फूड सेफ्टी की हकीकत: राजस्थान में मिलावट पर सिर्फ 31 को सजा, एमपी और छ्त्तीसगढ़ के हाल भी अच्छे नहीं
पांच साल में 1.85 लाख सेंपल फेल
फूड सेफ्टी एंड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की फूड के गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े जुटाता है। इसके आंकड़ों के मुताबिक, 2021-22 से 2025-26 के बीच देश में 8.86 लाख फूड सेंपल की जांच हुई। इनमें एक लाख 85 हजार 780 सेंपल फेल मिले। यानी ये सेंपल तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। इन मामलों में एक लाख 39 हजार 507 का निपटारा जुर्माना लगाकर किया गया। वहीं, सिर्फ छह हजार 203 मामलों में दोषियों को सजा मिली।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि बड़ी संख्या में मामलों में जुर्माना लगाकर कार्रवाई पूरी कर दी गई। सजा मिलने वाले मामलों की संख्या इसके मुकाबले काफी कम रही।
हर साल बढ़ी सजा की दर
पिछले पांच साल में दोषियों को सजा मिलने की दर में कुछ सुधार जरूर हुआ है। हालांकि, यह अब भी 5% से नीचे है। 2021-22 में 32 हजार 935 सेंपल फेल हुए थे। इनमें 671 मामलों में सजा हुई। यह दर करीब 2% थी। 2022-23 में 44 हजार 626 सेंपल फेल मिले और एक हजार 188 मामलों में सजा हुई।
इसके बाद भी स्थिति में थोड़ा सुधार आया। 2023-24 में सजा की दर 3.4% और 2024-25 में 3.7% रही। 2025-26 में यह बढ़कर 4.8% हो गई। यानी कार्रवाई में सुधार के बावजूद फेल सेंपल के मुकाबले सजा पाने वाले मामलों की संख्या कम है। फूड एडल्ट्रेशन यानी खाने में मिलावट रोकने के लिए सिर्फ सेंपल की जांच करना ही काफी नहीं है। दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है।
दूध के 37% सेंपल तय मानकों पर फेल
दूध और डेयरी प्रोडक्ट की जांच के आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं। साल 2025-26 में दूध और डेयरी उत्पादों के 39 हजार 351 नमूनों की जांच हुई। इनमें 14 हजार 668 सेंपल फेल मिले। यानी करीब 37.3% सेंपल तय मानकों पर खरे नहीं उतरे।
यह जानकारी केंद्रीय पशुपालन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने लोकसभा में दी। दूध का इस्तेमाल लगभग हर घर में होता है। ऐसे में इसके नमूनों का इतनी बड़ी संख्या में फेल होना लोगों की चिंता बढ़ाता है।
मध्यप्रदेश में सजा की दर कम
मध्यप्रदेश में भी खाने में मिलावट के मामलों में दोषियों को सजा मिलने की दर कम है। साल 2025-26 में फेल हुए खाद्य नमूनों के करीब 4% मामलों में ही सजा हुई। यह राष्ट्रीय औसत 4.8% से भी कम है। यानी राज्य में मिलावट के दोषियों पर कार्रवाई और सजा दिलाने की प्रक्रिया में सुधार की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ में 10.4% सेंपल फेल
छत्तीसगढ़ में फूड सेंपल के फेल होने की दर कुछ कम रही। साल 2025-26 में यहां दो हजार 65 सेंपल की जांच की गई। इनमें 214 सेंपल फेल मिले। यानी करीब 10.4% सेंपल तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। यह दर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों से कम है। हालांकि, नमूनों के फेल होने की कम दर का मतलब यह नहीं है कि खाद्य सुरक्षा को लेकर आगे जांच और निगरानी की जरूरत नहीं है।
जानें एक्सपर्ट की राय
यूपी में आधे से ज्यादा सेंपल फेल
उत्तर प्रदेश में फूड सेंपल के फेल होने के मामले सबसे ज्यादा सामने आए। साल 2025-26 में यहां 39 हजार 519 सेंपल की जांच हुई। इनमें 20 हजार 427 सेंपल फेल मिले। यानी जांचे गए नमूनों में 51.7% तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। देशभर में फेल हुए कुल नमूनों में आधे से ज्यादा उत्तर प्रदेश के थे। इसके बावजूद राज्य में सिर्फ 342 मामलों में सजा हुई।
इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में गड़बड़ी मिलने के बाद भी दोषियों को सजा दिलाना चुनौती बना हुआ है। दूसरे राज्यों के आंकड़े भी ध्यान देने लायक हैं। हरियाणा में 31% और झारखंड में 27.8% सेंपल फेल हुए हैं। महाराष्ट्र में यह आंकड़ा 17.4% और पंजाब में 13.2% रहा।
राजस्थान में 4,594 सेंपल फेल, सजा सिर्फ 31 मामलों में
राजस्थान में भी खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर चिंता सामने आई है। साल 2025-26 में राज्य में 17 हजार 325 सेंपल की जांच की गई। इनमें चार हजार 594 सेंपल फेल मिले। यह कुल जांचे गए सेंपल का 26.5% है। फेल नमूनों की संख्या के मामले में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर रहा। लेकिन यहां सिर्फ 31 मामलों में सजा हुई। यह दर एक % से भी कम है।
उत्तर प्रदेश और राजस्थान को मिलाकर देखें, तो देश के कुल फेल नमूनों में इन दोनों राज्यों की हिस्सेदारी करीब 62.5% है। इसके उलट, कुल सजा के मामलों में इनका हिस्सा करीब 19% ही है। यानी इन राज्यों में सेंपल फेल होने के मामले ज्यादा हैं, लेकिन सजा के मामले उस अनुपात में नहीं हैं।
तमिलनाडु और केरल में सजा की दर बेहतर
खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में सभी राज्यों का प्रदर्शन एक जैसा नहीं है। कुछ राज्यों में फेल नमूनों के मुकाबले सजा की दर बेहतर रही। तमिलनाडु में तीन हजार 984 सेंपल फेल मिले। इनमें 857 मामलों में सजा हुई। इस तरह सजा की दर करीब 21.5% रही। केरल में एक हजार 863 सेंपल फेल हुए और 330 मामलों में सजा मिली। यहां यह दर करीब 17.7% रही।
हरियाणा में सजा की दर करीब 16% और दिल्ली में 14.7% रही। वहीं, दिए गए आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, गोवा, असम, बिहार और पुडुचेरी में किसी भी मामले में सजा दर्ज नहीं हुई। इन आंकड़ों से सवाल उठता है कि जब सभी राज्यों में खाद्य सुरक्षा कानून लागू है, तो कार्रवाई के नतीजों में इतना अंतर क्यों है? यह अंतर जांच, कानूनी कार्रवाई और मामलों के निपटारे की प्रक्रिया पर ध्यान देने की जरूरत दिखाता है।
खाद्य सुरक्षा कानून में सजा का प्रावधान क्या है?
