इंडिया में अब टकीला बूम की गूंज, बना दुनिया का नंबर 1 टकीला मार्केट, 2031 तक खपत होगी दोगुनी
समझें क्या है पूरा मामला
भारत 2024-25 में दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता एगेव स्पिरिट्स यानी टकीला बाजार बन गया है। IWSR (International Wine and Spirits Record) ने 21 देशों के बाजारों में भारत को पहले पायदान पर रखा है।
2024-25 में वॉल्यूम में 31% और वैल्यू में 40% की बढ़त दर्ज हुई है। 2031 तक भारत में टकीला की खपत दोगुनी होने का अनुमान है। इस उछाल की बड़ी वजह शहरी युवाओं में बढ़ता कॉकटेल कल्चर और देसी एगेव ब्रांड है।
भारत में टकीला की उड़ान
टकीला पहले सिर्फ पार्टियों में शॉट ग्लास तक सीमित था। अब यह बड़े शहरों के बार मेन्यू और घरों की अलमारियों में जगह बना रहा है। IWSR के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में भारत ने एगेव स्पिरिट्स की ग्रोथ में 21 बड़े बाजारों को पीछे छोड़ दिया है।
वॉल्यूम में 31% और वैल्यू में 40% की बढ़त किसी भी बाजार विश्लेषक के लिए चौंकाने वाली संख्या है। यहां वॉल्यूम का मतलब है कि लोगों ने ज्यादा टकीला खरीदना शुरू कर दिया है। इसी तरह वैल्यू का अर्थ ज्यादा खर्च करने से है।
IWSR के सीनियर कंसल्टेंट जेसन होलवे का कहना है कि टकीला की खास बात इसकी अलग-अलग तरह से इस्तेमाल होने की क्षमता है। उन्होंने बताया कि टकीला कई मशहूर कॉकटेल का बेस बनता है, लेकिन इसे सीधा भी पिया जा सकता है, खासकर जब वह अल्ट्रा-प्रीमियम कैटेगरी का हो।
2031 तक होगी खपत दोगुनी
यह रफ्तार जारी रहने की पूरी उम्मीद है। IWSR के अनुमान के मुताबिक 2034 तक एगेव स्पिरिट्स का वॉल्यूम सीएजीआर (CAGR - Compound Annual Growth Rate) यानी सालाना चक्रवृद्धि वृद्धि दर 14% रहेगी। इसका मतलब है कि 2031 तक भारत में टकीला की कुल खपत दोगुनी हो जाएगी।
यह आंकड़े प्रीमियमाइजेशन यानी महंगे और उच्च गुणवत्ता वाले ब्रांडों की बढ़ती मांग की ओर इशारा करते हैं। शहरी भारत में उपभोक्ताओं की पसंद तेजी से बदल रही है।
कॉकटेल से आ रही है असली ग्रोथ
डियाजियो इंडिया के प्रवक्ता के अनुसार भारत में टकीला की करीब 60% खपत कॉकटेल के रूप में होती है। पिकांटेस और पालोमास जैसे कॉकटेल लोगों को टकीला से परिचित करा रहे हैं। ये ड्रिंक्स युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अब टकीला को सिर्फ मौज-मस्ती की चीज नहीं माना जाता है। युवा पीढ़ी इसे एक परिपक्व और समझ के साथ पीने वाला पेय मानने लगी है।
देसी एगेव स्पिरिट्स की अपनी दुनिया
माया पिस्तोला एगवेपुरा के फाउंडर राक्षय धारीवाल बताते हैं कि, यह डेटा उस चीज को साबित करता है जो वो कई सालों से देख रहे थे। उनके मुताबिक भारत में कॉकटेल कल्चर (कॉकटेल पार्टी) बहुत तेजी से बढ़ा है।
डेक्कन प्लेटो से आ रहा नया ब्रांड
तकनीकी रूप से टकीला सिर्फ मेक्सिको के कुछ खास इलाकों में ही बन सकता है। भारतीय कंपनियां इससे अलग रास्ते पर चल रही हैं। वे डेक्कन प्लेटो यानी दक्कन के पठार में उगाए गए एक खास पौधे एगेव का इस्तेमाल कर रही हैं।
इस क्षेत्र में एक और बड़ी हलचल है। डी'यावोल स्पिरिट्स एक अनेजो टकीला लॉन्च करने की तैयारी कर रही है। इसकी कीमत 20 हजार से 30 हजार रुपए के बीच होगी। यह बताता है कि भारत का अल्ट्रा-प्रीमियम टकीला सेगमेंट भी मजबूत हो रहा है।
सिपिंग कल्चर भी आ रहा है आगे
अब तक टकीला की पहचान शॉट के रूप में थी, लेकिन एजड एक्सप्रेशंस यानी पुराने यानी लंबे समय से रखे टकीला को धीरे-धीरे पीने का चलन भी बढ़ रहा है। इसे सिपिंग कल्चर कहते हैं।
यह बदलाव बताता है कि भारतीय उपभोक्ता न केवल अधिक टकीला पी रहे हैं, बल्कि अधिक समझदारी से पी रहे हैं। बाजार की यह परिपक्वता लंबे समय तक टिकी रहने वाली ग्रोथ की निशानी है।
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर भारत की बदलती उपभोक्ता प्राथमिकताओं को दर्शाती है। देश में मध्यम वर्ग और युवा आबादी की बढ़ती क्रय शक्ति के साथ जीवनशैली भी तेजी से बदल रही है।
दूसरी बात भारतीय कंपनियों का देसी एगेव स्पिरिट्स तैयार करना आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम है। इससे स्थानीय कृषि, विशेषकर दक्कन के पठार के एगेव किसानों को फायदा होगा।
तीसरी बात 2031 तक दोगुनी होने वाली खपत का मतलब है कि यह एक तेजी से उभरता व्यापार क्षेत्र है जो रोजगार और निवेश दोनों के लिए अवसर लाएगा।
FAQ
- टकीला और एगेव स्पिरिट्स में क्या फर्क है?
टकीला एगेव स्पिरिट्स की एक खास कैटेगरी है। टकीला केवल मेक्सिको के कुछ निर्धारित इलाकों में ब्लू एगेव पौधे से बनाई जाती है। जबकि एगेव स्पिरिट्स किसी भी एगेव पौधे से बनी शराब के तहत आती है, चाहे वह दुनिया में कहीं भी बनाई गई हो। भारत में जो देसी एगेव ड्रिंक बन रहे हैं वे दक्कन के पठार के एगेव से तैयार होते हैं और उन्हें टकीला नहीं कहा जा सकता। वे एक अलग और नई श्रेणी हैं। - भारत में टकीला की खपत इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
इसके कई कारण हैं। शहरी भारत में कॉकटेल कल्चर तेजी से पनपा है और पिकांटेस व पालोमास जैसे कॉकटेल युवाओं को टकीला से जोड़ रहे हैं। प्रीमियमाइजेशन यानी बेहतर और महंगे पेय की मांग बढ़ी है। बढ़ती क्रय शक्ति और सोशल मीडिया पर पेय संस्कृति के प्रचार ने भी इसमें भूमिका निभाई है। इसके अलावा टकीला को सिर्फ पार्टी शॉट नहीं बल्कि एक परिपक्व पेय के रूप में देखा जाने लगा है।
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