विधानसभा चुनाव में बंगाल में 92% और तमिलनाडु में 85% रिकॉर्ड वोटिंग, जानें किसे होगा फायदा

Sanjay Dhiman | Apr 23, 2026, 18:54 IST
Photograph: (the sootr)
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनावों में रिकॉर्ड मतदान के बाद राजनीतिक दलों के दावे तेज हो गए हैं। जानें किसे होगा फायदा और क्या कह रहे हैं प्रमुख नेता।

लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव में इस बार जनता ने वो कर दिखाया है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावी मैदान में मतदाताओं ने जोश और जुनून के साथ बाहर निकलकर वोटिंग के पुराने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। बंगाल की गलियों से लेकर तमिलनाडु के तटों तक, हर तरफ बस एक ही चर्चा है—इतनी भारी वोटिंग आखिर किसकी सरकार बनवाएगी?



बंगाल में 92% वोटिंग: इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ नया रिकॉर्ड

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही गरमाई रहती है, लेकिन इस बार का मंजर कुछ अलग ही था। पहले चरण की 152 सीटों पर जब वोटिंग खत्म हुई, तो आंकड़े देखकर बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित हैरान रह गए। बंगाल में 92.57 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है। भारत के चुनावी इतिहास में यह पहली बार है जब किसी राज्य की विधानसभा चुनाव में वोटिंग का आंकड़ा 90 प्रतिशत के पार गया हो। यह जनता की उस ताकत का प्रदर्शन है जो चुपचाप ईवीएम का बटन दबाकर बड़े-बड़े बदलाव लाने का दम रखती है।



तमिलनाडु में भी स्थिति कुछ ऐसी ही रही। वहां 85.13 प्रतिशत वोटिंग हुई, जो पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 12 प्रतिशत ज्यादा है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का घर से बाहर निकलना यह बताता है कि जनता इस बार चुनाव को लेकर काफी उत्साहित थी।



प्रधानमंत्री मोदी का दावा: 'बदलाव की साफ लहर दिख रही है'

इस बंपर वोटिंग को देखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बंगाल की जनता ने इस बार 'भय के खिलाफ भरोसे' को चुना है। पीएम मोदी का मानना है कि जब भी वोटिंग प्रतिशत इतना ऊपर जाता है, तो वह सत्ता विरोधी लहर (Anti-Incumbency) का संकेत होता है। बीजेपी खेमे में खुशी की लहर है और उनका दावा है कि बंगाल में 'दीदी' का जाना और 'कमल' का खिलना अब तय हो चुका है। अमित शाह ने भी हुगली की रैली में कहा कि जनता 'सिंडिकेट राज' से तंग आ चुकी है और इसीलिए पोलिंग बूथों पर उमड़ पड़ी है।



ममता बनर्जी का पलटवार: 'क्या EVM में चिप लगा दी गई है?'

वहीं दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी इस रिकॉर्ड वोटिंग को अपनी जीत का आधार मान रही हैं। हालांकि, उन्होंने बीजेपी के आत्मविश्वास पर तंज कसते हुए सवाल उठाया कि क्या बीजेपी को पहले से ही नतीजों का पता है? ममता बनर्जी ने आशंका जताई कि क्या ईवीएम में कोई गड़बड़ी की गई है या चिप लगाई गई है? उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने की सलाह दी है और कहा कि बंगाल की जनता ने बीजेपी के 'बाहरी' नेताओं को करारा जवाब दिया है। ममता का कहना है कि लोग अपनी योजनाओं और अधिकारों को बचाने के लिए बाहर निकले हैं।



कांग्रेस नेता चौधरी ने कहा यह सत्ता विरोधी लहर

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने बंगाल में हुई रिकॉर्ड वोटिंग पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि राज्य में इस वक्त जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर चल रही है, जिसका असर पोलिंग बूथों पर साफ दिखा।



चौधरी के मुताबिक, भारी मतदान के पीछे दो बड़े कारण हैं। पहला, चुनाव आयोग द्वारा सुरक्षा के कड़े इंतजाम और दूसरा, वोटर लिस्ट की सफाई (SIR)। उन्होंने यह भी बताया कि जनता के मन में डर था कि अगर वे वोट देने नहीं निकले, तो शायद उनके लोकतांत्रिक अधिकार छिन सकते हैं।



वहीं, टीएमसी नेता जेपी मजूमदार का तर्क अलग है। उनका कहना है कि लिस्ट से फर्जी नाम हटने के कारण वोटिंग प्रतिशत 90-95% तक पहुंचा है। उन्हें पूरा भरोसा है कि ममता बनर्जी को 2021 से भी बड़ी जीत मिलेगी।



भारी मतदान के पीछे के असली कारण: क्यों टूटे रिकॉर्ड?

राजनीति के गलियारों में इस भारी मतदान के पीछे तीन मुख्य वजहें बताई जा रही हैं, जिन्हें समझना बेहद जरूरी है।



1. वोटर लिस्ट की सफाई (SIR का कमाल)

इस बार चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने बंगाल की वोटर लिस्ट को पूरी तरह साफ किया। करीब 91 लाख ऐसे नाम हटाए गए जो या तो मर चुके थे या फर्जी थे। इससे कुल वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई। जब बेस (कुल संख्या) कम होता है और वोट देने वाले उतने ही रहते हैं, तो प्रतिशत अपने आप बढ़ जाता है। जानकार इसे वोटिंग रिकॉर्ड टूटने की एक बड़ी तकनीकी वजह मान रहे हैं।



2. महिलाओं के लिए योजनाओं की होड़

बंगाल में महिलाओं को साइलेंट वोटर माना जाता है। ममता बनर्जी की 'लक्ष्मीर भंडार' योजना के जवाब में बीजेपी ने हर महीने 3,000 रुपये देने का वादा किया है। दोनों पार्टियों ने महिलाओं को लुभाने के लिए खजाना खोल दिया है। जब जेब में सीधे पैसे आने की बात होती है, तो महिलाएं बढ़-चढ़कर मतदान करती हैं। यही कारण है कि इस बार बूथों पर महिलाओं की कतारें पुरुषों से लंबी दिखीं।



3. सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम और शांतिपूर्ण चुनाव

बंगाल का नाम आते ही चुनावी हिंसा की तस्वीरें जहन में आती हैं। लेकिन इस बार चुनाव आयोग ने 2.4 लाख जवानों (CAPF) की तैनाती की थी। करीब हर 150 वोटर पर एक सुरक्षाकर्मी तैनात था। जब लोगों के मन से हिंसा का डर निकल गया, तो वे निडर होकर अपने घरों से बाहर निकले। हिंसा कम हुई, तो लोकतंत्र का ग्राफ ऊपर चला गया।



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