क्या दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को मिलेगा SC का दर्जा? रिपोर्ट तैयार
समझें क्या है पूरा मामला...
- दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने पर रिपोर्ट तैयार हो चुकी है।
- आयोग का गठन केंद्र सरकार द्वारा अक्टूबर 2022 में किया गया था।
- आयोग ने लगभग तीन साल तक अलग-अलग राज्यों का दौरा किया है।
- इस स्टडी में देखा गया कि धर्म बदलने के बाद भी क्या दलित समुदायों के साथ दिक्कतें बनी रहती हैं।
- संविधान के 1950 के आदेश के तहत SC का फायदा हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलितों को मिलता है।
SC दर्जे का मामला क्या है?
अभी देश में SC यानी अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) का आरक्षण सिर्फ तीन धर्मों के दलितों को मिलता है। ये हैं हिंदू, सिख और बौद्ध। यह व्यवस्था संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 के तहत चली आ रही है। जो दलित ईसाई या इस्लाम धर्म अपना चुके हैं उन्हें यह लाभ नहीं मिलता है।
तीन साल क्या-क्या हुआ?
आयोग (आयोग अध्यक्ष केजी बालकृष्णन) ने पूरे देश के राज्यों का दौरा किया। साथ ही सामाजिक, कानूनी और ऐतिहासिक पहलुओं को गहराई से समझा गया। धर्मांतरण के बाद भी जारी रहने वाले जातिगत भेदभाव के सबूत जुटाए गए।
इस दौरान यह जानने की कोशिश की गई कि धर्म बदलने के बाद दलित समुदाय की सामाजिक स्थिति बदलती है या नहीं। ज्यादातर मामलों में पाया गया कि जातिगत पहचान धर्म बदलने के बाद भी बनी रहती है।
रिपोर्ट में क्या-क्या है?
रिपोर्ट में चार बड़े विषयों पर विस्तृत विश्लेषण किया गया है। पहला, सामाजिक भेदभाव। दूसरा, आरक्षण व्यवस्था। तीसरा, जातिगत पहचान। और चौथा, धर्मांतरण का असर।
रिपोर्ट के नतीजे अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं। इसे जल्द ही केंद्र सरकार को सौंपा जाएगा। इसके बाद सरकार तय करेगी कि आगे क्या कदम उठाए जाएं।
यह मुद्दा इतना अहम क्यों है?
देश में दलित ईसाइयों और दलित मुस्लिमों की संख्या करोड़ों में है। उन्हें SC का दर्जा मिला तो वे सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के हकदार बन जाएंगे। यह उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव ला सकता है।
FAQ
- दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को SC दर्जा क्यों नहीं मिलता?
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत SC का दर्जा सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों को मिलता है। ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को इस आरक्षण से बाहर रखा गया है।
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