NCRB Report: दिल्ली से छत्तीसगढ़ तक जेलें ओवरफुल, 73% कैदी बिना सजा के बंद क्यों?
भारत की जेलों में 5.11 लाख लोग बंद हैं। इनमें से लगभग 3.71 लाख लोगों पर अभी तक कोई सजा नहीं सुनाई गई है। ये विचाराधीन कैदी हैं- यानी ऐसे लोग जिनका मुकदमा अदालत में चल रहा है, फैसला नहीं आया। और इनमें से कुछ साल नहीं- कई-कई साल से जेल में हैं।
समझें क्या है मामला
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की 2024 की रिपोर्ट हाल ही में सामने आई है। रिपोर्ट बताती है कि देश की 1,333 जेलों की कुल क्षमता 4.53 लाख कैदियों की है। बावजूद इसके इन जेलों में 5.11 लाख लोग बंद हैं, यानी क्षमता से 12.7% ज्यादा।
आधे से ज्यादा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जेलें अपनी क्षमता से ज्यादा भरी हैं। इस पूरी समस्या की सबसे बड़ी वजह है विचाराधीन कैदियों की भारी तादाद।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
सोचिए, आप किसी झगड़े में गवाह हो जाते हैं, या कहीं गलती से आपका नाम आ जाता है। फिर आप पर FIR दर्ज होती है, इसके बाद गिरफ्तारी भी होती है और जमानत नहीं मिलती। फिर आप महीनों, कभी-कभी सालों तक जेल में रहते हैं- बिना किसी सजा के। यह किसी के साथ भी हो सकता है। जब न्यायिक प्रक्रिया धीमी होती है तो जेल का दरवाजा उन लोगों के लिए भी बंद हो जाता है जो शायद कभी दोषी साबित न हों।
पहले क्या था
साल 2021 में कोविड महामारी के दौरान जेलों में विचाराधीन कैदियों (कैदी बढ़े) की संख्या अपने चरम पर थी- करीब 77%। उसके बाद कुछ सुधार हुआ। साल 2024 में यह आंकड़ा घटकर 73% पर आया है। लेकिन यह अभी भी COVID से पहले के स्तर से ज्यादा है।
साल 2015 से 2024 के बीच जेलों की क्षमता 24% बढ़ी है। दो हजार 268 जेलों में नवीनीकरण और विस्तार हुआ, 120 से ज्यादा नई जेलें बनाई गईं।
फिर भी जेलें भरी हुई हैं।
क्या हुआ और क्यों
दो समानांतर समस्याएं एक साथ चल रही हैं-
पहली- जेलें भरी हैं क्योंकि अदालतों में मामले लंबित हैं। जब तक फैसला नहीं आता, कैदी जेल में रहता है। भारत में करोड़ों मामले अदालतों में लंबित हैं- यह पुरानी बात है। लेकिन इसकी कीमत सबसे ज्यादा वही चुकाता है जो जमानत नहीं ले सकता।
दूसरी- जेलों में जगह कम है। दिल्ली की जेलों में 194% occupancy है। यानी 100 लोगों के लिए बनी जगह में 194 लोग रह रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में 2015 में 78% था, 2024 में 148% हो गया।
इसे ऐसे समझिए- एक कमरे में 4 लोगों के सोने की जगह है। उसमें आप 8 लोग बंद कर दें। न ठीक से सोना, न खाना, न कानूनी मदद ये हाल है।
यहीं पर एक और समस्या सामने आती है।
संसदीय समिति की रिपोर्ट- जिसका शीर्षक है Prison Conditions, Infrastructure and Reforms- बताती है कि कई राज्यों में जेल स्टाफ के आधे से ज्यादा पद खाली हैं। दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में 60% से ज्यादा sanctioned posts vacant हैं। जब स्टाफ ही नहीं है तो न rehabiltation होगी, न कानूनी सहायता मिलेगी।
कौन-कौन involved है
NCRB: यह रिपोर्ट जारी करती है और आंकड़े रखती है। राज्य सरकारें: जेलें राज्य का विषय हैं। क्षमता बढ़ाना, स्टाफ रखना- यह राज्यों की जिम्मेदारी है। संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Home Affairs): इसने सिफारिशें दी हैं- नई इमारतें, transfer सुविधाएं, मुफ्त कानूनी सहायता।
