साल 2100 तक भारत के जंगल दोगुना कार्बन स्टोर करेंगे, यह क्लाइमेट चेंज खतरा तो नहीं...?

Pawan Modiya | Apr 21, 2026, 23:21 IST
Photograph: (the sootr)
साल 2100 तक भारत के जंगल आज की तुलना में लगभग दोगुना कार्बन स्टोर कर सकते हैं। सबसे बड़ा बदलाव राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के रेगिस्तानी इलाकों में होगा। यह परिवर्तन हमारे लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह... आइए आसान भाषा में समझते हैं।

    जंगल एक चुप्पी साध रहे हैं.... सोचिए एक ऐसा जंगल जो बाहर से शांत दिखता है। पत्ते हरे हैं, पेड़ खड़े हैं। लेकिन भीतर कुछ बदल रहा है। धीरे-धीरे, चुपचाप।



    यही हो रहा है भारत के जंगलों के साथ। और इसे समझने के लिए कई भारतीय संस्थानों के शोधकर्ता सालों से काम कर रहे थे। उनकी मेहनत का नतीजा इस हफ्ते सामने आया, जब Environmental Research: Climate जर्नल में उनकी स्टडी प्रकाशित हुई।



    स्टडी में एक बड़ा सवाल पूछा गया था। अगर दुनिया ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रखे, तो साल 2100 तक भारत के जंगल कैसे दिखेंगे?



    जवाब चौंकाने वाला था... दो रास्ते, दो नतीजे...

    शोधकर्ताओं ने दो परिदृश्य देखे। पहला, अगर उत्सर्जन कम रहा। दूसरा, अगर उत्सर्जन बेलगाम बढ़ता रहा।



    कम उत्सर्जन वाले भविष्य में वनस्पति कार्बन बायोमास 35% बढ़ने का अनुमान है। और अगर उत्सर्जन ज्यादा रहा, तो यह बढ़त 62% तक पहुंच सकती है। यानी दोनों ही हालात में जंगल ज्यादा कार्बन जमा करेंगे।



    लेकिन यह बढ़त कहां से आएगी?

    इसके पीछे दो ताकतें काम कर रही हैं। पहली है बढ़ती बारिश। दूसरी है हवा में CO2 (Carbon Dioxide) की बढ़ती मात्रा। ज्यादा बारिश से पेड़ों को पानी मिलता है। ज्यादा CO2 से वे बेहतर प्रकाश संश्लेषण यानी photosynthesis कर पाते हैं। दोनों मिलकर पेड़ों को तेज़ी से बढ़ने में मदद करते हैं।



    हालांकि यह बदलाव रातोंरात नहीं आता। जंगल जल्दी नहीं बदलते। बारिश का असर कम और मध्यम उत्सर्जन में करीब दो साल बाद दिखता है। ज्यादा उत्सर्जन वाले परिदृश्य में यह असर चार साल तक देर से आता है। इसकी वजह सीधी है, लकड़ी का बायोमास धीरे-धीरे जमा होता है।



    जहां उम्मीद सबसे कम थी, वहां सबसे बड़ा बदलाव

    अब आती है सबसे हैरान करने वाली बात... आपने सोचा होगा कि सबसे ज्यादा फायदा पश्चिमी घाट या हिमालय के घने जंगलों को होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। सबसे बड़ा बदलाव होगा राजस्थान, गुजरात, पश्चिमी मध्य प्रदेश और आसपास के सूखे इलाकों में। इन रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क इलाकों में वनस्पति कार्बन ऐतिहासिक स्तर से 60% से ज्यादा बढ़ सकता है।



    वजह समझना आसान है। इन इलाकों में अभी वनस्पति बहुत कम है। तो जब भी पानी और CO2 बढ़ेंगे, ये इलाके सबसे पहले और सबसे तेज़ी से हरे होंगे। छोटे आधार से बड़ी बढ़त दिखती है।



    ट्रांस-हिमालय, गंगा का वन क्षेत्र और दक्कन प्रायद्वीप में भी बढ़त होगी। लेकिन पश्चिमी घाट और हिमालय जैसे जैव-विविधता से भरपूर घने जंगल पहले से ही अपनी पारिस्थितिक सीमा के करीब हैं। इसलिए वहां बढ़त तुलनात्मक रूप से कम दिखेगी।



