यहां पुरुष साड़ी पहनकर करते हैं देवी की पूजा, होता है 16 शृंगार, सबरीमाला विवाद के बीच चर्चा में केरलम का मंदिर
पांच प्वाइंट में समझें पूरा मामला
- केरल के कोल्लम जिले में एक मंदिर है जिसकी परंपरा पूरे देश में अनोखी है।
- कोट्टांकुलंगारा श्रीदेवी मंदिर में हर साल हजारों पुरुष साड़ी पहनकर, 16 शृंगार करके देवी वनदुर्गा की पूजा करते हैं।
- इस उत्सव को चमयविलक्कु (Chamayavilakku) कहते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई के दौरान इस मंदिर की परंपरा का जिक्र हुआ।
- 25 हजार से अधिक श्रद्धालु इस 16 दिवसीय उत्सव में शामिल होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में हुआ जिक्र
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर मामले पर 9 जजों की बड़ी बेंच ने तीन दिन सुनवाई की। इस दौरान देशभर के मंदिरों की अलग-अलग परंपराओं का जिक्र हुआ। इसी सिलसिले में केरलम के कोट्टांकुलंगारा मंदिर की अनोखी परंपरा भी सामने आई। सोशल मीडिया के दौर में यह मंदिर और इसकी परंपरा पहले से ही चर्चा में रही है।
कहां है यह मंदिर और क्या है खासियत
यह मंदिर केरलम के कोल्लम जिले के चंवारा गांव में स्थित है। इसका पूरा नाम कोट्टांकुलंगारा श्रीदेवी मंदिर है। इस मंदिर की एक और खास बात है कि यह केरलम का एकमात्र ऐसा मंदिर माना जाता है जहां गर्भगृह के ऊपर छत नहीं है। यहां देवी भगवती की पूजा होती है जिन्हें वनदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर अपनी सदियों पुरानी परंपरा के लिए पूरे देश में जाना जाता है।
क्या होता है चमयविलक्कु उत्सव में
हर साल मार्च महीने में मलयालम कैलेंडर के मीनम मास में यह 16 दिवसीय उत्सव मनाया जाता है। मीनम मास के 10वें और 11वें दिन मुख्य कार्यक्रम होते हैं। इस उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण चमयविलक्कु अनुष्ठान है।
इसमें हजारों पुरुष साड़ी, हाफ साड़ी या पारंपरिक नृत्य वेशभूषा पहनते हैं। सभी 16 शृंगार करते हैं और हाथों में पारंपरिक दीप यानी विलक्कु लेकर भव्य शोभायात्रा में शामिल होते हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर यह जुलूस बेहद रंगीन और आकर्षक हो जाता है।
परंपरा की शुरुआत कैसे हुई
इस मंदिर से जुड़ी एक पुरानी किवदंती है। कहा जाता है कि बहुत पहले कुछ ग्वाले एक पत्थर पर नारियल तोड़ रहे थे। तभी उस पत्थर से खून निकलने लगा। यह देख सभी मान गए कि उस पत्थर में वनदेवी की शक्ति है। उसी स्थान पर बाद में मंदिर बनाया गया।
शुरुआत में युवा लड़कियां मंदिर में फूलों की माला बनाती और दीप जलाती थीं। फिर ग्वालों ने भी स्त्री वेश में पूजा-अर्चना शुरू की। यही परंपरा आगे चलकर चमयविलक्कु उत्सव के रूप में विकसित हो गई।
भक्ति और एकता का संगम
इस उत्सव में सिर्फ हिंदू नहीं बल्कि विभिन्न धर्मों के 25 हजार से अधिक लोग शामिल होते हैं। चमयविलक्कु के अलावा इसमें केट्टुकाझ्चा यानी सजावटी संरचनाओं का प्रदर्शन और पारंपरिक कला रूप भी प्रस्तुत किए जाते हैं।
श्रद्धालुओं का मानना है कि इस अनुष्ठान में भाग लेने से देवी का आशीर्वाद मिलता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह भक्ति, विनम्रता और आध्यात्मिक शांति का प्रतीक है।
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