El Nino: 56 साल तक देश के लिए बंद रही थी मानसून की भविष्यवाणी
भारत ने खोजा El Nino का राज
हर साल जून आते ही देश भर में एक ही सवाल गूंजता है कि इस बार मानसून कैसा रहेगा? वहीं हर बार IMD का जवाब किसी न किसी तरह El Nino से जुड़ा होता है।
क्या आप जानते हैं कि El Nino का वो वायुमंडलीय आधार, जिस पर आज दुनिया भर की मौसम भविष्यवाणियां टिकी हैं, पहली बार किसी विदेशी लैब में नहीं, बल्कि भारत के मौसम विभाग के दफ्तर में खोजा गया था? और वो भी तब जब कंप्यूटर का नाम भी नहीं था।
समझें क्या है मामला...
1904 से 1924 के बीच IMD के प्रमुख रहे ब्रिटिश गणितज्ञ सर गिल्बर्ट वॉकर ने Pacific Ocean के दोनों सिरों पर हवा के दबाव में एक अजीब उठा-पटक देखी। उन्होंने इसे Southern Oscillation नाम दिया। गिल्बर्ट वॉकर ने यह पाया कि इसका सीधा असर भारत के मानसून पर पड़ता है।
दशकों बाद नॉर्वेजियन-अमेरिकी मौसम वैज्ञानिक Jacob Bjerknes ने इस वायुमंडलीय घटना को समुद्र की सतह के तापमान बदलाव यानी El Nino से जोड़ा। आज इस पूरी प्रक्रिया को ENSO कहते हैं। ये धरती के हर बड़े मौसम को प्रभावित करती है। वहीं, इस पूरी कहानी की शुरुआत भारत में हुई थी।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
जब IMD कहता है कि इस साल El Nino के चलते मानसून कमजोर रह सकता है, तो यह सिर्फ एक मौसम की खबर नहीं है। यह किसान की फसल है, आपके शहर के जलाशय का स्तर है।
साथ ही आपके राज्य में बिजली-पानी का भविष्य है। उस भविष्यवाणी की जड़ें उसी खोज में हैं जो सौ साल पहले एक अंग्रेज गणितज्ञ ने भारत में बैठकर की थी।
पहले क्या था
19वीं सदी के अंत में जब IMD की स्थापना हुई, तब मौसम भविष्यवाणी का मतलब था पुराने आंकड़ों से statistical correlations ढूंढना। यानी अगर पिछले 30 सालों में अप्रैल में हिमालय पर खूब बर्फ पड़ी तो जून में मानसून अच्छा रहेगा।
यह तरीका काम तो करता था लेकिन क्यों होता है इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
वॉकर ने यह समझ लिया था कि भारत का मानसून कोई अकेली, बंद घटना नहीं है। यह एक बड़े ग्लोबल सिस्टम का हिस्सा है। इसीलिए उन्होंने दुनिया भर के मौसम डेटा को खंगालना शुरू किया।ॉ
क्या हुआ और क्यों
सोचिए एक बार। 1900 के शुरुआती दशक। न सैटेलाइट है, न कंप्यूटर, न इंटरनेट। सिर्फ हाथ से जमा किए गए आंकड़े, और एक गणितज्ञ की असाधारण जिज्ञासा।
वॉकर ने दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में वायुमंडलीय दबाव के आंकड़े जोड़े। साथ ही तीन बड़े oscillation systems पाए। दो Pacific Ocean में, एक Atlantic में।
वॉकर ने देखा कि जब Pacific के पूर्वी सिरे पर हवा का दबाव बढ़ता है, तो पश्चिमी सिरे पर घटता है। फिर उलटा। यह see-saw पैटर्न इतना consistent था कि उन्होंने इसे एक अलग phenomenon माना। इसे उन्होंने Southern Oscillation कहा, क्योंकि यह तीनों में सबसे दक्षिण की तरफ था।
असली ब्रेकथ्रू यह था
वॉकर ने पाया कि जब इस oscillation में एक खास फेस आता है, तो भारत में मानसून कमजोर पड़ता है। आज हम जानते हैं कि यही El Nino phase है।
दशकों बाद 1960 के आखिर में, Jacob Bjerknes ने उस मिसिंग लिंक को जोड़ा। उन्होंने दिखाया कि Southern Oscillation और El Nino अलग-अलग नहीं हैं। वे एक ही feedback loop के दो हिस्से हैं।
समुद्र गर्म होता है तो हवा बदलती है, हवा बदलती है तो समुद्र और गर्म होता है। और यही वो moment था जब दुनिया को ENSO मिला।
कौन थे सर गिल्बर्ट वॉकर
ब्रिटिश गणितज्ञ, IMD में 1904 से 1924 तक। उनकी रुचि थी cricket ball की swing, लेकिन उन्होंने मौसम विज्ञान को एक नई दिशा दी।
