सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का हलफनामा, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर कहा- सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए

Sumit Kumar | Oct 26, 2026, 22:20 IST
SIR विवाद और CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अपना पक्ष रखा।
Election Commission of India submits an affidavit in the Supreme Court over the SIR controversy and a petition challenging CEC Gyanesh Kumar's functioning.
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में जवाब दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज के खिलाफ दायर याचिका पर आयोग ने हलफनामा दाखिल किया है। इसमें SIR के फैसलों, फॉर्म-6 और वोटर लिस्ट से जुड़े आरोपों पर सफाई दी गई है। आयोग का कहना है कि सभी प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

एक न्यूज रिपोर्ट के आधार पर दायर हुई याचिका

चुनाव आयोग (Election Commission) ने याचिका में लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए उसके आधार पर सवाल उठाए हैं। आयोग के मुताबिक, याचिका में एक समाचार रिपोर्ट के दावों को आधार बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट में दी गई जानकारी की सच्चाई जानने के लिए आयोग से संपर्क नहीं किया। आयोग का कहना है कि बिना तथ्यों की पुष्टि किए उसके कामकाज पर सवाल उठाए गए हैं।



आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से इस याचिका को खारिज करने की मांग की है। उसका कहना है कि याचिका गलत धारणाओं पर आधारित है और कानूनी रूप से सुनवाई योग्य नहीं है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि हलफनामे को तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्त शामिल हैं।



SIR के तीनों फैसले सर्वसम्मति से लिए गए

चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े तीन प्रमुख आदेशों पर भी सफाई दी है। आयोग के मुताबिक, ये आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए थे। तीनों आदेश आयोग के सभी सदस्यों की सहमति के बाद जारी हुए थे। आयोग ने बताया कि ये फैसले संविधान के अनुच्छेद 324 और संबंधित चुनाव कानूनों के तहत लिए गए।



आयोग ने फाइलों पर दर्ज टिप्पणियों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की है। उसके मुताबिक, किसी प्रस्ताव पर मुख्य चुनाव आयुक्त या अन्य चुनाव आयुक्त सवाल और सुझाव दे सकते हैं। फाइल पर अलग-अलग राय दर्ज होने का मतलब आयोग के सदस्यों के बीच अंतिम असहमति होना नहीं है। सभी संबंधित पक्षों के विचारों पर गौर करने के बाद सक्षम अधिकारी अंतिम निर्णय लेता है।



चुनाव आयोग में कैसे लिए जाते हैं फैसले?

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को फाइलों की मंजूरी से जुड़ी पूरी प्रक्रिया भी समझाई है। आयोग के मुताबिक, सामान्य तौर पर फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास भेजी जाती है। इसके बाद दूसरे चुनाव आयुक्त की राय ली जाती है और फिर फाइल मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंचती है। इस प्रक्रिया के जरिए संबंधित सदस्यों को प्रस्ताव पर अपने विचार रखने का मौका मिलता है।



आयोग ने बताया कि जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी सदस्यों की मंजूरी ली जा सकती है। बाद में इस मंजूरी की जानकारी आधिकारिक फाइल में दर्ज कर दी जाती है। आयोग का कहना है कि अधिकारियों को केवल अपनी निर्धारित शक्तियों के दायरे में काम करना चाहिए। कोई अधिकारी अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश जारी करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।



28 जुलाई के आदेश पर क्यों हुआ विवाद?

चुनाव आयोग ने 28 जुलाई 2026 को जारी कार्य आवंटन संबंधी आदेश पर भी अपना पक्ष रखा है। आयोग के मुताबिक, यह आदेश प्रतिनियुक्ति पर आए अतिरिक्त सचिव स्तर के एक आईएएस अधिकारी ने जारी किया था। आदेश में आयोग के आंतरिक कामकाज और जिम्मेदारियों के बंटवारे से जुड़ी व्यवस्था की गई थी।



