सिद्दारमैया की विदाई और डीके शिवकुमार की ताजपोशी, जानिए सियासी ड्रामे की इनसाइड स्टोरी
News Delhi: दक्षिण भारत के सबसे संवेदनशील राजनीतिक अखाड़े यानी कर्नाटक से आखिरकार वह खबर आ ही गई, जिसकी सुगबुगाहट पिछले कई महीनों से थी। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रदेश की कमान अब संकटमोचक कहे जाने वाले डीके शिवकुमार के हाथों में जाने का रास्ता साफ हो चुका है।
यह कोई अचानक हुआ बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे ढाई साल पुरानी एक डील, पार्टी के भीतर की गहरी गुटबाजी, राहुल गांधी का एक सीधा संदेश और 2028 के चुनावी समीकरणों की एक लंबी बिसात बिछी हुई थी।
जब राहुल ने कहा और सिद्दारमैया ने वचन निभाया
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सिद्दारमैया ने बिना किसी बड़े सार्वजनिक विद्रोह के इस्तीफा दे दिया। इसके पीछे की वजह है उनका राहुल गांधी को दिया गया एक पुराना भरोसा।
सिद्दारमैया अक्सर कांग्रेस के भीतर यह कहते रहे हैं कि अगर राहुल गांधी उनसे खुद पद छोड़ने को कहेंगे, तो वे एक पल भी नहीं हिचकिचाएंगे। गुरुवार को यही हुआ।
सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी के एक इशारे के बाद सिद्दारमैया ने राजभवन जाकर अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालांकि, उनके बेहद करीबी लोगों का कहना है कि जब शुरुआत में उन्हें आलाकमान के इस फैसले के बारे में बताया गया था, तो वह कुछ समय के लिए सदमे की स्थिति (State of Shock) में आ गए थे। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि आलाकमान इतनी जल्दी और इस तरह से उन्हें पद छोड़ने को कह देगा।
2023 का वह गुप्त समझौता, जो गले की फांस बना
इस पूरी कहानी की पटकथा मई 2023 में ही लिख दी गई थी, जब कर्नाटक में कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल किया था। उस वक्त मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार थे-जननेता सिद्दारमैया और संगठन को अपने दम पर खड़ा करने वाले डीके शिवकुमार।
दिल्ली में कई दिनों तक चली मैराथन बैठकों के बाद एक ऐसा फॉर्मूला तैयार हुआ, जिसे सार्वजनिक तो नहीं किया गया, लेकिन दोनों नेताओं को इसके लिए राजी किया गया था। वह फॉर्मूला था रोटेशनल सीएम यानी ढाई साल सिद्दारमैया और ढाई साल डीके शिवकुमार।
सिद्दारमैया की शर्त: अगर मुख्यमंत्री पद रोटेशनल है, तो डीके शिवकुमार को कैबिनेट में नहीं रहना चाहिए।
डीके शिवकुमार की जिद: चूंकि उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पार्टी को जीत दिलाई है, इसलिए वे सरकार का हिस्सा बनकर ही रहेंगे।
आखिरकार, सिद्दारमैया सीएम बने और शिवकुमार डिप्टी सीएम। जैसे ही पिछले साल नवंबर में इस सरकार के ढाई साल पूरे होने आए, शिवकुमार गुट ने आलाकमान पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
हालांकि, बिहार चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद हाईकमान थोड़ा झिझका और मामले को इस साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों तक टाल दिया। लेकिन जैसे ही ये चुनाव खत्म हुए, शिवकुमार के लिए वादे को पूरा करने का वक्त आ गया।
2028 की बड़ी चुनौती
सीएम सिद्दारमैया को हटाए जाने के पीछे एक बहुत बड़ा व्यावहारिक कारण उनकी उम्र भी है। जब 2028 में कर्नाटक में अगले विधानसभा चुनाव होंगे, तब सिद्दारमैया 80 वर्ष के हो चुके होंगे।
कांग्रेस आलाकमान के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या पार्टी एक ऐसे अस्सी साल के नेता के नेतृत्व में चुनाव में जा सकती है, जिसने खुद यह ऐलान कर दिया हो कि अब उसकी दोबारा चुनाव लड़ने की कोई इच्छा नहीं है?