न्यायपालिका: अदालतों में लंबित मामलों की रफ्तार सीधे जेलों पर असर डालती है। विचाराधीन कैदी सबसे ज्यादा प्रभावित- और सबसे कम आवाज वाले।
दोनों sides की बात
एक तरफ कहा जाता है कि जेलों में भीड़ कम करने के लिए जमानत के नियम आसान किए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार यह कह चुका है। तर्क यह है कि जब तक दोष साबित न हो, जेल में रखना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
दूसरी तरफ तर्क आता है कि हर आरोपी को जमानत देना हमेशा सुरक्षित नहीं होता- विशेषकर संगीन मामलों में। फरार होने का खतरा, गवाहों पर दबाव- ये वैध चिंताएं हैं। लेकिन एक बात जो दोनों तरफ से स्वीकार की जाती है: अदालतों की रफ्तार बढ़ाए बिना यह समस्या हल नहीं होगी।
छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश कनेक्शन
छत्तीसगढ़ का नाम रिपोर्ट में सीधे आता है। साल 2015 में यहां जेलों (छत्तीसगढ़ जेल) की occupancy 234% थी- यानी दोगुने से भी ज्यादा कैदी। साल 2024 में यह घटकर 127.6% हो गई है। सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी हर 100 जगह पर 127 लोग हैं।
मध्यप्रदेश जेल के लिए भी रिपोर्ट में आंकड़े हैं। Chart 2 में MP को उन राज्यों में दिखाया गया है जहां 2024 में भी occupancy rate राष्ट्रीय औसत के करीब या उससे ऊपर है।
आगे क्या होगा
संसदीय समिति की सिफारिशें लागू होंगी या नहीं- यह अभी स्पष्ट नहीं है। कुछ राज्यों में नई जेलें बन रही हैं। लेकिन असली सवाल यह है- क्या सिर्फ ज्यादा जेलें बनाना जवाब है?
लंबे समय में fast track courts, plea bargaining का विस्तार, और legal aid की मजबूती ही इस समस्या को जड़ से हल कर सकती है। वरना हम बड़े-बड़े पिंजरे बनाते रहेंगे- लेकिन पक्षी उतने ही बेबस रहेंगे।
एक बात जो आप नहीं जानते थे
ज्यादातर लोग सोचते हैं कि जेल में सजायाफ्ता अपराधी होते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि भारत की जेलों में जितने लोग बंद हैं, उनमें से सिर्फ 26.6% ऐसे हैं जिन्हें सजा सुनाई गई है। बाकी 73% वो हैं जिनका मामला अभी चल रहा है। इसका मतलब- जेल का बोझ मुख्यतः उन लोगों पर है जो कानूनी रूप से अभी दोषी नहीं हैं।
अब आप क्या करें
अब आप क्या करें: अगर आपके आसपास कोई व्यक्ति विचाराधीन कैदी के रूप में बंद है और ज़मानत नहीं मिल रही, तो District Legal Services Authority (DLSA) से मुफ्त कानूनी सहायता लें। क्यों अभी: NCRB report 2024 सामने आई है- यह मुद्दा अभी policy discussion में है। आगे देखें: संसद के अगले session में Prison Reform Bill पर बहस संभावित है।
FAQ
- विचाराधीन कैदी कौन होते हैं?
विचाराधीन कैदी वे लोग होते हैं जिन पर आरोप लगे हैं लेकिन अदालत ने अभी सजा नहीं सुनाई। इनका मुकदमा चल रहा होता है। भारत में 2024 में ऐसे कैदी कुल जेल आबादी का 73% थे। - भारत में जेलें इतनी ज्यादा भरी क्यों हैं?
इसकी मुख्य वजह अदालतों में लंबित मामले और ज़मानत न मिल पाना है। जब तक मामला अदालत में चलता है, कैदी जेल में रहता है। साथ ही जेलों की क्षमता कैदियों की संख्या के मुकाबले कम है। - क्या छत्तीसगढ़ की जेलें ओवरफुल हैं?
2024 में छत्तीसगढ़ की जेलों में 127.6% occupancy दर्ज की गई। हालांकि यह 2015 के 234% से काफी कम है, लेकिन अभी भी क्षमता से ज्यादा कैदी बंद हैं।
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