50 करोड़ साल पुरानी तीसरी आंख अब भी आपके दिमाग में है, वैज्ञानिकों ने दिया सबूत

Pawan Modiya | May 27, 2026, 24:19 IST
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यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और लुंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने साबित किया है कि इंसान के दिमाग में मौजूद पिनियल ग्लैंड दरअसल 50 करोड़ साल पुरानी तीसरी आंख का अवशेष है। यह खोज Current Biology जर्नल में प्रकाशित हुई है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • वैज्ञानिकों ने पिनियल ग्लैंड को तीसरी आंख का अवशेष बताया है।
  • 50 करोड़ साल पहले हमारे पूर्वजों के सिर पर एक मध्य आंख थी।
  • यह खोज Current Biology (करंट बायोलॉजी) जर्नल में 2026 में प्रकाशित हुई।
  • यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स के प्रोफेसर टॉम बेडेन इस शोध के प्रमुख हैं।
  • अब यह ग्लैंड नींद और शरीर की आंतरिक घड़ी को नियंत्रित करती है।

इंसानी दिमाग में छिपी है तीसरी आंख

आपके सिर के ठीक बीचों-बीच एक ऐसा अंग है, जो लाखों साल पहले वाकई एक आंख हुआ करता था। जी हां, वैज्ञानिकों ने हाल ही में यह साबित कर दिया है कि हमारे दिमाग में मौजूद पिनियल ग्लैंड (Pineal Gland) असल में हमारी प्राचीन तीसरी आंख का बचा-खुचा हिस्सा है। यह खोज Current Biology (करंट बायोलॉजी) जर्नल में 2026 में प्रकाशित हुई है।



यूनिवर्सिटी ऑफ ससेक्स और लुंड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर यह दावा किया है। उनके मुताबिक, करीब 50 करोड़ साल पहले हमारे पूर्वजों के सिर के बीच में एक खास तरह की आंख होती थी। उस आंख को शोधकर्ताओं ने 'कॉम्पोजिट एंसेस्ट्रल मीडियन आई' (Composite Ancestral Median Eye) यानी मध्य वाली पुरातन आंख कहा है।



50 करोड़ साल पुरानी कहानी

बात उस दौर की है जब हमारे पूर्वज समुद्र की गहराइयों में रहते थे। वहां चारों तरफ अंधेरा था और कीचड़ भरी जगह थी। उस अंधेरे में उनकी दोनों तरफ की आंखें धीरे-धीरे बेकार होती गईं। लेकिन सिर के बीच में जो मध्य आंख थी, वह बेहद जरूरी बनी रही।



यह मध्य आंख तीन काम करती थी। पहला, यह ऊपर से आने वाले हल्के प्रकाश को पकड़ती थी। दूसरा, यह दिन और रात का फर्क बताती थी। तीसरा, यह ऊपर-नीचे की दिशा का अंदाजा देती थी। इन तीनों कामों की वजह से उन गहरे पानी के जीवों का जीवित रहना संभव हो पाता था।



जब जीव सुरंगों और जमीन के नीचे रहने लगे, तो दोनों तरफ की आंखें पूरी तरह चली गईं। लेकिन वह बीच वाली आंख कहीं न कहीं बनी रही। वक्त के साथ उसका रूप बदल गया।



आंख से ग्लैंड बनने की प्रक्रिया

प्रोफेसर टॉम बेडेन ने बताया कि इस मध्य आंख के दो हिस्से हुए। उसका बाहरी हिस्सा धीरे-धीरे हमारी आज की रेटिना (Retina) बन गया, जो हमारी दोनों आंखों में है। और उसका बीच वाला हिस्सा पिनियल ग्लैंड बन गया, जो अब हमारे दिमाग के अंदर दबी हुई है।



यह भी एक बड़ी बात है कि रेटिना आंख से पहले बनी थी। मतलब, देखने की क्षमता पहले विकसित हुई और उसके बाद आंख जैसी संरचना बनी। यह पूरी प्रक्रिया करोड़ों साल में हुई।



इस शोध में कोई नए प्रयोग नहीं किए गए। शोधकर्ताओं ने मछलियों, लैंप्री (Lamprey) जैसी प्राचीन समुद्री मछली और अन्य जीवों के जीवाश्म रिकॉर्ड, आनुवंशिक (Genetic) डेटा और पुराने अध्ययनों का गहराई से विश्लेषण किया। इसी से यह नतीजा निकला कि हमारी आंखें और पिनियल ग्लैंड एक ही प्राचीन संरचना से निकली हैं।



पिनियल ग्लैंड आज क्या करती है

पिनियल ग्लैंड अब खुद से कुछ नहीं देखती। लेकिन यह हमारी दोनों आंखों से प्रकाश और अंधेरे की सूचना लेती है। रात होते ही यह मेलाटोनिन (Melatonin) नामक हार्मोन (Hormone) छोड़ती है। यह हार्मोन शरीर को बताता है कि अब सोने का वक्त आ गया है। इसी की वजह से हमें नींद आती है।



दिन में जब रोशनी होती है, तो मेलाटोनिन कम बनता है ताकि हम जागते रहें। इस तरह पिनियल ग्लैंड हमारी सर्कैडियन रिदम (Circadian Rhythm) यानी शरीर की 24 घंटे वाली आंतरिक घड़ी को चलाती है।



इसका असर सिर्फ नींद तक नहीं है। यह हमारे मूड, प्रजनन प्रणाली, रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम (Immune System) और शरीर के तापमान पर भी असर डालती है। इसीलिए शरीर में इसका काम बेहद अहम माना जाता है।