हलफनामे के अनुसार, अगले दिन यानी 29 जुलाई को दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे। इन पत्रों में संबंधित आदेश और उसे जारी करने वाले अधिकारी के आचरण पर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद दोनों चुनाव आयुक्तों ने 30 जुलाई को संयुक्त निर्देश जारी किए। आयोग ने बताया कि इन निर्देशों के कारण 28 जुलाई का आदेश लागू नहीं किया गया।



फॉर्म-6 में बदलाव के आरोपों पर आयोग की सफाई

मतदाता पंजीकरण के फॉर्म-6 में कथित बदलाव को लेकर भी चुनाव आयोग ने अपना पक्ष रखा है। आयोग ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म-6 में किसी तरह का संशोधन नहीं किया है। उसके मुताबिक, इस फॉर्म में बदलाव करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। एसआईआर के दौरान इस्तेमाल होने वाला घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है, जिसे फॉर्म-6 में संशोधन नहीं माना जा सकता।



आयोग ने बताया कि घोषणा-पत्र का इस्तेमाल मतदाता की पात्रता और पुराने रिकॉर्ड की जानकारी जुटाने के लिए होता है। इसके जरिए आवेदक के विवरण को पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जोड़ने में मदद मिलती है। इस प्रक्रिया को मैपिंग कहा जाता है। आयोग के मुताबिक, बिहार में एसआईआर के दौरान मिले अनुभवों के बाद घोषणा-पत्र के प्रारूप में बदलाव किया गया था।



नए प्रारूप में आवेदक अपने पुराने मतदाता रिकॉर्ड की जानकारी दे सकता है। इसके अलावा माता-पिता या दादा-दादी के पुराने मतदाता रिकॉर्ड का विवरण भी दिया जा सकता है। यदि पुराने रिकॉर्ड की जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो आवेदक निर्धारित दस्तावेजों के साथ फॉर्म-6 जमा कर सकता है। आयोग ने कहा कि पुराने रिकॉर्ड का विवरण नहीं होने से आवेदन करने का विकल्प खत्म नहीं होता।



ऑनलाइन फॉर्म-6 को लेकर भ्रम कैसे पैदा हुआ?

चुनाव आयोग ने स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में दस्तावेज दिखाने के तरीके से भ्रम पैदा हो सकता था। लोगों को ऐसा लग सकता था कि आयोग ने फॉर्म-6 में बदलाव कर दिया है। इसी समस्या को दूर करने के लिए ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था में सुधार का निर्णय लिया गया।



आयोग के मुताबिक, 21 अक्टूबर 2026 को ऑनलाइन आवेदन के दोनों दस्तावेज अलग दिखाने का फैसला हुआ। इसमें पहला हिस्सा नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म-6 का होगा। दूसरा हिस्सा SIR के घोषणा-पत्र का रहेगा। आयोग ने बताया कि कागजी आवेदन में दोनों दस्तावेज पहले से अलग-अलग उपलब्ध हैं। अब ऑनलाइन व्यवस्था को भी उसी तरीके से तैयार करने का निर्णय लिया गया है।



अनमैप्ड मतदाताओं को सुनवाई के लिए नहीं जाना होगा?

एसआईआर के दौरान पुराने रिकॉर्ड से जिन मतदाताओं की जानकारी नहीं जुड़ पाती, उन्हें अनमैप्ड मतदाता कहा जाता है। ऐसे मतदाताओं को सुनवाई के लिए बुलाने को लेकर भी आयोग ने स्थिति स्पष्ट की है। आयोग के मुताबिक, सभी अनमैप्ड मतदाताओं को व्यक्तिगत सुनवाई के लिए उपस्थित होना जरूरी नहीं है।



आयोग ने बताया कि इस संबंध में 26 सितंबर 2026 को फैसला लिया गया था। इसके तहत अनमैप्ड मतदाताओं या रिकॉर्ड में तार्किक विसंगतियां मिलने पर बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर जाएंगे। वे संबंधित मतदाता से जरूरी दस्तावेज लेकर ECINet पोर्टल पर अपलोड करेंगे। इसके बाद निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) उपलब्ध दस्तावेजों की जांच करके फैसला लेंगे।