क्या एक थके हुए नेतृत्व के साथ भाजपा जैसी आक्रामक मशीनरी का मुकाबला किया जा सकता है? जवाब था-नहीं। कांग्रेस को कर्नाटक में एक युवा, ऊर्जावान और आक्रामक चेहरे की जरूरत थी जो अगले चुनाव में पार्टी की नैया पार लगा सके। डीके शिवकुमार इस सांचे में पूरी तरह फिट बैठते हैं।
भाजपा के बढ़ते कदम और दक्षिण का इकलौता किला
कांग्रेस के इस बड़े फैसले के पीछे भाजपा का मिशन साउथ भी एक बड़ा फैक्टर है। इस समय भारतीय जनता पार्टी पश्चिम, उत्तर और पूर्वी भारत में एक बड़ी ताकत बन चुकी है। दक्षिण भारत ही इकलौता ऐसा क्षेत्र है जहां क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस का दबदबा है।
कर्नाटक पूरे दक्षिण भारत में एकमात्र ऐसा राज्य है जहां भाजपा ने अतीत में अपने दम पर सरकार बनाई है। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान किसी भी कीमत पर कर्नाटक को अपने हाथ से जाने नहीं दे सकता।
भाजपा की इस घेराबंदी को तोड़ने के लिए कांग्रेस को एक ऐसे मुख्यमंत्री की जरूरत थी जो न केवल प्रशासनिक रूप से मजबूत हो, बल्कि चुनाव जीतने और संसाधन जुटाने में भी माहिर हो। शिवकुमार को अदभुत संकटमोचक और रिसोर्सफुल माना जाता है, जो भाजपा की रणनीति का मुकाबला उसी की भाषा में कर सकते हैं।
सोनिया-प्रियंका बनाम राहुल
कर्नाटक का यह सत्ता परिवर्तन कांग्रेस के भीतर के एक दिलचस्प पावर डायनेमिक्स को भी दिखाता है। 2023 में जब सीएम का चयन हो रहा था, तब राहुल गांधी पूरी तरह से सिद्दारमैया के पक्ष में थे। उन्हें लगता था कि सिद्दारमैया का 'अहिंदा' (Ahinda - अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलितों का सामाजिक गठबंधन) वोट बैंक पार्टी के लिए सबसे जरूरी है।
दूसरी तरफ, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के मन में डीके शिवकुमार के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर था। इसके पीछे एक बड़ी भावुक वजह भी थी। साल 2019 में जब ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में शिवकुमार को गिरफ्तार किया था और वे तिहाड़ जेल में थे, तब सोनिया गांधी खुद उनसे मिलने जेल गई थीं।
शिवकुमार ने कठिन से कठिन समय में भी पार्टी का साथ नहीं छोड़ा। प्रियंका गांधी का मानना था कि अब समय आ गया है जब शिवकुमार की इस वफादारी और मेहनत का इनाम उन्हें मिलना चाहिए।
कांटों का ताज हैं डीके शिवकुमार की राहें!
भले ही डीके शिवकुमार का मोमेंट आ गया है। उनकी बरसों की तपस्या सफल होती दिख रही है, लेकिन उनके आगे की राह आसान नहीं है।
पहला चैलेंज: सिद्दारमैया के वफादार विधायकों और 'अहिंदा' वर्ग को साधे रखना, जो सिद्दारमैया के जाने से थोड़ा असहज महसूस कर सकता है।
दूसरा चैलेंज: सिद्दारमैया ने डीपीडब्ल्यू (डी देवरिया उर्स) के बाद कर्नाटक में सबसे लंबे समय तक (7 वर्ष 239 दिन) सीएम रहने का रिकॉर्ड बनाया है, उनकी साफ-सुथरी और कड़क प्रशासनिक छवि की बराबरी करना शिवकुमार के लिए बड़ी चुनौती होगी।
फिलहाल, बेंगलुरु से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में सिर्फ एक ही चर्चा है-डीके शिवकुमार आखिरकार किंगमेकर से किंग बन ही गए। देखना यह है कि उनका यह आक्रामक अंदाज कर्नाटक में कांग्रेस के इस किले को कितना महफूज रख पाता है।
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