आज भी जिंदा है तीसरी आंख इस जीव में

यह सुनकर हैरानी होगी कि कुछ जीवों में तीसरी आंख आज भी दिखती है। न्यूजीलैंड में पाया जाने वाला टुआतारा (Tuatara) नाम का सरीसृप (Reptile) इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। इसके सिर के ऊपर एक छोटी-सी आंख होती है। उस आंख में लेंस और रेटिना भी होती है। यह आंख ज्यादा साफ नहीं देख सकती, लेकिन ऊपर से आने वाले प्रकाश में बदलाव को तुरंत पकड़ लेती है। इससे टुआतारा को दिन-रात का पता चलता है और वह यह तय करता है कि धूप में बाहर आना है या छिपे रहना है।



इस एक उदाहरण से समझ में आता है कि हमारे अंदर छिपी पिनियल ग्लैंड कभी कैसी दिखती रही होगी।



तीसरी आंख और हमारी परंपरा

भारत में यह बात नई नहीं है। हिंदू और योग परंपरा में पिनियल ग्लैंड को सदियों से आज्ञा चक्र (Ajna Chakra) यानी तीसरी आंख के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इसे जागृत करने से अंतर्ज्ञान और आध्यात्मिक अनुभव मिलते हैं।



यूनानी चिकित्सक भी हजारों साल पहले इस ग्लैंड के बारे में जानते थे। हालांकि, विज्ञान अभी इन आध्यात्मिक दावों को प्रमाणित नहीं कर सका है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह मुख्य रूप से एक जैविक अंग है जो हार्मोन और नींद से जुड़ा है।



यह खोज क्यों है खास

यह शोध एक बहुत बड़ी पहेली सुलझाता है। अब तक यह साफ नहीं था कि इंसान की आंखें कैसे बनीं और पिनियल ग्लैंड का उनसे क्या रिश्ता है। इस रिसर्च से पता चला कि दोनों एक ही पुरानी संरचना से निकले हैं। इससे नींद की बीमारियों, डिप्रेशन (Depression) और हार्मोन संबंधी तकलीफों को नए सिरे से समझने में मदद मिल सकती है। हमारे अंदर 50 करोड़ साल का इतिहास बसा है। वह सिर्फ किताबों में नहीं, हमारे अपने दिमाग में जिंदा है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह खोज सिर्फ एक वैज्ञानिक खबर नहीं है, यह हमारी अपनी पहचान से जुड़ी बात है। हर इंसान के शरीर में एक ऐसा अंग है जिसके बारे में ज्यादातर लोग नहीं जानते। पिनियल ग्लैंड और नींद का रिश्ता समझना आज के दौर में बेहद जरूरी है, जब करोड़ों लोग नींद न आने की तकलीफ से गुजर रहे हैं। यह रिसर्च बताती है कि हमारा शरीर करोड़ों साल के विकास का नतीजा है। इससे न सिर्फ विज्ञान को, बल्कि चिकित्सा को भी नई दिशा मिल सकती है। भारतीय परंपरा में तीसरी आंख की अवधारणा सदियों पुरानी है। विज्ञान अब उसे एक नई रोशनी में देख रहा है। यह खबर जिज्ञासा जगाती है, विज्ञान के प्रति रुचि बढ़ाती है और अपने शरीर को बेहतर समझने में मदद करती है। संविधान की भावना के अनुरूप, यह खबर तथ्यों पर आधारित, तर्कसंगत और सामाजिक रूप से उपयोगी जानकारी साझा करती है।



जरूरी FAQ

पिनियल ग्लैंड को तीसरी आंख क्यों कहा जाता है?



वैज्ञानिकों के मुताबिक, पिनियल ग्लैंड असल में हमारे पूर्वजों की उस 'मध्य आंख' का अवशेष है जो 50 करोड़ साल पहले उनके सिर के बीच में होती थी। उस जमाने में वह आंख प्रकाश देख सकती थी, दिन-रात का फर्क बताती थी और दिशा का बोध कराती थी। समय के साथ उस आंख का एक हिस्सा रेटिना बन गया और दूसरा हिस्सा पिनियल ग्लैंड। इसीलिए इसे इंसान की तीसरी आंख कहा जाता है।



पिनियल ग्लैंड हमारे शरीर में क्या काम करती है?



पिनियल ग्लैंड हमारे दिमाग के बीच में एक छोटा-सा अंग है। यह मेलाटोनिन हार्मोन बनाती है जो नींद को नियंत्रित करता है। रात होने पर यह ज्यादा मेलाटोनिन छोड़ती है, जिससे नींद आती है। दिन में इसका उत्पादन कम हो जाता है। इसके अलावा यह शरीर की सर्कैडियन रिदम यानी 24 घंटे की आंतरिक घड़ी, मूड, इम्यून सिस्टम और हार्मोन संतुलन को भी प्रभावित करती है।



क्या आज भी किसी जीव में तीसरी आंख मौजूद है?



हां, न्यूजीलैंड का टुआतारा नाम का सरीसृप इसका जीवित उदाहरण है। इसके सिर पर एक तीसरी आंख होती है जिसमें लेंस और रेटिना दोनों हैं। हालांकि यह आंख ज्यादा साफ नहीं देख सकती, लेकिन यह ऊपर से आने वाली रोशनी में बदलाव को पकड़ लेती है। इससे टुआतारा को दिन-रात का पता चलता है। यह उदाहरण बताता है कि हमारी पिनियल ग्लैंड कभी कैसी दिखती रही होगी।



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