विंटल रहने की आशंका है। कपास की पैदावार भी काफी कम हो गई है। नुकसान का असर पशुओं पर भी पड़ा है। चारे की कमी के कारण भोयर को अपने बैल बेचने पड़े। उन्होंने ये बैल 70 हजार रुपए में खरीदे थे। लेकिन बाद में उन्हें करीब 40 हजार रुपए में बेचना पड़ा।
महाराष्ट्र के बीड में भी एक कपास किसान की परेशानी सामने आई है। उसने 10 एकड़ जमीन पर खेती के लिए करीब 2.5 लाख रुपए खर्च किए। लेकिन अब उसे फसल मिलने की उम्मीद नहीं है। ऐसी स्थिति में किसानों के सामने परिवार का खर्च चलाना, बच्चों की पढ़ाई जारी रखना और पुराना कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है।
सरकारी मदद का ऐलान, लेकिन भुगतान का इंतजार
सूखे से प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए राज्य सरकारों ने आर्थिक मदद की घोषणा की है। हालांकि, घोषणा के बाद पैसा समय पर मिलना भी जरूरी है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य की 358 में से 305 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया। किसानों को पांच हजार रुपए की सहायता देने की घोषणा भी की गई। लेकिन 19 अक्टूबर तक इस मदद के लिए जरूरी दिशा-निर्देश लंबित थे।
इसके अलावा, नमो शेतकरी योजना के तहत पात्र किसानों की चार हजार रुपए की दो किस्तों का भुगतान भी बाकी था। इससे किसानों को राहत मिलने में देरी हो रही थी। महाराष्ट्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार और आजीविका के लिए छह हजार 728 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया। राज्य में रोजगार गारंटी के तहत काम मांगने वाले परिवारों की संख्या बढ़ी है। जुलाई में ऐसे परिवारों की संख्या 4.02 लाख थी। सितंबर में यह बढ़कर 4.93 लाख हो गई।
कर्नाटक सरकार ने प्रभावित किसानों के लिए दो हजार 500 रुपए की इनपुट सब्सिडी देने की घोषणा की। राज्य सरकार ने केंद्र से भी आर्थिक मदद मांगी। किसानों को असली राहत तभी मिलेगी, जब सहायता का पैसा समय पर उनके खातों में पहुंचेगा।
अगली फसल की बुवाई के लिए पैसे कहां से आएंगे?
खरीफ की फसल में नुकसान के बाद किसानों के पास अगली फसल के लिए पर्याप्त पैसा नहीं बचा है। उन्हें रबी की बुवाई के लिए बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई पर खर्च करना होगा। इसके साथ ही पिछली फसल के लिए लिया गया कर्ज भी चुकाना है।
ऐसे में किसानों को अगली फसल उगाने के लिए फिर से कर्ज लेना पड़ सकता है। अगर समय पर पैसा नहीं मिला, तो बुवाई में देरी हो सकती है। कुछ किसानों को खेती का रकबा कम करने के लिए भी मजबूर होना पड़ सकता है। फसल खराब होने से खेतों में काम करने वाले मजदूरों की कमाई भी घटती है।
महाराष्ट्र के कुछ गांवों से लोगों के काम की तलाश में पलायन करने की खबरें भी सामने आई हैं। ऐसे समय में मनरेगा जैसी रोजगार योजनाएं ग्रामीण परिवारों की मदद कर सकती हैं। लेकिन केवल बजट तय करना काफी नहीं है। मजदूरों को समय पर काम और उसकी मजदूरी मिलना भी जरूरी है।
जलाशयों में पानी की कमी से बढ़ी चिंता
अगली फसल उगाने के लिए पैसे के साथ पानी भी जरूरी है। लेकिन जलाशयों में पानी का स्तर भी चिंता बढ़ा रहा है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 को देश के 178 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का 70.89% पानी था। पिछले 10 साल के औसत के अनुसार, इस समय जलाशयों में 81.41% पानी रहता था। यानी इस बार पानी का स्तर सामान्य से कम था।
दक्षिण भारत में स्थिति ज्यादा गंभीर थी। यहां जलाशयों में पानी का भंडार पिछले 10 साल के औसत से 38.59% कम था। 22 अक्टूबर के आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण भारत के 50 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का केवल 42.34% पानी बचा था। पिछले साल इसी अवधि में यह स्तर 89.35% था।
पानी की कमी से खेतों की सिंचाई करना मुश्किल हो सकता है। अगर किसानों को पर्याप्त पानी नहीं मिला, तो अगली फसल की पैदावार पर भी असर पड़ सकता है।
किसानों को समय पर मदद मिलना जरूरी
सूखे का असर केवल एक फसल के नुकसान तक सीमित नहीं है। इससे किसानों की कमाई, कर्ज चुकाने की क्षमता और अगली फसल की तैयारी पर भी असर पड़ रहा है। किसानों को समय पर आर्थिक मदद, खेती के लिए पानी और गांवों में रोजगार की जरूरत है। इससे वे परिवार का खर्च चलाने के साथ अगली फसल की तैयारी भी कर सकेंगे। अगर बुवाई से पहले जरूरी मदद नहीं मिली, तो किसानों की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। इसका असर आने वाले कृषि सीजन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
FAQs
- भारत में सूखे की स्थिति क्या है?
आईआईटी गांधीनगर के इंडिया ड्रॉट मॉनिटर के अनुसार, 16 सितंबर 2026 तक देश के 52.5% हिस्से में सूखे या सूखे जैसी स्थिति थी, जो एक महीने पहले लगभग 38% थी। - किसानों की फसल पर सूखे का क्या असर पड़ा है?
सूखे के कारण महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में फसलों को नुकसान हुआ है, जिससे किसानों की आय में कमी आई है और खेती पर किया गया निवेश वापस निकालना कठिन हो रहा है। - सरकार किस प्रकार सूखे से प्रभावित किसानों को सहायता प्रदान कर रही है?
राज्य सरकारों ने सूखे से प्रभावित किसानों के लिए आर्थिक मदद की घोषणा की है। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र सरकार ने 305 तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया है और प्रति किसान 5,000 रुपए की सहायता देने का वादा किया है।