आयोग के मुताबिक, केवल विशेष परिस्थितियों में ही मतदाताओं की सुनवाई की जरूरत होगी। ऐसी स्थिति में भी ऑनलाइन सुनवाई को प्राथमिकता दी जाएगी। जरूरत पड़ने पर मतदाता की ओर से परिवार का कोई वयस्क सदस्य भी सुनवाई में शामिल हो सकेगा। आयोग ने जिला निर्वाचन अधिकारियों को हेल्प डेस्क और विशेष शिविरों की व्यवस्था करने के निर्देश देने की जानकारी भी दी है।



ERO के आदेश बिना नहीं कटेगा वोटर का नाम

ECINet पोर्टल की कार्यप्रणाली को लेकर भी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। आयोग के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार करने का कानूनी अधिकार ERO के पास है। ECINet के जरिए इन प्रक्रियाओं को पूरा करने में तकनीकी मदद मिलती है। हालांकि ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या बदला नहीं जा सकता।



आयोग ने कहा कि मतदाता सूची से जुड़े हर बदलाव के लिए निर्धारित नियमों का पालन जरूरी है। संबंधित अधिकारी के आदेश के बाद ही पोर्टल पर प्रक्रिया पूरी की जा सकती है। आयोग ने इस व्यवस्था को लेकर लगाए गए आरोपों पर भी अपना पक्ष रखा है।



ECINet की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई

चुनाव आयोग ने ECINet की सुरक्षा और नियमों के पालन की जांच के लिए समिति बनाने की जानकारी दी है। आयोग के मुताबिक, इस समिति की अध्यक्षता एक वरिष्ठ उप निर्वाचन आयुक्त कर रहे हैं। इसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के विशेषज्ञ भी शामिल हैं।



समिति पोर्टल की तकनीकी व्यवस्था और कानून के पालन से जुड़े पहलुओं की जांच करेगी। आयोग ने बताया कि पोर्टल में सुधार के लिए अधिकारियों और फील्ड कर्मचारियों से सुझाव भी लिए जा रहे हैं। नए मॉड्यूल या बदलावों से जुड़े प्रस्ताव पहले अधिकारियों की समिति के सामने रखे जाएंगे। इसके बाद संबंधित प्रस्तावों पर चुनाव आयोग की मंजूरी ली जाएगी।



गोवा के 97 मतदाताओं पर क्या कहा?

गोवा में मतदाता सूची से कथित तौर पर छूटे 97 लोगों के मामले में भी आयोग ने जवाब दिया है। आयोग ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट का हवाला दिया है। इसके मुताबिक, 97 मामलों में से 88 में फॉर्म-6 पहले ही जमा हो चुका था। इनमें कुछ आवेदन स्वीकार किए जा चुके थे, जबकि बाकी पर प्रक्रिया चल रही थी।



आयोग ने बताया कि छह मामलों में फॉर्म-6 जमा नहीं किया गया था। इनमें विदेशी नागरिकता, विदेश में मौजूदगी और दूसरे स्थान पर चले जाने जैसी परिस्थितियां शामिल थीं। बाकी तीन लोगों के पास पुर्तगाल के पासपोर्ट होने की जानकारी दी गई। आयोग ने कहा कि सभी 97 मामलों को मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की एक जैसी घटना नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले की स्थिति और उससे जुड़े दस्तावेज अलग थे।



पश्चिम बंगाल की अपीलों पर आयोग ने क्या जवाब दिया?

