सबरीमाला केस: जस्टिस नागरत्ना बोलीं, व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान नहीं चलेगा, कोर्ट में तथ्य जरूरी

Jitendra Shrivastava | Apr 23, 2026, 21:57 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. सबरीमाला रेफरेंस केस में जस्टिस नागरत्ना ने 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' से मिली जानकारी को अस्वीकार कर दिया। सबरीमाला मामले में सर्वोच्च अदालत में सुनवाई जारी है।

News In Short

  • सबरीमाला केस में सर्वोच्च अदालत में सुनवाई जारी है।
  • जस्टिस नागरत्ना ने कहा, व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान अमान्य है।
  • सीजेआई ने कहा कि व्यक्तिगत राय कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं है।
  • वकील कौल ने ज्ञान के किसी भी स्रोत का स्वागत करने की बात कही।
  • सबरीमाला रेफरेंस में विभिन्न धार्मिक प्रथाओं पर चर्चा हो रही है।

News In Detail

सबरीमाला रेफरेंस केस (Sabarimala reference case) में सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) में आठवें दिन की सुनवाई काफी अहम रही। इस दौरान, एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब जस्टिस बीवी नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) ने एक वकील की दलील पर तीखी टिप्पणी की।



जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि अदालत में 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' (WhatsApp University) से मिली जानकारी स्वीकार्य नहीं होगी। यह टिप्पणी उस बहस के बीच आई, जहां वकील ने किसी भी स्रोत से ज्ञान अपनाने की वकालत की थी। अदालत ने व्यक्तिगत रायों और अदालती साक्ष्यों के बीच अंतर को रेखांकित किया। यह सुनवाई धार्मिक प्रथाओं और संवैधानिक अधिकारों के संतुलन पर केंद्रित थी।



सबरीमाला सुनवाई का आठवां दिन

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में सबरीमाला रेफरेंस केस (Sabarimala reference case) की सुनवाई चल रही थी। यह सुनवाई का आठवां दिन था। कोर्ट में कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं पर चर्चा हो रही थी। जस्टिस नागरत्ना (Justice Nagaratna) ने सुनवाई के दौरान एक टिप्पणी की।



व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर तंज

सीनियर वकील नीरज किशन कौल अपनी दलीलें दे रहे थे। उन्होंने कहा कि ज्ञान और विवेक किसी भी स्रोत से मिले। इसे अपनाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। तभी जस्टिस नागरत्ना ने हल्के-फुल्के अंदाज में तंज कसा। उन्होंने कहा कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी (WhatsApp University) से जानकारी स्वीकार नहीं की जा सकती।



सीजेआई की अहम टिप्पणी

कौल डॉ. शशि थरूर के एक लेख का हवाला दे रहे थे। मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने इस पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अदालत सभी विचारकों का सम्मान करती है। लेकिन लेख अंततः एक व्यक्तिगत राय होती है। पर्सनल ओपिनियन (Personal Opinion) कोर्ट पर बाध्यकारी नहीं हो सकती।



वकील की प्रतिक्रिया

सीजेआई की बात पर वकील कौल ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ज्ञान और बुद्धिमत्ता का स्वागत होना चाहिए। यह चाहे किसी भी देश या विश्वविद्यालय से आए। उनका तर्क था कि सूचना का स्रोत कोई भी हो सकता है। मुद्दा सूचना के महत्व का है।



विवाद की मुख्य जड़

नीरज किशन कौल दाऊदी बोहरा समुदाय की ओर से पेश हो रहे हैं। उनकी याचिका समुदाय में बहिष्कार प्रथा को चुनौती देती है। उन्होंने अनुच्छेद 26(बी) और 25(2)(बी) की व्याख्या की। वकील ने दोनों अनुच्छेदों के बीच "हार्मोनियस कंस्ट्रक्शन" की वकालत की।



धार्मिक संप्रदाय के अधिकार

कौल ने तर्क दिया कि धार्मिक संप्रदाय के अधिकारों को हमेशा राज्य के कानूनों के अधीन नहीं माना जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने इस पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि धार्मिक अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हैं।



संवैधानिक नैतिकता का मुद्दा

वकील कौल ने 'नैतिकता' शब्द पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 में नैतिकता को 'संवैधानिक नैतिकता' (Constitutional Morality) नहीं पढ़ा जाना चाहिए। उनका तर्क था कि गलत प्रथाएं सार्वजनिक नैतिकता से ही रोकी जा सकती हैं। वे संवैधानिक नैतिकता जोड़ने के खिलाफ थे।



जस्टिस नागरत्ना का रुख

जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट किया कि जब सामाजिक सुधार के लिए कानून बनते हैं। तो धार्मिक संप्रदाय का अधिकार हमेशा प्रधान नहीं रहेगा। क्योंकि ये अधिकार भी कुछ शर्तों के अधीन हैं। सामाजिक कल्याण के कानून इनका आधार हो सकते हैं। वकील कौल ने इस बात से सहमति जताई।



सुनवाई का निष्कर्ष

सबरीमाला रेफरेंस केस में यह बहस जारी है। जस्टिस नागरत्ना की 'व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी' वाली टिप्पणी चर्चा का विषय बनी है। यह टिप्पणी कोर्ट में तथ्यात्मक जानकारी की अहमियत बताती है।



कोर्ट व्यक्तिगत रायों और सोशल मीडिया की जानकारी को साक्ष्य नहीं मानती। सुनवाई का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है।



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