    फातिमा फिथा की चेतावनी

    स्टडी की प्रमुख लेखक फातिमा फिथा ने एक बात कही जो सोचने पर मजबूर करती है। उन्होंने कहा, "क्लाइमेट चेंज सिर्फ तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यह हर क्षेत्र को चुपचाप बदल रहा है। इसमें हमारे जंगल भी शामिल हैं।"



    और फिर उन्होंने वह बात जोड़ी जो इस पूरी खबर की असली रूह है। उन्होंने कहा कि जहां फायदा दिखता है, वहां भी गहरे खतरे छिपे हो सकते हैं। बढ़ता कार्बन भंडार आज के घने जंगलों की स्थिरता पर सवाल खड़े कर सकता है। और उनमें जमा कार्बन कभी भी बाहर निकल सकता है।



    हरियाली के पीछे का अंधेरा

    तो क्या यह सिर्फ अच्छी खबर है..? नहीं... शोधकर्ताओं ने साफ कहा कि उनके मॉडल एक बड़ी सच्चाई नहीं माप पाते। जंगल कटाई, जमीन का इस्तेमाल बदलना, जंगल की आग, सूखा, लू और कीड़ों का बढ़ता प्रकोप, ये सब खतरे बढ़ते तापमान के साथ और भयावह होते जाएंगे।



    यह एक ऐसी तस्वीर है जिसमें एक तरफ उम्मीद है और दूसरी तरफ चेतावनी। जंगल ज्यादा कार्बन जमा कर सकते हैं, लेकिन अगर हम उन्हें आज नुकसान पहुंचाते रहे तो वह फायदा कभी मिलेगा नहीं। उल्टा, जमा कार्बन वापस हवा में घुल जाएगा। और तब क्लाइमेट चेंज और बिगड़ेगा।



    यह खबर क्यों जरूरी है

    भारत के जंगल करोड़ों लोगों की आजीविका, पानी और हवा से जुड़े हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 48-A पर्यावरण की रक्षा को राज्य की जिम्मेदारी बताता है। यह स्टडी नीति निर्माताओं को एक स्पष्ट संकेत देती है कि जंगलों की रक्षा सिर्फ पर्यावरण का मसला नहीं, बल्कि भविष्य की जलवायु का सवाल है। सामाजिक और डिजिटल नैतिकता के नजरिए से यह जरूरी है कि ऐसी वैज्ञानिक रिसर्च आम लोगों तक सरल भाषा में पहुंचे। जंगल सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं। हर नागरिक का उनसे गहरा नाता है। यह खबर उस नाते और उस जिम्मेदारी दोनों की याद दिलाती है।



    3 जरूरी FAQ

    प्रश्न 1: 2100 तक भारत के जंगलों में कार्बन कितना बढ़ेगा?



    उत्तर: नई स्टडी के मुताबिक अगर उत्सर्जन कम रहा तो वनस्पति कार्बन बायोमास 35% तक बढ़ सकता है। और अगर उत्सर्जन ज्यादा रहा तो यह बढ़त 62% तक पहुंच सकती है। यानी जंगल लगभग दोगुना कार्बन स्टोर करने की क्षमता हासिल कर सकते हैं। यह स्टडी Environmental Research: Climate जर्नल में प्रकाशित हुई है।



    प्रश्न 2: भारत में सबसे ज्यादा कार्बन बढ़त किन इलाकों में होगी?



    उत्तर: सबसे ज्यादा बढ़त रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क इलाकों में होगी। राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश में वनस्पति कार्बन ऐतिहासिक स्तर से 60% से ज्यादा बढ़ने का अनुमान है। इन इलाकों में अभी कार्बन का आधार कम है, इसलिए यहां बढ़त सबसे ज्यादा दिखती है।



    प्रश्न 3: क्या कार्बन स्टोरेज बढ़ना मतलब क्लाइमेट चेंज फायदेमंद है?



    उत्तर: नहीं। शोधकर्ताओं ने साफ चेताया है कि यह पूरी तस्वीर नहीं है। जंगल कटाई, आग, सूखा, लू और कीड़ों का प्रकोप जैसे खतरे बढ़ते तापमान के साथ और गहरे होते जाएंगे। अगर जंगलों को नुकसान होता रहा तो कार्बन स्टोरेज का फायदा खत्म हो सकता है और उत्सर्जन और बढ़ सकता है।



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