आईपीएस अंशिका वर्मा को सलामी न देना सिपाही को पड़ा भारी, जानिए पुलिस में क्या हैं सैल्यूट के नियम?

Anjali Dwivedi | May 14, 2026, 17:53 IST
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उत्तरप्रदेश के बरेली में एक नए सिपाही ने महिला एसपी को सलामी नहीं दी। इसके बाद उसे 15 दिन की ट्रेनिंग पर भेज दिया गया। यह मामला सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। आइए जानते हैं पुलिस मैनुअल के अनुसार सलामी के नियम क्या हैं।

शार्ट में समझें क्या है पूरा मामला

  • बरेली में एसपी अंशिका वर्मा आंवला थाने के निरीक्षण पर गई थीं।
  • गेट पर तैनात सिपाही परम सिंह ने महिला अधिकारी को सलामी नहीं दी।
  • सिपाही का कहना है कि एसपी सादे कपड़ों में थीं, इसलिए नहीं पहचाना।
  • विभाग ने इसे अनुशासनहीनता मानकर सिपाही को पुलिस लाइन भेज दिया है।
  • सिपाही को अब 15 दिनों तक सलामी की अतिरिक्त ट्रेनिंग लेनी होगी।

उत्तर प्रदेश के बरेली में इन दिनों एक घटना चर्चा में है। साउथ एसपी अंशिका वर्मा जब निरीक्षण कर रही थीं, तब एक नए सिपाही ने उन्हें सलामी नहीं दी। इसके बाद उस सिपाही को 15 दिन की अतिरिक्त ड्रिल और सलामी की ट्रेनिंग के लिए पुलिस लाइन भेज दिया गया। सोशल मीडिया पर इसे सजा बताया जा रहा है।



वहीं इस पर पुलिस विभाग का कहना है कि यह अनुशासन और ट्रेनिंग का हिस्सा है। अब सवाल यह उठता है कि पुलिस में सलामी देना कितना जरूरी है? किसे सलामी देनी होती है और जवानों को इस बारे में ट्रेनिंग में क्या सिखाया जाता है? चलिए, पुलिस मैनुअल के मुताबिक इस नियम को समझते हैं।



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पुलिस फोर्स में सलामी देने का क्या महत्व है?

पुलिस या सेना में सलामी देना केवल हाथ उठाना नहीं है। यह अनुशासन और अपने सीनियर के प्रति सम्मान का प्रतीक है। सलामी का मतलब है कि जवान ड्यूटी के प्रति पूरी तरह समर्पित है। यह सम्मान दिखाने का सबसे पुराना और गरिमामय तरीका है।



ट्रेनिंग के दौरान यह भी सिखाया जाता है कि हाथ कैसे उठें। सलामी देने से यह भी पता चलता है कि जवान निहत्था है। उसके हाथ में कोई खतरा या हथियार मौजूद नहीं है। इसी वजह से पुलिस में इसे बहुत गंभीरता से लिया जाता है।



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पुलिस जवानों को सैल्यूट की ट्रेनिंग कैसे दी जाती है?

पुलिस की ट्रेनिंग में ड्रिल एक बहुत बड़ा हिस्सा होती है। यहां जवानों को घंटों तक सलामी की प्रैक्टिस कराई जाती है। उन्हें सिखाया जाता है कि हाथ का एंगल कितना होना चाहिए। सीनियर ऑफिसर को देखकर कैसे सावधान मुद्रा में खड़े होना है।



ट्रेनिंग में बाएं और दाएं तरफ देखकर सलामी सिखाई जाती है। हाथ की उंगलियां सीधी और हथेली बाहर की तरफ होनी चाहिए। यह सब इसलिए होता है ताकि ड्यूटी पर कोई गलती न हो। बरेली वाले मामले में इसी ट्रेनिंग की कमी मानी गई है।



पुलिस में सलामी देने का सही तरीका क्या है?

  • पुलिस मैन्युअल के मुताबिक, सलामी आमतौर पर दाहिने हाथ से दी जाती है।
  • तर्जनी उंगली वाला हिस्सा दाहिनी भौंह या टोपी के किनारे तक लाया जाता है।
  • उंगलियां सीधी रहती हैं।
  • हथेली बाहर की ओर रहती है।
  • बांह और कलाई सीधी लाइन में होनी चाहिए।
  • अगर कोई जवान दाहिने हाथ से सलामी नहीं दे सकता, तो कुछ खास स्थिति में बाएं हाथ का इस्तेमाल भी किया जा सकता है।
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किन अधिकारियों को सलामी दी जाती है?

पुलिस विभाग में एक तय हायरार्की या चेन बनी होती है। हर जवान को अपने से बड़े पद वाले अधिकारी को सलामी देनी है। इसमें डीजीपी से लेकर सीओ तक के सभी अधिकारी शामिल होते हैं। यह सम्मान पद की गरिमा बनाए रखने के लिए जरूरी है।



इसके अलावा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल को भी सलामी दी जाती है। न्यायाधीशों और VVIP के लिए भी विशेष प्रोटोकॉल का पालन होता है। ट्रैफिक ड्यूटी पर तैनात जवान केवल सावधान खड़े होकर सम्मान दे सकते हैं। वहां हर पल हाथ उठाकर सैल्यूट करना व्यावहारिक नहीं होता।



क्या सादे कपड़ों में भी सलामी दी जाती है?

अक्सर यह सवाल उठता है कि बिना वर्दी वाले को सलामी दें या नहीं। नियम कहता है कि अगर अधिकारी की पहचान साफ है, तो सम्मान दें। हालांकि, कई बार नए जवान पहचान नहीं कर पाते, इसलिए ऐसे मामलों में अतिरिक्त ट्रेनिंग दी जाती है। भले ही अधिकारी सादे कपड़ों में हों, उन्हें पहचाना जाना चाहिए। बरेली मामले में एसपी सरकारी गाड़ी और स्टाफ के साथ थीं। इसके बाद भी सिपाही ने एसपी को सलामी नहीं दी।



विभागीय जानकारों का कहना है कि जवानों को पहचानना सिखाया जाता है। अगर पहचान में चूक होती है, तो उसे अनुशासन की कमी माना जाएगा। इसी वजह से बरेली सिपाही को दोबारा पुलिस लाइन में ट्रेनिंग के लिए भेजा गया। वहां उसे नियमों और पहचान की बारीकियां दोबारा सिखाई जाएंगी।



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