EPF के 64 साल पुराने नियमों में बदलाव, कर्मचारी संगठन नाराज
समझें क्या है पूरा मामला
- केंद्र सरकार ने ईपीएफ नियमों में बदलाव किया है।
- कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले पर विरोध जताया है।
- उनका दावा है कि वर्करों को नुकसान होगा।
- नए नियम से नियोक्ताओं को फायदा बताया गया है।
- देशभर में कर्मचारी संगठन विरोध की तैयारी कर रहे हैं।
नए नियम में क्या बदला
सरकार का कहना है कि नए नियम से कर्मचारियों की तनख्वाह में इजाफा होगा। दरअसल कर्मचारी का अंशदान 12 प्रतिशत से घटाया जा रहा है। इससे कर्मचारी के हाथ में हर महीने ज्यादा नकद वेतन आएगा। लेकिन कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह तस्वीर अधूरी है।
सरकार की योजना 2026 के तहत देश के 7.31 करोड़ कर्मचारियों और वर्कर्स पर सीधा असर पड़ने का अनुमान है। संगठनों के मुताबिक इसका परोक्ष असर करीब 30 करोड़ लोगों तक पहुंच सकता है।
पुरानी व्यवस्था में क्या मिलता था
मौजूदा नियम में कर्मचारी की सैलरी का 12 प्रतिशत हिस्सा अंशदान के रूप में कटता है। इतना ही अंशदान नियोक्ता की तरफ से भी जमा होता है। इसके अलावा 1.61 प्रतिशत राशि स्थापना और बीमा में कटती है।
यह व्यवस्था कारखानों, निगम मंडलों, बोर्ड, विश्वविद्यालयों और लिमिटेड कंपनियों तक लागू है। इसमें भेल और भिलाई जैसे बड़े संस्थानों के कर्मचारी भी शामिल हैं। संगठनों का कहना है कि यही ढांचा कर्मचारियों के हितों की रक्षा करता आया है।
पुरानी योजना से कितना फायदा होता था
सेवानिवृत्त कर्मचारी भविष्य निधि कल्याण समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चंद्रशेखर परसाई के मुताबिक पुरानी योजना का गणित साफ है। एक लाख रुपए सैलरी पाने वाले कर्मचारी का कुल अंशदान हर महीने 24 हजार रुपए बनता है। इस हिसाब से साल भर में यह राशि 2 लाख 88 हजार रुपए तक पहुंच जाती है।
परसाई के अनुसार नई योजना में यही राशि घटकर 43 हजार 200 रुपए रह जाएगी। इस तरह एक कर्मचारी को सालाना करीब 2 लाख 63 हजार रुपए का सीधा नुकसान होगा।
नियोक्ता को कैसे मिलेगा फायदा
मध्य प्रदेश संविदा कर्मचारी अधिकारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष रमेश राठौर का कहना है कि सबसे बड़ा फायदा नियोक्ताओं को होगा। नए नियम में 15 हजार रुपए वेतन पर नियोक्ता को सिर्फ 1800 रुपए मासिक अंशदान देना होगा। अभी यही राशि 12 हजार रुपए प्रतिमाह है।
राठौर के मुताबिक इससे नियोक्ता को हर महीने करीब 10200 रुपए की सीधी बचत होगी। साथ ही कर्मचारी को मिलने वाला नियोक्ता अंशदान भी घट जाएगा। इसका असर सीधे रिटायरमेंट के समय मिलने वाले फंड पर पड़ेगा।
राठौर ने यह भी कहा कि कर्मचारी संगठन वर्षों से 15 हजार रुपए की वेतन सीमा हटाने की मांग करते आए हैं। उनका सुझाव है कि पूरे वेतन पर ही समान अंशदान तय होना चाहिए।
संगठनों की सरकार से मांग
चंद्रशेखर परसाई और रमेश राठौर दोनों ने केंद्र सरकार से (EPF) कर्मचारी भविष्य निधि योजना 2026 पर दोबारा विचार करने की मांग की है। उनका सुझाव है कि वेतन सीमा को पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए। इससे कर्मचारी और नियोक्ता दोनों का अंशदान पूरे वेतन पर तय हो सकेगा।
दोनों नेताओं का कहना है कि रिटायरमेंट के समय यही फंड कर्मचारी और उसके परिवार के काम आता है। यही वजह है कि देशभर के कर्मचारी संगठन अब लामबंद होकर इस बदलाव का विरोध करने की तैयारी में हैं।
EPF है क्या?
ईपीएफ वेतनभोगी कर्मचारियों की रिटायरमेंट बचत योजना है। इसका संचालन ईपीएफओ करता है। कर्मचारी हर महीने तय राशि जमा करता है। कंपनी भी हर महीने योगदान देती है। इस राशि पर सरकार ब्याज तय करती है। मौजूदा ब्याज दर 8.25 प्रतिशत है। जरूरत पर यह पैसा निकाला जा सकता है। रिटायरमेंट के बाद भी राशि निकाली जा सकती है। नए नियमों में कर्मचारी का योगदान 12 प्रतिशत रहेगा। कंपनी का न्यूनतम योगदान 1800 रुपए होगा। ईपीएफ के साथ पेंशन लाभ भी मिलता है। कर्मचारियों को जीवन बीमा का लाभ भी मिलता है।
FAQ
- ईपीएफ के नए नियम से किसे फायदा होगा?
कर्मचारी संगठनों के मुताबिक इससे मिल मालिकों और नियोक्ताओं को फायदा होगा। नियोक्ता का मासिक अंशदान काफी कम हो जाएगा। - पुरानी और नई योजना में कितना अंतर है?
पुरानी योजना में एक लाख सैलरी पर सालाना अंशदान 2 लाख 88 हजार रुपए बनता था। नई योजना में यह घटकर 43 हजार 200 रुपए रह जाएगा। - कर्मचारी संगठनों की क्या मांग है?
संगठन चाहते हैं कि सरकार नए नियमों पर पुनर्विचार करे। साथ ही वेतन सीमा हटाकर पूरे वेतन पर अंशदान तय हो।
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