कभी चावल के लिए तरसता वियतनाम,आज कैसे बना दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब? 1986 के इस फैसले ने बदली देश की तस्वीर
वियतनाम की किस्मत बदलने की शुरुआत 1986 में हुई थी। उस साल सरकार ने आर्थिक सुधार लागू किए थे। आइए जानते हैं कैसे हुआ ये बदलाव...
युद्ध से बर्बाद हुआ था वियतनाम
वियतनाम दक्षिण-पूर्व एशिया में बसा एक देश है। इसकी राजधानी हनोई है। यहां करीब 10.2 करोड़ लोग रहते हैं। इस देश ने लंबे समय तक विदेशी शासन और युद्ध का सामना किया था। साल 1887 से 1954 तक वियतनाम पर फ्रांस का शासन रहा था।
इसके बाद देश में करीब 21 साल तक युद्ध चला। इस दौरान अमेरिका ने वियतनाम पर जमकर बमबारी की थी। एक अनुमान के मुताबिक करीब 46 लाख टन बम गिराए गए थे। युद्ध में खतरनाक रसायनों का भी इस्तेमाल हुआ था। इनमें एजेंट ऑरेंज नाम का जहरीला रसायन भी शामिल था।
30 अप्रैल 1975 को युद्ध खत्म हुआ। इसके बाद 2 जुलाई 1976 को उत्तर और दक्षिण वियतनाम एक हो गए। हालांकि युद्ध खत्म होने के बाद भी लोगों की परेशानियां खत्म नहीं हुईं।
खेतों और जमीन के अंदर बड़ी संख्या में बिना फटे बम पड़े थे। इस वजह से कई इलाकों में खेती करना जानलेवा साबित हो सकता था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014 तक इन विस्फोटकों से करीब 40 हजार लोगों की जान चली गई। वहीं लगभग 60 हजार लोग घायल हुए थे।
भूख के लिए चावल से चलाना पड़ता था काम
युद्ध ने वियतनाम की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह हिला दिया था। 1980 के दशक में वियतनाम दुनिया के सबसे गरीब देशों में गिना जाता था। महंगाई इतनी बढ़ गई थी कि आम लोगों का गुजारा मुश्किल हो गया था। देश में खाने-पीने की चीजों की भारी कमी थी।
हालात ऐसे थे कि लोगों का पेट भरने के लिए दूसरे देशों से चावल मंगाना पड़ता था। सरकार के सामने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की बड़ी चुनौती थी। इसके लिए खेती की पैदावार बढ़ाना और कारोबार को आगे ले जाना जरूरी था।
1986 में एक फैसले ने बदल दी वियतनाम की तस्वीर
साल 1986 वियतनाम के लिए बदलाव का बड़ा साल साबित हुआ है। इसी साल वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने अर्थव्यवस्था सुधारने का फैसला किया है। सरकार ने नई आर्थिक नीति शुरू की। इसे दोई मोई (Doi Moi)नाम दिया गया। इसका मतलब है नवीनीकरण यानी पुरानी व्यवस्था में बदलाव लाना।
इस नीति के तहत सरकार ने निजी कारोबार को बढ़ावा देना शुरू किया। लोगों को अपना कारोबार करने के ज्यादा मौके मिलने लगे। बाजार से जुड़ी कई पाबंदियां भी कम की गईं। इन Economic Reforms का मकसद देश में उत्पादन बढ़ाना और अर्थव्यवस्था को मजबूत करना था।
सरकार ने खेती के नियमों में भी बड़े बदलाव किए। किसानों को अपनी फसल बाजार में बेचने की ज्यादा छूट मिली। जमीन के इस्तेमाल से जुड़े अधिकार भी बढ़ाए गए। इससे किसानों को ज्यादा उत्पादन करने का फायदा मिलने लगा। धीरे-धीरे खेती का उत्पादन बढ़ा और वियतनाम की अर्थव्यवस्था में सुधार आने लगा।
चावल आयात करने वाला देश बना बड़ा एक्सपोर्टर
