इस बार नहीं पड़ेगी कड़ाके की ठंड! डेंजर जोन में आया भारत, अल नीनो का दिखेगा रौद्र रूप

Aman Vaishnav | Sept 04, 2026, 11:07 IST
भारत पर अल नीनो का आसर
भारत पर अल नीनो का आसर
भारत में इस बार दिसंबर-जनवरी की कड़ाके की ठंड गायब हो सकती है। साथ ही भारत में सूखा और भारी गर्मी को लेकर भी खतरा बहुत बढ़ गया है। क्योंकि प्रशांत महासागर का पानी तेजी से गर्म होने की वजह से गॉडजिला अल नीनो बहुत ताकतवर हो चुका है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • प्रशांत महासागर में अल नीनो अपनी पूरी ताकत के साथ स्थापित हो चुका है।
  • WMO ने चेतावनी दी है कि इसका असर फरवरी 2027 तक बना रहेगा।
  • समुद्र का तापमान सामान्य से 2.6 डिग्री तक ऊपर पहुंच चुका है।
  • इसका सीधा असर भारत की सर्दी और मानसून पर पड़ेगा।
  • मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में फसलों को नुकसान का खतरा बढ़ गया है।

इस साल मौसम ने बार-बार अपना रौद्र रूप दिखाया है। पहले भयानक गर्मी पड़ी। फिर मूसलाधार बारिश और बाढ़ ने कहर बरपाया। अब मौसम वैज्ञानिकों ने साल के आखिरी महीनों के लिए भी बड़ी चेतावनी दी है।



विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO – World Meteorological Organization) ने हाल ही में एक बड़ा अलर्ट जारी किया है। संगठन का कहना है कि प्रशांत महासागर में अल नीनो अब पूरी तरह मजबूत हो चुका है। यह घटना कई महीनों तक असर दिखाएगी।





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समुद्र में क्यों बढ़ी हलचल

अल नीनो तब बनता है जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से ज़्यादा गर्म होने लगता है। इस बार यह बदलाव बहुत तेज़ी से हुआ है। मौसम को मापने वाला नीनो 3.4 इंडेक्स मई से जुलाई के बीच सामान्य से 1.5 डिग्री ऊपर था।



अगस्त के मध्य तक यह आंकड़ा 2.2 से 2.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। समुद्र की गहराई में तो हालात और भी चौंकाने वाले हैं। जुलाई और अगस्त में वहां का तापमान सामान्य से 8 डिग्री तक ज़्यादा दर्ज हुआ। यही गहराई की गर्मी अल नीनो को लगातार मजबूत बना रही है।





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फरवरी 2027 तक रहेगा असर

WMO के मुताबिक, यह पहली बार है जब उसके पूर्वानुमान इतने स्पष्ट रहे हैं। संगठन का कहना है कि अल नीनो के फरवरी 2027 तक बने रहने की आशंका लगभग तय है। यह घटना साल 2026 के आखिर तक अपने सबसे मजबूत रूप में पहुंचेगी।



WMO महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा है कि सूखे और बाढ़ से पहले ही नुकसान शुरू हो चुका है। उनके मुताबिक, आगे यह असर और बढ़ने की आशंका है। उन्होंने बताया कि इस बार संगठन ने मौसम एजेंसियों के साथ अभूतपूर्व स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है।



संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इस पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अल नीनो अब सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है। उन्होंने इसे पहले से गर्म हो रही धरती के लिए और खतरनाक बताया है।





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भारत पर क्या पड़ेगा असर

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह खबर बड़ी चिंता की है। मौसम एजेंसी स्काईमेट के उपाध्यक्ष महेश पालावत के अनुसार, इस बार सर्दी सामान्य से कम रहेगी। तापमान ज़्यादा रहने से गेहूं और सरसों जैसी रबी फसलों पर असर पड़ सकता है।



भारत मौसम विज्ञान विभाग ने भी अक्टूबर से दिसंबर के बीच अल नीनो के और मजबूत होने का अलर्ट दिया है। इस साल मानसून पहले से ही कमजोर रहा है। अगस्त और सितंबर में बारिश सामान्य से काफी कम दर्ज हुई।



बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर लगातार गिर रहा है। इससे आने वाले महीनों में पीने के पानी और सिंचाई का संकट गहरा सकता है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर मानसून का असर पहले से ही खरीफ फसलों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है।





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सूखा और बाढ़ दोनों का खतरा

बता दें कि गॉडजिला अल नीनो पूरी दुनिया की हवाओं और बारिश के सिस्टम को प्रभावित करता है। अमेजन के जंगलों से लेकर एशिया और अफ्रीका के कई इलाकों में लंबा सूखा पड़ सकता है। इससे जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है।



वहीं कुछ इलाकों में अचानक भारी बारिश और बाढ़ की आशंका है। कुछ जगहों पर सर्दियों में भी तापमान ज़्यादा रहने से हीटवेव जैसे हालात बन सकते हैं। यानी मौसम का पूरा संतुलन इस बार गड़बड़ा सकता है।



ग्लोबल वार्मिंग ने बढ़ाई मुश्किल

अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी बदलाव है। लेकिन इंसानों की वजह से बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग ने इसे और खतरनाक बना दिया है। कार्बन उत्सर्जन से समुद्र और हवा पहले से ही गर्म हो चुके हैं।



साल 2023-24 में आए अल नीनो ने पहले ही गर्मी के कई रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। तब 2024 इतिहास का सबसे गर्म साल बना था। विशेषज्ञों को डर है कि यह नया अल नीनो (अल नीनो का असर) उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ सकता है।



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