भारतीय सेना की नई यूनिफॉर्म: स्वदेशी बंदी जैकेट को मिली जगह, जानें क्या बदला
समझें क्या है पूरा मामला...
- भारतीय सेना की 174 पेज की नई यूनिफॉर्म बुक।
- भारतीय सेना ने उतारे गुलामी के दौर के निशान।
- सेना की परेड में तलवार अब वैकल्पिक हो गई।
- बंदी जैकेट जवानों की अब फॉर्मल ड्रेस में शामिल।
- 246 जगहों के अंग्रेजी नाम भी बदले।
भारतीय सेना ने 'आर्मी यूनिफॉर्म-2026' नाम से 174 पेज की नई गाइडबुक जारी की है। इसमें औपनिवेशिक दौर के कई नियम हटाए गए हैं। परेड में रिव्यूइंग ऑफिसर के लिए तलवार रखना अब अनिवार्य नहीं रहा।
पहली बार स्वदेशी बंदी जैकेट को फॉर्मल सिविल ड्रेस में शामिल किया गया है। सेना का कहना है कि ये बदलाव भारत की आधुनिक सोच और राष्ट्रीय भावना को दर्शाते हैं।
सेना ने क्यों बदली यूनिफॉर्म
भारतीय सेना ने देश की आजादी के सात दशक से ज्यादा बाद यह कदम उठाया है। वर्दी और परंपराओं में अब भी ब्रिटिश दौर की कई चीजें बची थीं। नई गाइडबुक में इन्हें व्यवस्थित तरीके से हटाया गया है।
सेना का साफ कहना है कि इन बदलावों का मकसद परंपराओं को मिटाना नहीं है। बल्कि गुलामी के दौर की बची-खुची निशानियों को आधुनिक भारतीय सोच के अनुरूप बनाना है।
तलवार और पाउच बेल्ट में बदलाव
नए नियमों के मुताबिक अब तलवार सिर्फ परेड कमांडर, कंटिंजेंट कमांडर और कुछ निर्धारित अधिकारी ही रख सकेंगे। गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, सेना दिवस और गार्ड ऑफ ऑनर जैसे खास मौकों पर ही इसका इस्तेमाल होगा।
रिव्यूइंग ऑफिसर अब परेड में तलवार नहीं रखेंगे। कुछ मैस ड्रेस के साथ इस्तेमाल होने वाली पाउच बेल्ट भी हटाई गई है। इसके अलावा 'रॉयल' जैसे पुराने शब्दों का इस्तेमाल भी बंद किया गया है।
बंदी जैकेट को पहली बार मिली जगह
पहली बार फॉर्मल सिविल ड्रेस कोड में स्वदेशी बंदी जैकेट को शामिल किया गया है। यह बंद गले वाली जैकेट पूरी तरह भारतीय पहनावे की पहचान है।
इसे फुल स्लीव शर्ट, फॉर्मल ट्राउजर और बंद जूतों के साथ पहना जा सकेगा। यह कदम खासा अहम है। अब तक औपचारिक मौकों पर सेना के जवान और अफसर पश्चिमी शैली की ड्रेस पहनते थे।
वर्दी पहनने के नए नियम
नई मैनुअल में जवानों के निजी रूप-रंग और व्यवहार पर भी पूरी गाइडलाइन दी गई है। बिना इजाजत दाढ़ी रखने, अजीब हेयरस्टाइल, दिखने वाले इलेक्ट्रॉनिक गैजेट, टैटू, बॉडी पियर्सिंग और मेकअप पर पाबंदी बरकरार रहेगी।
अधिकारी और जवान बिना इजाजत राजनीतिक, धार्मिक या प्रदर्शन की जगह, शादियों, निजी पार्टियों और पेड मीडिया इवेंट में वर्दी पहनकर नहीं जा सकेंगे।
2023 में भी हटाई थीं कई परंपराएं
यह पहली बार नहीं है जब सेना ने औपनिवेशिक परंपराओं को हटाया है। फरवरी 2023 में भी कई बड़े बदलाव किए गए थे। उस समय समारोहों में घोड़ा-गाड़ी का इस्तेमाल बंद किया गया था। रिटायरमेंट के दौरान 'पुल आउट' इवेंट और डिनर में पाइप बैंड की परंपरा भी उसी वक्त खत्म हुई थी।
246 जगहों के नाम भी बदले
इसी साल सेना ने अपने ठिकानों पर 246 सड़कों, इमारतों और सुविधाओं के नाम भी बदले। इनमें 124 सड़कें, 77 कॉलोनियां, 27 इमारतें और 18 दूसरी सुविधाएं शामिल थीं।
दिल्ली कैंट में किर्बी प्लेस का नाम केनुगुरुसे विहार रखा गया। मॉल रोड का नाम बदलकर अरुण खेत्रपाल मार्ग किया गया। अंबाला, मथुरा, जयपुर, बरेली, महू, देहरादून और कोलकाता जैसी जगहों पर भी ब्रिटिश दौर के नाम हटाए गए।
कॉम्बैट यूनिफॉर्म का पेटेंट भी कराया
सेना ने 2025 में अपने नए कोट कॉम्बैट के डिजिटल प्रिंट डिजाइन का पेटेंट भी करा लिया था। अब कोई भी बिना सेना की इजाजत के इस डिजाइन की यूनिफॉर्म नहीं बना सकता, बेच नहीं सकता और न ही इस्तेमाल कर सकता।
ऐसा करने पर कानूनी कार्रवाई और जुर्माना होगा। यह कदम नकली या अनधिकृत सैन्य वर्दी के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है।
भारत में सेना की नई यूनिफॉर्म और वैश्विक तुलना
भारतीय सेना ने हाल के वर्षों में अपनी कॉम्बैट यूनिफॉर्म में अहम बदलाव किए हैं। इसका उद्देश्य केवल डिजाइन बदलना नहीं, बल्कि फील्ड में बेहतर छुपाव, आराम और तकनीकी अनुकूलता बढ़ाना है।
नई यूनिफॉर्म में डिजिटल पैटर्न, हल्के फैब्रिक और बेहतर वेंटिलेशन जैसी सुविधाएं जोड़ी गई हैं, जिससे सैनिकों की कार्यक्षमता बढ़ सके। भारत का यह कदम किसी एक देश तक सीमित नहीं है।
दुनिया की कई प्रमुख सेनाएं समय-समय पर अपनी वर्दी में बदलाव करती रही हैं, खासकर बदलते युद्ध स्वरूप और तकनीक को देखते हुए।
भारत के संबंध में...