आर्थिक सुधारों के बाद वियतनाम की खेती में बड़ा बदलाव आया। साल 1986 में देश में करीब 1.82 करोड़ टन चावल पैदा होता था। 1990 तक यह बढ़कर लगभग 2.45 करोड़ टन हो गया। पहले वियतनाम को दूसरे देशों से चावल खरीदना पड़ता था।
अब वह खुद चावल बेचने लगा था। साल 1989 में उसने करीब 14 लाख टन चावल दूसरे देशों को बेचा। 1997 तक वियतनाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चावल एक्सपोर्टर बन गया। कॉफी की खेती में भी देश ने तेजी से तरक्की की। साल 2000 तक वियतनाम कॉफी एक्सपोर्ट में ब्राजील के बाद दूसरे नंबर पर पहुंच गया था।
विदेशी कंपनियों के लिए खोले दरवाजे
वियतनाम ने खेती के साथ उद्योगों पर भी ध्यान दिया।साल 1987 में विदेशी निवेश से जुड़ा कानून बनाया गया। इसके जरिए विदेशी कंपनियों को कारोबार करने के नए अवसर मिले।
इस प्रक्रिया को Foreign Direct Investment यानी FDI कहा जाता है। इसके बाद देश में कारखानों और निजी कारोबार का विस्तार हुआ। 1995 में वियतनाम दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संगठन ASEAN में शामिल हुआ।
साल 2007 में उसे विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता मिली। इन फैसलों से दूसरे देशों के साथ व्यापार बढ़ाने में मदद मिली।
सैमसंग ने वियतनाम को बनाया मोबाइल का बड़ा हब
विदेशी कंपनियों ने वियतनाम में निवेश बढ़ाया तो इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबार भी तेजी से बढ़ने लगा। साल 2009 में सैमसंग ने यहां मोबाइल फोन बनाने शुरू किए। धीरे-धीरे वियतनाम सैमसंग के स्मार्टफोन उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है।
एप्पल से जुड़ी कई कंपनियां भी वियतनाम में काम कर रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक एप्पल के 35 सप्लायर यहां मौजूद हैं। इंटेल ने भी हो ची मिन्ह सिटी में चिप असेंबली और टेस्टिंग यूनिट लगाई है।
इस तरह वियतनाम मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान बनाने वाला बड़ा देश बन गया है।
नूडल्स बेचने वाले कारोबारी ने खड़ी कर दी कार कंपनी
वियतनाम की तरक्की में कारोबारी फाम न्हात वुओंग की भी बड़ी भूमिका रही है। उनका जन्म 1968 में हनोई में हुआ था। पढ़ाई के लिए उन्हें स्कॉलरशिप मिली और वे मॉस्को चले गए।
साल 1993 में वुओंग यूक्रेन पहुंचे। यहां उन्होंने सबसे पहले एक रेस्टोरेंट खोला। इसके बाद इंस्टैंट नूडल्स बनाने का काम शुरू किया। उन्होंने अपने नूडल्स ब्रांड का नाम मिविना रखा। देखते ही देखते उनका कारोबार तेजी से बढ़ने लगा।
साल 2010 में उन्होंने अपना नूडल्स कारोबार नेस्ले को बेच दिया। इस सौदे की अनुमानित कीमत करीब 15 करोड़ डॉलर थी। इससे मिले पैसों का एक हिस्सा उन्होंने वियतनाम में निवेश किया।
इसके बाद वुओंग ने विनग्रुप को एक बड़े कारोबारी समूह के रूप में विकसित किया। इस समूह ने रियल एस्टेट, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कारोबार बढ़ाया।
वुओंग यहीं नहीं रुके। उन्होंने इलेक्ट्रिक कार बनाने के लिए विनफास्ट कंपनी भी शुरू की। यह कंपनी अब भारत में भी पहुंच चुकी है। अगस्त 2025 में विनफास्ट ने तमिलनाडु के थूथुकुडी में अपना कारखाना शुरू किया है।
आज कितनी बड़ी है अर्थव्यवस्था?