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में कुछ लोगों के नाम शामिल करने के खिलाफ दायर अपीलों पर भी सवाल उठे थे। आयोग ने बताया कि ये अपीलें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत दाखिल की गई थीं। इन्हें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय से जुड़े अधिकारियों ने दायर किया था। आयोग का कहना है कि संबंधित मामले उसके सामने नहीं लाए गए थे।



हलफनामे के मुताबिक, जिन मतदाताओं के नामों को लेकर विवाद था, वे पहले से मतदाता सूची में दर्ज हैं। आयोग ने कहा कि वे संबंधित विधानसभा चुनाव में मतदान करने के पात्र थे। उनके दस्तावेज पोर्टल पर उपलब्ध हैं और उनके पक्ष में न्यायिक अधिकारी का अनुकूल आदेश भी मौजूद है। आयोग ने दावों और आपत्तियों के निपटारे से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का भी हवाला दिया है। इन आदेशों में अपीलों की सुनवाई और संबंधित प्रक्रिया का उल्लेख किया गया था।



CEC को काम करने से रोकने की मांग पर क्या कहा?

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर रोक लगाने की मांग को लेकर आयोग ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया है। आयोग के मुताबिक, संविधान के अनुच्छेद 324(5) में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया तय है। यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया जैसी है।



आयोग ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को काम करने से रोकने की मांग वाली याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। उसने 2023 के कानून में तय फैसले लेने की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया है। आयोग के मुताबिक, इसमें बहुमत या सर्वसम्मति के आधार पर निर्णय लेने की व्यवस्था है। इस व्यवस्था को नजरअंदाज करके CEC के कामकाज पर रोक लगाने से आयोग की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। इसी आधार पर आयोग ने याचिका खारिज करने की मांग दोहराई है।



मीडिया को आंतरिक फाइलें देने के आरोपों से इनकार

चुनाव आयोग ने अपनी आंतरिक फाइलों और टिप्पणियों से जुड़ी जानकारी मीडिया को देने के आरोप खारिज किए हैं। आयोग ने कहा कि उसने कोई आंतरिक नोट या फाइल किसी समाचार एजेंसी को नहीं दी। ऐसी जानकारी सार्वजनिक करने की अनुमति भी किसी को नहीं दी गई थी।



आयोग के मुताबिक, किसी समाचार रिपोर्ट में दावा प्रकाशित होने से वह अपने आप प्रमाणित तथ्य नहीं बन जाता। आयोग ने कहा कि याचिकाकर्ता ने रिपोर्ट में दी गई जानकारी की पुष्टि भी नहीं कराई थी। इसी आधार पर उसने याचिका को गलत धारणाओं पर आधारित बताया है। आयोग ने अदालत से इन आरोपों को स्वीकार नहीं करने का अनुरोध किया है।



EVM से जुड़े पुराने विवादों पर भी सफाई

चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर उठाए गए सवालों का भी जवाब दिया है। आयोग के मुताबिक, EVM से जुड़े कई मुद्दे पहले भी सुप्रीम कोर्ट के सामने आ चुके हैं। अदालत इस तरह की कई चुनौतियों पर पहले ही फैसला दे चुकी है। आयोग ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए याचिका में उठाए गए EVM संबंधी आरोपों को गलत और भ्रामक बताया है।



आयोग ने SIR की कानूनी स्थिति को लेकर भी अपना पक्ष रखा है। उसके मुताबिक, यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत संचालित की जा रही है। आयोग ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी इस प्रक्रिया के कई पहलुओं को स्वीकार कर चुका है। उसने संबंधित न्यायिक आदेशों को अपनी दलीलों का आधार बनाया है।



दशहरा अवकाश के कारण फिलहाल संक्षिप्त हलफनामा

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि दशहरा अवकाश के कारण फिलहाल संक्षिप्त जवाब दाखिल किया गया है। आयोग ने अदालत से विस्तृत और बिंदुवार हलफनामा पेश करने की अनुमति मांगी है। यह जवाबी हलफनामा आयोग के उप निर्वाचन आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु की ओर से दाखिल किया गया है।



हलफनामे में आयोग ने SIR के आदेशों और अपनी निर्णय प्रक्रिया का बचाव किया है। इसके साथ फॉर्म-6, ECINet, मतदाता सूची और CEC के संवैधानिक अधिकारों पर भी सफाई दी है। आयोग ने याचिका के आरोपों को खारिज करते हुए इसे सुनवाई योग्य नहीं बताया है। हालांकि इन दलीलों और याचिका में उठाए गए सवालों पर अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है।

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