क्यों पिघल रहे हिमालय के ग्लेशियर? खतरे में 50 करोड़ जिंदगियां
News In Short
- साल 1935 से 2022 के बीच गंगोत्री ग्लेशियर 1700 मीटर पीछे खिसक चुका है।
- सदी के अंत तक हिमालय की 75% से 80% बर्फ खत्म होने की आशंका है।
- ग्लेशियर पिघलने से 50 करोड़ लोगों की आजीविका और पानी पर खतरा है।
- ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिछले दो दशकों में बर्फ पिघलने की दर दोगुनी हुई।
- स्नो हार्वेस्टिंग और पर्यटन पर नियंत्रण से हिमालय को बचाया जा सकता है।
News In Detail
दुनिया भर में ग्लोबल वॉर्मिंग (Global warming) के कारण जलवायु परिवर्तन का असर दिखने लगा है। हिंदूकुश हिमालय से लेकर समुद्र की गहराई तक पृथ्वी गर्म हो रही है। दुनिया के पहाड़ पृथ्वी की सतह के लगभग 20% हिस्से में फैले हैं। ये पहाड़ 10% आबादी को घर और 50% को पानी देते हैं। सिंचाई, उद्योग और घरेलू उपभोग के लिए मीठा पानी यहीं से मिलता है। पर्वतीय क्षेत्र जैव विविधता के बड़े भंडार रहे हैं।
यहां से लकड़ी, खनिज और जल-विद्युत जैसे आवश्यक संसाधन मिलते हैं। पिछले कुछ दशकों में यहां मौसम का संकट गहरा गया है। जनसंख्या वृद्धि और जंगलों की कटाई ने स्थिति और बिगाड़ दी है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक इस्तेमाल भी इसकी एक बड़ी वजह है। अवैज्ञानिक कृषि पद्धति (Unscientific Farming) से पहाड़ों की सेहत खराब हो रही है।
नदियों का सिमटता दायरा
ग्लोबलाइजेशन के बाद औद्योगिक विकास से कार्बन उत्सर्जन काफी बढ़ा है। इसी कार्बन ने ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज कर दिया है। एक शताब्दी पहले भी हिमखण्ड पिघलते थे, पर संतुलन बना रहता था। बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा फिर से बढ़ जाया करता था। इसी कारण गंगा और यमुना जैसी नदियां निरंतर बहती रहती थीं।
किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा घटने लगा है। अब ग्लेशियर हर तीन से चार मीटर तक घट रहे हैं। यह बदलाव भविष्य के लिए एक बहुत बड़ी चेतावनी है। वैज्ञानिक अब इस स्थिति पर गहरी नजर रख रहे हैं। पानी की कमी का खतरा अब साफ दिखाई दे रहा है।
गंगोत्री ग्लेशियर पर मंडराता गंभीर खतरा
गंगोत्री ग्लेशियर, जो गंगा का मुख्य स्रोत है, तेजी से पिघल रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं। इनकी घटने की औसत दर 30-60 मीटर प्रति दशक पाई गई है। उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री ग्लेशियर हर साल 28-30 मीटर (गंगोत्री के पास भूस्खलन) घट रहा है। साल 1935 से 2022 के बीच यह 1700 मीटर पीछे हट चुका है।
पिछले दो दशकों में इसके पिघलने की दर दोगुनी हो गई है। यह उत्तर भारत की वाटर सिक्योरिटी के लिए संकट है। वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी ने कई चिंताजनक रिपोर्ट दी हैं। लद्दाख और सिक्किम के ग्लेशियरों पर भी गर्मी का बुरा असर है। कम हिमपात के कारण ग्लेशियरों को नया जीवन नहीं मिल रहा।
हिंदूकुश हिमालय और 75% बर्फ खोने का डर
हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, नेपाल और भूटान स्थित हैं। यहां दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी निवास करती है। इन देशों पर जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक जोखिम बना हुआ है। सदी के अंत तक 75% बर्फ खत्म होने का खतरा है। भारतीय हिमालय क्षेत्र में कुल 9 हजार 975 ग्लेशियर मौजूद हैं।
इनमें से 900 ग्लेशियर अकेले उत्तराखंड राज्य में आते हैं। अगर बर्फ पिघल गई तो करोड़ों लोगों का जीवन थम जाएगा। ये ग्लेशियर देश की 40% आबादी की आजीविका का आधार हैं। पानी के बिना कृषि और उद्योग पूरी तरह ठप हो जाएंगे। भविष्य में रोजगार का संकट खड़ा होना भी लगभग तय है।
नेपाल की संवेदनशीलता और खेती पर असर
पड़ोसी देश नेपाल जलवायु जोखिम के मामले में चौथे स्थान पर है। यहां अनियमित मानसून और भीषण बाढ़ की समस्या बढ़ गई है। भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी काफी बढ़ोतरी देखी गई है। हिमालयी ईकोसिस्टम में बदलाव से कृषि उत्पादन घट रहा है। पानी के पुराने स्रोत अब धीरे-धीरे सूखने लगे हैं।
इससे स्थानीय समुदायों की खाद्य सुरक्षा दांव पर है। नेपाल पिछले दो दशकों से इससे निपटने का प्रयास कर रहा है। अनुकूलन और जोखिम कम करने के लिए नीतियां बनाई जा रही हैं। फिर भी प्रकृति का बदलता मिजाज काबू में नहीं आ रहा है। जैव विविधता को भी इससे अपूरणीय क्षति पहुंच रही है।
ICIMOD की चेतावनी और तीसरा ध्रुव
ICIMOD (International Centre for Integrated Mountain Development) आठ देशों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण का काम करता है। इसकी चेतावनी है कि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक रोकना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो 80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं। हिंदूकुश हिमालय को दुनिया का तीसरा ध्रुव कहा जाता है। ध्रुवों के बाहर यहां बर्फ का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है।
एक अध्ययन के अनुसार एंपरर पेंग्विन की आबादी भी खतरे में है। 21वीं सदी तक उनकी 98% आबादी गायब हो सकती है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन इसी तरह बढ़ा तो तबाही मचेगी। अल-नीनो और ला-नीना का प्रभाव भी मौसम को बिगाड़ रहा है। प्रचंड गर्मी ने इंसानों को अब बहुत कुछ सिखा दिया है।
स्नो हार्वेस्टिंग में पुरानी परंपरा से नई उम्मीद
हम औद्योगिक गतिविधियों को नियंत्रित कर ग्लेशियरों को बचा सकते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन की अनियंत्रित आवाजाही पर अंकुश जरूरी है। हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा में हिमखंडों की सुरक्षा के उपाय हैं। आजादी के दो दशक बाद तक लोग पानी रोकते थे। तापमान गिरने पर यह पानी जमकर बर्फ बन जाता था।
इसे नमक और जैविक कचरे से ढक दिया जाता था। इस तकनीक से बर्फ लंबे समय तक जमी रहती थी। गर्मियों में इसी बर्फ से पानी की आपूर्ति होती थी। इसे आज की भाषा में स्नो हार्वेस्टिंग (Snow Harvesting) कह सकते हैं। पहाड़ों को दुनिया का वाटर टॉवर कहना बिल्कुल सही होगा।
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