तेज शोर से बढ़ा हार्ट अटैक का खतरा, हर साल हो रही हजारों भारतीयों की मौत
दुनिया के मशहूर वैज्ञानिक निकोला टेस्ला ने कहा था अगर ब्रह्मांड को समझना है, तो उसकी ऊर्जा, फ्रीक्वेंसी और कंपन को समझो। इसका मतलब ये है कि किसी भी चीज, जैसे प्रकाश, ध्वनि, या विचार को समझने के लिए हमें उसकी फ्रीक्वेंसी को समझना जरूरी है।
जब ये फ्रीक्वेंसी बढ़ती या घटती है, तो उसकी आवाज भी बदलती है। इसका हमारे जीवन पर सीधा असर पड़ता है। इतना असर कि कभी-कभी यह हमारे लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है।
वरमाला पहनाते समय हुई मौत
इसका एक उदाहरण 4 मार्च 2023 की घटना है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के 22 साल के सुरेंद्र कुमार की शादी हो रही थी। जैसे ही उन्होंने मंच पर वरमाला पहनने की कोशिश की, तेज DJ की आवाज से वह असहज महसूस करने लगे थे। इसके बाद वे अचानक मंच पर गिर पड़े।
डॉक्टरों ने बताया था कि उनकी मौत हार्ट अटैक से हुई थी। उनका मानना था कि तेज संगीत के कारण उनकी दिल की धड़कन अनियमित हो गई थी। इसके बाद उनका दिल अचानक रुक गया था।
नाचते समय पड़ा दिल का दौरा
ठीक इसी प्रकार 25 नवंबर 2022 को वाराणसी के पिपलानी कटरा में एक शादी हो रही थी। इसी दौरान एक आदमी को नाचते समय दिल का दौरा पड़ा और उसकी मौत हो गई।
ये सिर्फ दो घटनाएं हैं लेकिन हर साल ऐसे सैकड़ों मामले सामने आते हैं, जहां तेज शोर या आवाज के कारण लोगों को हार्ट अटैक आता है। इनमें से कई लोगों की तो मौत हो जाती है। वहीं कुछ लोग सालों तक अस्पताल के चक्कर लगाते रहते हैं।
300 ड्राइवरों पर की रिसर्च
लखनऊ के KGMU मेडिकल कॉलेज और अस्पताल ने इस विषय पर रिसर्च की थी। रिसर्च में पाया कि लंबे समय तक तेज शोर वाली जगहों पर रहने से मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
इसके अलावा ब्लड प्रेशर (हाई ब्लड प्रेशर) भी खतरनाक तरीके से बढ़ सकता है। इससे डिप्रेशन और कम नींद आने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
दरअसल दिसंबर 2025 में किए गए एक अध्ययन में 300 ड्राइवरों पर रिसर्च की गई थी। इनमें से 150 ऑटो ड्राइवर दिनभर ट्रैफिक शोर वाले इलाकों में गाड़ी चलाते थे। वहीं बाकी 150 कार ड्राइवर कम शोर वाले क्षेत्रों में गाड़ी चलाते थे।
रिसर्च के दौरान इन लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की जांच की गई थी। ऑटो चालकों में से 39.3% लोगों को मध्यम एंजायटी की समस्या थी। 13.3% को गंभीर एंजायटी का सामना करना पड़ रहा था। इसके अलावा 42% ऑटो चालकों में मध्यम डिप्रेशन के लक्षण थे और 12% को गंभीर डिप्रेशन हो रहा था।
वहीं कार ड्राइवरों में आधे से ज्यादा लोगों को डिप्रेशन के कोई लक्षण नहीं मिले और उनमें से कोई भी गंभीर डिप्रेशन से पीड़ित नहीं था।
70 dB तक ध्वनि ही सुरक्षित
ऑटो के अंदर शोर का स्तर 84-86 डेसिबल के बीच पाया गया है। वहीं कारों में यह लगभग 74 डेसिबल होता है। डेसिबल ध्वनि मापने की इकाई है। इसे dB के रूप में संक्षिप्त किया जाता है।
70 dB या उससे कम की ध्वनि को सुरक्षित माना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से 10 डेसिबल की बढ़ोतरी भी हानिकारक असर को दोगुना कर सकती है।
ऑटो चालकों में सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया जो दिल की धड़कन के दौरान आपकी धमनियों में दबाव को मापता है।
रिसर्चर ने दी चेतावनी
रिसर्चर ने चेतावनी दी कि लंबे समय तक शोर से होने वाला तनाव हृदय रोगों का खतरा बढ़ा सकता है। कई टेम्पो चालकों ने पीठ दर्द, सिरदर्द, बदन दर्द और सांस फूलने जैसी समस्याओं की शिकायत की जो शारीरिक तनाव का संकेत हैं।
इस रिसर्च से यह भी साफ होता है कि तेज आवाज के कारण ब्लड प्रेशर बढ़ने से हार्ट अटैक जैसी समस्या हो सकती है।
हर साल 12 हजार से ज्यादा भारतीयों की मौत
CME इंडिया मेडिकल की पढ़ाई और रिसर्च करने वाली संस्था है। इसके अनुसार हर साल शोर के कारण 12 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है।
इनमें ज्यादातर लोग शहरों में रहते हैं। दिल्ली के मामले में CME कहता है कि अगर कोई व्यक्ति शोर और हवा के प्रदूषण दोनों का शिकार होता है, तो इससे असर और भी बढ़ सकता है। इसके चलते धमनियों में सूजन और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
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