जयप्रकाश नारायण जयंती: 1975 में इंदिरा के सामने युवाओं की ढाल बन खड़े हुए थे लोकनायक, आज सड़कों पर फिर गूंज रहा है वैसा ही नारा
सिताब दियारा से लोकनायक तक
जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा में हुआ। पटना के साइंस कॉलेज में पढ़ाई के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गए। वहां उन्होंने समाजशास्त्र पढ़ा और मार्क्सवाद-समाजवाद की विचारधाराओं को गहराई से समझा। 1929 में भारत लौटकर वे स्वतंत्रता आंदोलन में उतरे। पत्नी प्रभावती पहले से गांधी आश्रम में रहती थीं।
आज़ादी की लड़ाई में वे नेहरू के करीबी सहयोगी रहे। आज़ादी के बाद उन्होंने सत्ता का रास्ता छोड़ा और समाजसेवा चुनी। 1965 में उन्हें रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। दिलचस्प बात यह है कि जिस इंदिरा गांधी के खिलाफ उन्होंने सबसे बड़ी लड़ाई लड़ी, उन्हें वे पत्रों में "माई डियर इंदु" लिखते थे।
एक रिपोर्ट के मुताबिक पूरे पत्राचार में सिर्फ जेल से लिखे एक पत्र में उन्होंने "माई डियर प्राइम मिनिस्टर" लिखा। यानी यह निजी दुश्मनी की नहीं, सिद्धांतों की लड़ाई थी।
1974: जब गुजरात से बिहार तक उठी चिंगारी
1970 के दशक की शुरुआत में देश महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से जूझ रहा था। गुजरात और बिहार में छात्र सड़कों पर उतरे। बिहार के छात्र आंदोलन ने जेपी को नेतृत्व के लिए बुलाया। 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान से उन्होंने 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया। उनका कहना था कि यह सिर्फ सरकार बदलने की लड़ाई नहीं है। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा-व्यवस्था की समस्याएं मौजूदा व्यवस्था में हल नहीं हो सकतीं, इसलिए पूरी व्यवस्था बदलनी होगी।
उसी साल उन्होंने जाति-भेद के खिलाफ अभियान चलाया। हज़ारों लोगों ने जनेऊ तोड़कर जाति प्रथा न मानने का संकल्प लिया।
1975: इमरजेंसी और जेपी का जवाब
12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग तेज़ हुई। जेपी ने दिल्ली में बड़ी रैली की और सेना-पुलिस से "गैरकानूनी आदेश" न मानने की अपील की। उसी रात इमरजेंसी लागू हो गई। जेपी समेत सैकड़ों विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए और प्रेस पर सेंसरशिप लगी। जेल में उनकी तबीयत बिगड़ी और कुछ महीनों बाद उन्हें रिहा करना पड़ा।
बीमार शरीर के बावजूद वे विपक्ष को एकजुट करते रहे। 1977 के चुनाव में कांग्रेस हारी, जनता पार्टी की सरकार बनी और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार आई। रामधारी सिंह दिनकर की पंक्ति "सिंहासन खाली करो कि जनता आती है" इस आंदोलन का नारा बन गई।
इस आंदोलन से लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज जैसे नेता निकले। इनमें से कई दशकों तक भारतीय राजनीति के शीर्ष पर रहे।
आज: फिर सड़कों पर युवा, फिर संसद की ओर कदम
अब आज की तस्वीर देखिए। सिर्फ दो महीने पहले बनी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में छात्र-युवा NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर हैं। 20 जुलाई को संसद मार्च हुआ। आंसू गैस और लाठीचार्ज की खबरें आईं। दिल्ली पुलिस के मुताबिक उस दौरान 118 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए और करीब 70 प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए। राहुल गांधी समेत कांग्रेस सांसदों ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरना दिया, और संसद में विपक्ष पुलिस कार्रवाई के खिलाफ हंगामा करता रहा।
हाल ही में 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर नया प्रदर्शन हुआ। इस बार निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त हैं । CJP और विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित गड़बड़ियों को लेकर उनके इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। CJP संस्थापक अभिजीत दिपके कह चुके हैं कि वे "गांधी के अहिंसा के रास्ते" पर चलेंगे और गिरफ्तारी के लिए तैयार हैं। उनका आरोप है कि कार्यकर्ताओं को पुलिस नोटिस भेजे जा रहे हैं।
समानताएं: जो 1975 की याद दिलाती हैं
नेतृत्व युवाओं के हाथ में: 1974 में भी पहली चिंगारी छात्रों ने जलाई थी, नेताओं ने नहीं।
मुद्दे वही परिवार के: तब भ्रष्टाचार और शिक्षा-व्यवस्था थी, आज पेपर लीक और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता है।
विपक्ष का साथ आना: जेपी ने बिखरे विपक्ष को जोड़ा था। आज भी अलग-अलग दल एक मंच पर दिख रहे हैं।
सड़क बनाम सत्ता: बैरिकेडिंग, भारी पुलिस तैनाती, मेट्रो स्टेशन बंद और प्रदर्शन की अनुमति पर विवाद, ये दृश्य हर दौर में दोहराए जाते हैं।
फर्क: जो तुलना को ईमानदार बनाते हैं
तुलना करते समय फर्क भी याद रखना होगा, वरना यह एकतरफा हो जाएगी।
जेपी की विरासत से क्या सीख
जेपी का सबसे बड़ा संदेश यह था कि राजनीति का मकसद सिर्फ सत्ता नहीं, जनसेवा और न्याय है। उन्होंने खुद कभी कोई पद नहीं लिया, जबकि जनता पार्टी सरकार उन्हीं की ताकत से बनी थी। 8 अक्टूबर 1979 को पटना में उनका निधन हुआ। 1999 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न मिला। आज पटना हवाई अड्डा तथा दिल्ली का 'लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल' उनके नाम पर हैं।
आज के सवाल वही हैं जो 1974 में थे: असहमति का हक कहां तक है, सत्ता की जवाबदेही कौन तय करेगा, और युवाओं की आवाज़ को सुना जाएगा या दबाया जाएगा। जेपी का जवाब था कि लोकतंत्र में आखिरी फैसला जनता का होता है।