भारतीय सेना ने DRDO और National Institute of Fashion Technology (NIFT) के सहयोग से नई कॉम्बैट यूनिफॉर्म विकसित की है। इसमें “डिजिटल डिसरप्टिव पैटर्न” का उपयोग किया गया है, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में बेहतर छलावरण देता है। सेना के अधिकारियों के अनुसार, यह बदलाव ऑपरेशनल जरूरतों और भारतीय जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है।
अमेरिका और NATO देश
अमेरिकी सेना ने 2000 के दशक में Universal Camouflage Pattern (UCP) को हटाकर MultiCam और Operational Camouflage Pattern (OCP) अपनाया।
इसका कारण था अलग-अलग भू-भाग में बेहतर छुपाव। Pentagon के अनुसार, नए पैटर्न ने अफगानिस्तान और इराक जैसे क्षेत्रों में सैनिकों की विजिबिलिटी को काफी कम किया।
ब्रिटिश सेना ने भी Multi-Terrain Pattern (MTP) को अपनाया, जो रेगिस्तान और जंगल दोनों में काम आता है। UK Ministry of Defence की रिपोर्ट में कहा गया कि यह यूनिफॉर्म विभिन्न ऑपरेशनल थिएटर्स के लिए ज्यादा उपयुक्त साबित हुई।
रूस और चीन का दृष्टिकोण
रूस ने “Ratnik” कॉम्बैट सिस्टम के तहत नई वर्दी और उपकरण विकसित किए, जिसमें थर्मल प्रोटेक्शन और डिजिटल फैब्रिक शामिल हैं। Russian Defense Ministry के अनुसार, यह सिस्टम सैनिकों की सहनशक्ति और सुरक्षा दोनों बढ़ाता है।
चीन ने People’s Liberation Army (PLA) की यूनिफॉर्म को डिजिटल छलावरण पैटर्न के साथ अपडेट किया है। चीनी रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक, यह बदलाव आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक वारफेयर के अनुरूप है।
निष्कर्ष
भारत अकेला नहीं है जो यूनिफॉर्म में बदलाव कर रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और चीन जैसी सेनाएं भी लगातार अपनी वर्दी को आधुनिक बना रही हैं। यह बदलाव वैश्विक स्तर पर सैन्य आधुनिकीकरण की एक सामान्य प्रक्रिया बन चुका है, जिसका उद्देश्य सैनिकों की सुरक्षा और युद्ध क्षमता दोनों को बढ़ाना है।
FAQ
- भारतीय सेना की नई यूनिफॉर्म गाइडलाइन में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि परेड में रिव्यूइंग ऑफिसर के लिए तलवार रखना अब अनिवार्य नहीं रहा। इसके अलावा स्वदेशी बंदी जैकेट को पहली बार फॉर्मल सिविल ड्रेस में शामिल किया गया है। 'आर्मी यूनिफॉर्म-2026' नाम की 174 पेज की नई बुक में ये सभी नियम दर्ज हैं। - क्या सेना ने तलवार का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया है?
नहीं, तलवार पूरी तरह बंद नहीं हुई है। अब यह केवल परेड कमांडर, कंटिंजेंट कमांडर और कुछ निर्धारित अधिकारियों तक सीमित कर दी गई है। गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे बड़े समारोहों में इसका इस्तेमाल जारी रहेगा। - बंदी जैकेट क्या होती है और सेना में इसे क्यों शामिल किया गया?
बंदी जैकेट एक बंद गले वाली स्वदेशी भारतीय जैकेट है जो हमारी अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी है। इसे फुल स्लीव शर्ट, फॉर्मल ट्राउजर और बंद जूतों के साथ पहना जा सकता है। सेना ने इसे औपनिवेशिक दौर की पश्चिमी शैली की जगह भारतीय पहनावे को बढ़ावा देने के लिए शामिल किया है।
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