सपनों से दूर हो रही बेटियां, 12वीं तक आते-आते लड़कियां छोड़ रही पढ़ाई
समझें क्या है पूरा मामला...
- देश में सरकारी स्कूलों की संख्या लगातार घट रही है।
- पांच साल में 17 हजार141 सरकारी स्कूल कम हो गए हैं।
- 12वीं तक पहुंचते पहुंचते लगभग आधी छात्राएं स्कूल छोड़ देती हैं।
- एससी और एसटी बच्चों की स्कूली पहुंच भी तय लक्ष्य से पीछे है।
- सरकार ने संसद में यह जानकारी लिखित जवाब में दी है।
स्कूलों की घटती संख्या
लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 2021-22 में 10 लाख 22 हजार 386 थी। यह संख्या 2025-26 में घटकर 10 लाख 5 हजार 245 रह गई है। यानी पांच साल के भीतर 17 हजार 141 सरकारी स्कूल कम हुए।
शिक्षा मंत्रालय ने यह आंकड़े संसद में एक सवाल के जवाब में साझा किए। सांसदों ने सरकारी स्कूलों की घटती संख्या पर सीधा सवाल पूछा था। जवाब में साफ हुआ कि हर साल स्कूलों की संख्या में गिरावट जारी है।
छात्राओं का स्कूल छोड़ना
आंकड़ों के मुताबिक 12वीं तक पहुंचने वाली लड़कियों की हिस्सेदारी 2025-26 में सिर्फ 55 प्रतिशत रही है। इसका मतलब है कि हर 100 लड़कियों में से केवल 55 ही 12वीं तक पढ़ाई जारी रख पाती हैं। बाकी लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं।
यह आंकड़ा रिटेंशन दर कहलाता है। रिटेंशन दर बताती है कि कितने बच्चे शुरुआती कक्षा से 12वीं तक टिके रहते हैं। लड़कियों के मामले में यह दर लड़कों की तुलना में अब भी कमजोर मानी जाती है।
एससी-एसटी बच्चों की स्थिति
9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई में एससी और एसटी बच्चों की पहुंच भी लक्ष्य से काफी दूर है। 2025-26 में इस स्तर पर एससी बच्चों का दाखिला यानी सकल नामांकन अनुपात (जीईआर – Gross Enrolment Ratio) 75.2 प्रतिशत रहा। वहीं एसटी बच्चों का यह आंकड़ा 71 प्रतिशत दर्ज हुआ।
एडमिशन के आंकड़े
सरकार द्वारा जारी तालिका के अनुसार अलग अलग स्तर पर दाखिले की स्थिति इस प्रकार रही।
प्री प्राइमरी से कक्षा 2 तक एससी बच्चों का एडमिशन 2024-25 में 38.8 प्रतिशत था। यह 2025-26 में बढ़कर 39.7 प्रतिशत हो गया। एसटी बच्चों में यही आंकड़ा 44.3 से बढ़कर 46.1 प्रतिशत पहुंचा।
कक्षा 3 से 5 तक एससी बच्चों का एडमिशन 99.8 से घटकर 95.0 प्रतिशत रह गया। एसटी बच्चों का आंकड़ा भी 101.7 से घटकर 100.0 प्रतिशत हुआ। कक्षा 6 से 8 तक भी दोनों वर्गों में मामूली गिरावट दर्ज हुई।
सबसे बड़ी चुनौती कक्षा 9 से 12 तक की है। यहां एससी बच्चों का एडमिशन 70.8 से बढ़कर 75.2 प्रतिशत हुआ। एसटी बच्चों का आंकड़ा 66.9 से बढ़कर 71.0 प्रतिशत पहुंचा। फिर भी यह राष्ट्रीय औसत से कम है।
सरकार का सुधार का दावा
सरकार का कहना है कि पिछले साल के मुकाबले स्थिति में कुछ सुधार दर्ज हुआ है। 9वीं से 12वीं तक पहुंचने वाली लड़कियों और एससी एसटी बच्चों की संख्या में मामूली बढ़त देखी गई। 10वीं और 12वीं तक पढ़ाई जारी रखने वाली लड़कियों का अनुपात भी पहले से बेहतर हुआ है।
समग्र शिक्षा योजना के तहत राज्यों को वित्तीय मदद दी जा रही है। इसमें स्कूलों के बुनियादी ढांचे, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और परिवहन सुविधा शामिल है। सरकार का दावा है कि इससे धीरे धीरे स्थिति सुधरेगी।
किन राज्यों में हालात खराब
कुछ राज्यों में स्थिति राष्ट्रीय औसत से भी ज्यादा खराब है। मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे राज्यों में 12वीं तक पहुंचने वाली छात्राओं की संख्या काफी कम है। इन राज्यों में सकल नामांकन अनुपात राष्ट्रीय औसत से नीचे है।
आंकड़े साफ बताते हैं कि माध्यमिक शिक्षा तक सभी बच्चे नहीं पहुंच पाते। खासकर दूरदराज और आदिवासी बहुल इलाकों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है। विशेषज्ञ इसे स्कूलों की कमी और आर्थिक तंगी से भी जोड़कर देखते हैं।
घटती स्कूलों की संख्या और छात्राओं के बीच में पढ़ाई छोड़ने की समस्या आपस में जुड़ी हुई मानी जा रही है। जानकार कहते हैं कि दूर स्कूल होने पर लड़कियों की पढ़ाई सबसे पहले प्रभावित होती है। आने वाले वर्षों में सरकार के सामने यह एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
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