पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के बाद अब केरलम से भी लेफ्ट का सफाया, देश में कही नहीं बची सरकार

Sandeep Kumar | May 04, 2026, 23:43 IST
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केरलम विधानसभा चुनाव में UDF की जीत के साथ ही देश से लेफ्ट की सरकार का सफाया हो गया। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल से पहले ही लेफ्ट का सफाया हो चुका है।

News in Detail

  • देश के सभी राज्यों से लेफ्ट का शासन समाप्त हो चुका है।
  • केरल में यूडीएफ को बढ़त, लेफ्ट का सफाया हो सकता है।
  • पश्चिम बंगाल में 2011 में ममता ने लेफ्ट को सत्ता से बाहर किया।
  • त्रिपुरा में 2018 में भाजपा ने लेफ्ट को हराया, लेफ्ट तीसरे नंबर पर।
  • केरल में 1957 में पहली चुनी हुई लेफ्ट सरकार बनी थी, अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा है।

News in Short

आजादी के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं रही। अब तक लेफ्ट की प्रमुख सरकारें केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में रही थीं, लेकिन अब इन तीनों राज्यों से लेफ्ट का सफाया हो चुका है।



पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा से लेफ्ट का सफाया

इसके पहले, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भी लेफ्ट का शासन समाप्त हो चुका है। पश्चिम बंगाल में 2011 में लेफ्ट की सरकार बाहर हो गई थी और वहां फिर कभी लेफ्ट सत्ता में नहीं आया। वहीं, त्रिपुरा में भी 2018 में लेफ्ट की सरकार को जनता ने सत्ता से बाहर कर दिया था। अब केरल में भी यही स्थिति बनती दिख रही है।



सबसे पहले केरल में ही बनी थी लेफ्ट की सरकार

1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार मिलाकर केरलम राज्य बना। मार्च 1957 में यहां पहला विधानसभा चुनाव हुआ। 126 सीटों वाली विधानसभा में CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय के साथ सरकार बनाई। यह दुनिया की पहली चुनी हुई लेफ्ट सरकार थी।



ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने का अधिकार मिला। लैंडहोल्डिंग की सीमा तय की गई। शिक्षा बिल से प्राइवेट संस्थानों के लिए सख्त नियम बनाए गए।



2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। वह केरलम गईं और लौटने के बाद प्रधानमंत्री नेहरू को रिपोर्ट दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई।



1967 में बंगाल में बनी थी लेफ्ट की सरकार

पश्चिम बंगाल में 1967 में लेफ्ट ने 'यूनाइटेड फ्रंट' से सरकार बनाई। उस समय अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री और ज्योति बसु डिप्टी सीएम थे। सरकार अस्थिर रही। 1975 में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई। CPI ने इसे समर्थन दिया, जबकि CPI(M) ने विरोध किया। 1977 के चुनाव में लेफ्ट को भारी बहुमत मिला। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और 2000 तक रहे। बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने। उन्होंने राज्य में उद्योगों को लाने की कोशिश की। सिंगूर और नंदीग्राम विवादों के बाद 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने कम्युनिस्ट शासन को समाप्त किया। सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य अपना चुनाव हार गए।



ऐसे हुई लेफ्ट सरकार की विदाई

पश्चिम बंगाल (2011): ममता बनर्जी ने 34 साल के शासन के बाद लेफ्ट को सत्ता से बाहर किया। लगातार दो विधानसभा चुनावों में लेफ्ट का एक भी विधायक नहीं है।



त्रिपुरा (2018): 25 साल से सत्ता में रहे माणिक सरकार के नेतृत्व में लेफ्ट चुनाव लड़ा। भाजपा ने ‘चलो पलटाई’ के नारे से उन्हें हराया। आज त्रिपुरा में लेफ्ट तीसरे नंबर का मोर्चा है।



केरलम (2026): केरलम को लेफ्ट का आखिरी गढ़ माना जाता था। चुनाव में हार के बाद यहां भी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई है।



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