कौन थे Jacob Bjerknes
नॉर्वेजियन-अमेरिकी वैज्ञानिक, जिन्होंने 1960 के दशक में वॉकर के काम को El Nino से जोड़ा।
दोनों साइड्स की बात
एक तरफ यह गर्व की बात है कि एक global phenomenon की खोज भारत से हुई। IMD की scientific legacy इससे और मजबूत होती है।
वहीं दूसरी तरफ एक कड़वा सच भी है। वॉकर की खोज के बाद भी IMD की भविष्यवाणियां दशकों तक अविश्वसनीय रहीं। इतनी अविश्वसनीय कि 1932 से 1988 तक, यानी पूरे 56 साल, IMD ने पूरे देश के लिए मानसून भविष्यवाणी देना बंद कर दिया।
सिर्फ नॉर्थवेस्ट इंडिया और पेनिनसुलर रीजन के लिए अनुमान दिया जाता था। वो भी qualitative यानी slightly above normal जैसे vague शब्दों में, न कि इस साल 95% रेनफॉल होगी। जैसी concrete संख्या में।
क्यों? क्योंकि मानसून और ENSO का संबंध केसुअल नहीं है। El Nino आए तो मानसून कमजोर होगा ही, यह जरूरी नहीं। यह एक complex, probabilistic relationship है।
आगे क्या होगा
1988 में IMD ने फिर से पूरे देश के लिए quantitative forecasts शुरू किए। तब से computational power, satellite data, और prediction models में जबरदस्त सुधार हुआ है। वहीं नई चुनौतियां भी आई हैं।
Climate change के चलते extreme weather events पहले से अलग पैटर्न दिखा रहे हैं। ENSO और मानसून का वो पुराना रिलेशनशिप अब उतना रिलायबल नहीं रहा।
वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि warming planet पर Walker का equation कैसे बदलेगा।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
वॉकर मूलत: गणितज्ञ थे मौसम वैज्ञानिक नहीं। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि मौसम भविष्यवाणी उनका काम होगा। IMD का प्रमुख बनने से पहले वे Cambridge में boomerang और cricket ball की aerodynamics पर काम करते थे।
एक और बात: उनके नाम पर एक atmospheric circulation pattern है जिसे आज Walker Circulation कहते हैं। यह वही सर्कुलेशन है जो El Nino के दौरान कमजोर पड़ती है और पूरी दुनिया के मौसम को हिला देती है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह सिर्फ इतिहास की कहानी नहीं है। जब हम El Nino और मानसून की बात करते हैं तो हम करोड़ों किसानों की आजीविका, देश की खाद्य सुरक्षा और जल संकट की बात कर रहे हैं।
यह जानना जरूरी है कि इस पूरी वैज्ञानिक समझ की नींव भारत ने रखी थी। ताकि हम अपने वैज्ञानिक संस्थानों को वो सम्मान दे सकें जिसके वे हकदार हैं। और ताकि भविष्य में मौसम नीति और disaster preparedness में science को केंद्र में रखा जाए।
FAQ
- El Nino क्या होता है और इसका मॉनसून पर क्या असर पड़ता है?
El Nino एक समुद्री घटना है जिसमें Pacific Ocean का पूर्वी हिस्सा सामान्य से ज्यादा गर्म हो जाता है। इसके चलते भारत में मॉनसून की बारिश कम हो सकती है। हालांकि यह हर बार जरूरी नहीं होता क्योंकि मॉनसून एक complex system है। - Southern Oscillation की खोज कब और कहां हुई?
Southern Oscillation की खोज 1920 के दशक में भारत में हुई। IMD के तत्कालीन प्रमुख सर गिल्बर्ट वॉकर ने Pacific Ocean में हवा के दबाव के इस see-saw pattern को identify किया था। - IMD ने 56 साल तक पूरे देश की मॉनसून भविष्यवाणी क्यों बंद कर दी थी?
1932 से 1988 तक IMD ने all-India quantitative forecast देना बंद कर दिया क्योंकि मॉनसून और ENSO का संबंध causal नहीं था। reliable predictors की कमी थी। इस दौरान सिर्फ दो regions के लिए vague qualitative forecasts दिए जाते थे।
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