IMF अनुमान के अनुसार 2026 में वियतनाम की अर्थव्यवस्था करीब 527 अरब डॉलर की है। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 50 लाख करोड़ रुपए बैठता है। यह गणना 96 रुपए प्रति डॉलर के आधार पर है।
देश की प्रति व्यक्ति औसत सालाना आय करीब पांच हजार 115 डॉलर बताई गई है। वियतनाम अब कपड़े और जूतों के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स का भी बड़ा एक्सपोर्टर है।
जुलाई 2026 में स्मार्टफोन और उनके पुर्जों का एक्सपोर्ट करीब 6.8 अरब डॉलर बताया गया है। यह लगभग 65 हजार करोड़ रुपए के बराबर है।
गरीबी में भी आई बड़ी कमी
वियतनाम में आर्थिक सुधारों के बाद गरीबी घटने लगी थी। साल 1993 में करीब 60 प्रतिशत आबादी गरीबी में थी। 2014 तक यह आंकड़ा घटकर लगभग 14 प्रतिशत रह गया। इस दौरान करीब चार करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले।
बिजली की पहुंच में भी बड़ा बदलाव आया था। 1993 में आधे से कम घरों तक बिजली पहुंचती थी। अब लगभग सभी घरों में बिजली उपलब्ध है।
हालांकि तेज विकास के बावजूद कई चुनौतियां बनी हुई हैं। आय की असमानता और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था एक्सपोर्ट पर भी काफी निर्भर है।
भारत और वियतनाम के बीच बढ़ रहा कारोबार
भारत और वियतनाम के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मई 2026 में वियतनाम के राष्ट्रपति टो लाम भारत आए थे। इस दौरान दोनों देशों ने व्यापार और निवेश बढ़ाने पर चर्चा की थी।
दोनों देशों ने साल 2030 तक आपसी व्यापार 25 अरब डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाओं और डिजिटल पेमेंट जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की तैयारी है।
इससे भारतीय इंजीनियरों को वियतनाम में नौकरी के नए मौके मिल सकते हैं। खासकर सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में अवसर बढ़ने की उम्मीद है।
हालांकि वियतनाम में नौकरी करने के लिए वर्क परमिट जरूरी है। केवल टूरिस्ट ई-वीजा लेकर वहां नौकरी नहीं की जा सकती।
भारत वियतनाम से क्या सीख सकता है?
वियतनाम ने अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए कई बड़े बदलाव किए हैं। सबसे पहले खेती के तरीके बदले और किसानों को बाजार से जोड़ा है। इससे किसानों को अपनी उपज बेचने के बेहतर मौके मिले हैं।
इसके बाद विदेशी कंपनियों को देश में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। नए कारखाने खुले और उनके लिए सामान पहुंचाने की सुविधाएं बढ़ाई गईं। छोटे उद्योगों को भी बड़े कारखानों से जुड़ने का मौका मिला।
भारत भी वियतनाम के अनुभव से काफी कुछ सीख सकता है। बड़ी कंपनियों के साथ छोटे उद्योगों को जोड़कर रोजगार बढ़ाया जा सकता है। किसानों को अच्छे बाजार और उद्योगों को प्रशिक्षित कर्मचारी मिलें तो उत्पादन भी बढ़ सकता है।
वियतनाम कभी युद्ध से बुरी तरह तबाह हो गया था। आज उसने आर्थिक विकास में काफी तरक्की की है। हालांकि देश के सामने अब भी कई चुनौतियां हैं। वियतनाम का अनुभव बताता है कि सही नीतियों और लगातार सुधारों से किसी भी देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है।
FAQ
- वियतनाम ने युद्ध के बाद अपनी आर्थिक स्थिति को कैसे सुधारा?
वियतनाम ने 1986 में दोई मोई आर्थिक सुधार लागू किए, जिसके तहत खेती और निजी कारोबार को बढ़ावा मिला, और विदेशी निवेश के अवसर खोले गए। इसके परिणामस्वरूप उत्पादन और निर्यात में वृद्धि हुई। - दोई मोई सुधार क्या है और यह कब शुरू हुआ था?
दोई मोई सुधार 1986 में शुरू हुए थे, जिसका अर्थ है नवीनीकरण। इस नीति के तहत किसानों को अपनी उपज बेचने की आजादी मिली और निजी कारोबार को एक नई दिशा मिली। - वियतनाम कैसे एक प्रमुख स्मार्टफोन उत्पादन केंद्र बन गया?
वियतनाम ने विदेशी कंपनियों के निवेश के लिए दरवाजे खोले, जैसे कि सैमसंग ने 2009 में वहां मोबाइल उत्पादन शुरू किया, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग का विकास हुआ।