खाद्य सुरक्षा कानून, 2006 में नियम तोड़ने वालों के लिए जेल और जुर्माने का प्रावधान है। असुरक्षित खाद्य पदार्थों से गंभीर नुकसान होने पर छह साल तक की जेल हो सकती है। इसके साथ पांच लाख रुपए तक का जुर्माना भी लग सकता है।अगर असुरक्षित खाने से किसी की मौत हो जाती है, तो उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे मामले में कम से कम 10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि हर फेल नमूना मिलावट का मामला नहीं होता। जांच में असुरक्षित खाद्य पदार्थ, तय मानकों से कमजोर गुणवत्ता वाले उत्पाद और गलत लेबल वाले सामान भी शामिल हो सकते हैं। सरकार इन सभी श्रेणियों का अलग-अलग ब्योरा नहीं देती।
सरकार के मुताबिक, करीब 98% खाद्य कारोबारी राज्यों के दायरे में आते हैं। इसलिए खाद्य पदार्थों की जांच और नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई में राज्य सरकारों की भूमिका अहम है।
11 हजार 493 लाइसेंस हुए रद्द
खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांचने के लिए सरकार ने निरीक्षण भी बढ़ाए हैं। साल 2025-26 में देशभर में पांच लाख 20 हजार 566 निरीक्षण किए गए। इससे पहले 2024-25 में चार लाख एक हजार 391 और 2023-24 में तीन लाख 57 हजार 72 निरीक्षण हुए थे। पिछले पांच साल में चार हजार 461 लाइसेंस निलंबित और 11 हजार 493 लाइसेंस रद्द किए गए। ये कदम खाद्य सुरक्षा के नियमों का पालन कराने के लिए उठाए गए।
लेकिन केवल निरीक्षण बढ़ाना ही काफी नहीं है। जांच में गड़बड़ी मिलने पर समय पर कार्रवाई और दोषियों को सजा मिलना भी जरूरी है। जब सजा की दर कम रहती है, तो नियम तोड़ने वालों पर कार्रवाई का डर कमजोर पड़ सकता है।
आम लोगों के लिए यह खबर क्यों जरूरी है?
दूध, घी, मसाले और मिठाई जैसी चीजें रोजमर्रा के खाने का हिस्सा हैं। इसलिए इनकी गुणवत्ता का सीधा संबंध लोगों की सेहत से है। फूड सेंपल का फेल होना बताता है कि बाजार में मिलने वाले सभी उत्पाद तय मानकों पर खरे नहीं उतरते।संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार से जुड़ा है। वहीं, अनुच्छेद 47 सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने की जिम्मेदारी राज्य को सौंपता है।
ऐसे में खाद्य सुरक्षा से जुड़े मामलों में जांच के साथ जवाबदेही भी जरूरी है। सरकार और संबंधित विभागों के सामने चुनौती है कि मिलावट और घटिया खाद्य पदार्थों के मामलों में कार्रवाई प्रभावी हो। लोगों की थाली सुरक्षित बनाने के लिए नियमों का पालन और दोषियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई दोनों जरूरी हैं।
FAQs
- साल 2025-26 में देश में कितने खाद्य नमूने फेल हुए?
साल 2025-26 में देशभर में 40,023 खाद्य नमूने तय मानकों पर खरे नहीं उतरे। - पांच साल में खाद्य मिलावट के कितने मामलों में दोषियों को सजा मिली?
पिछले पांच वर्षों में, केवल 6,203 मामलों में दोषियों को सजा मिली है। - उत्तर प्रदेश में खाद्य नमूनों के फेल होने की दर क्या है?
उत्तर प्रदेश में 2025-26 में 51.7% खाद्य नमूने फेल हुए, जिसमें 39,519 नमूनों की जांच की गई थी।