पूरे भारत में मेडिकल लूट का बड़ा खुलासा: 11 रुपए की दवा मिल रही 325 में, मरीज परेशान
समझें क्या है पूरा मामला...
- एफडीए ने अस्पतालों में मेडिकल सामान की कीमतों का सर्वे किया।
- सर्वे में ट्रेड प्राइस और MRP के बीच भारी अंतर मिला।
- IV सेट सिर्फ 11 रुपए का, लेकिन MRP 325 रुपए तय थी।
- मरीज इलाज के दौरान इन सामानों का विकल्प नहीं चुन सकता।
- FDA ने कीमतों पर साफ गाइडलाइन बनाने की सिफारिश की है।
क्या मिला सर्वे में
अस्पतालों में इलाज के बिल को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। यह खुलासा मेडिकल सामान की कीमतों से जुड़ा है। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए (Food and Drug Administration) ने एक सर्वे किया। इस सर्वे में मेडिकल कंज्यूमेबल्स की ट्रेड प्राइस और छपी हुई एमआरपी (MRP) के बीच भारी अंतर मिला।
महाराष्ट्र एफडीए के प्रमुख तुकाराम मुंढे ने यह आंकड़े सोशल मीडिया पर साझा किए हैं। उनके मुताबिक कई मेडिकल प्रोडक्ट्स की खरीद कीमत और उन पर छपी एमआरपी में बड़ा फासला है। उन्होंने कुछ उदाहरण भी सामने रखे। यह आंकड़े अस्पतालों में मरीजों से वसूली जाने वाली रकम पर सीधे सवाल खड़े करते हैं।
कितना बड़ा है अंतर
एक उदाहरण के मुताबिक एक आईवी इन्फ्यूजन सेट की खरीद कीमत सिर्फ 11.5 रुपए थी। लेकिन इस पर छपी एमआरपी 325 रुपए थी। यानी असली कीमत से करीब 30 गुना ज्यादा दाम मरीज से लिया जा सकता है। इसी तरह एक सिरिंज की खरीद कीमत 6.75 रुपए थी। इस पर एमआरपी 57.20 रुपए दर्ज थी।
एक कैथेटर की भी हालत ऐसी ही मिली। इसकी ट्रेड प्राइस 29.41 रुपए थी। लेकिन इस पर छपी एमआरपी 310 रुपए थी। यानी कई मेडिकल सामान की खरीद कीमत और एमआरपी में कई गुना का फर्क सामने आया। यह फर्क सिर्फ एक-दो प्रोडक्ट तक सीमित नहीं है।
मरीज के पास विकल्प नहीं
आईएएस तुकाराम मुंढे के मुताबिक सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मरीज इन प्रोडक्ट्स को टाल नहीं सकता। अस्पताल में भर्ती मरीज को आईवी सेट, सिरिंज, कैथेटर जैसी चीजें जरूरी होती हैं। इलाज के बीच में मरीज कीमतों की तुलना भी नहीं कर सकता। न ही वह किसी दूसरे विकल्प की तरफ जा सकता है। ऐसे में मरीज को असली कीमत का अंदाजा भी नहीं लग पाता।
क्यों होता है यह अंतर
इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों होता है, इसे भी समझना जरूरी है। तुकाराम मुंढे के मुताबिक मेडिकल प्रोडक्ट्स पर छपी एमआरपी कंपनी और डिस्ट्रीब्यूटर तय करते हैं। यह कीमत उस असली ट्रेड प्राइस से अलग हो सकती है, जिस पर सामान खरीदा जाता है। इसी वजह से ट्रेड प्राइस और एमआरपी के बीच बड़ा गैप बन जाता है। कीमत चुकाने वाला मरीज इस अंतर को समझ भी नहीं पाता। इससे पारदर्शिता को लेकर बड़ा सवाल खड़ा होता है।
मौजूदा नियम में खामी
महाराष्ट्र एफडीए के कमिश्नर ने मौजूदा रेगुलेटरी सिस्टम पर भी सवाल उठाए हैं। ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 के तहत सिर्फ शेड्यूल्ड दवाओं पर प्राइस सीलिंग की व्यवस्था है। वहीं, ज्यादातर मेडिकल डिवाइस और कंज्यूमेबल्स इस नियम के दायरे में नहीं आते। यही वजह है कि इनकी कीमत तय करने का कोई सीधा नियम मौजूद नहीं है। इससे ट्रेड प्राइस और एमआरपी के बीच कितना अंतर सही माना जाए, यह साफ नहीं है।
FDA ने क्या सुझाव दिया
इस पूरी समस्या को देखते हुए महाराष्ट्र एफडीए ने कुछ सुझाव भी दिए हैं। सबसे पहले सर्वे के नतीजों की गहराई से समीक्षा करने की सिफारिश की गई है। साथ ही ट्रेड प्रोक्योरमेंट प्राइस और एमआरपी के बीच सही अंतर तय करने के लिए साफ गाइडलाइन बनाने को कहा गया है। यह सिफारिश डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी एनपीपीए (National Pharmaceutical Pricing Authority) को भेजी गई है।
सिफारिश का मकसद क्या है
इस सिफारिश का मकसद साफ है। एफडीए चाहता है कि मेडिकल सामान की कीमतों में मौजूद बड़ा गैप कम हो। साथ ही मरीजों को भी सही जानकारी मिल सके। अभी तक मरीज सिर्फ बिल में लिखी एमआरपी देखकर भुगतान करते हैं। उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि असली खरीद कीमत कितनी कम थी।
मरीजों के लिए क्या मतलब
आम मरीज और उसके परिवार के लिए यह खबर सीधे जेब से जुड़ी है। अस्पताल में इलाज के दौरान बिल पहले से ही बड़ा बोझ होता है। यदि मेडिकल सामान की कीमत में इतना बड़ा अंतर है, तो यह बोझ और बढ़ जाता है। सर्वे के आंकड़े साफ दिखाते हैं कि कुछ मामलों में यह अंतर कई गुना तक जा सकता है।
आगे क्या होगा असर
फिलहाल यह मामला अब केंद्र सरकार के विभागों के पास है। यह देखना बाकी है कि डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्यूटिकल्स और एनपीपीए इस सिफारिश पर क्या कदम उठाते हैं। अगर नई गाइडलाइन बनती है, तो इससे आने वाले समय में मरीजों को राहत मिल सकती है। तब तक के लिए यह मामला अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल बनकर सामने खड़ा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शी कीमत व्यवस्था लागू होने से मरीजों का भरोसा भी बढ़ेगा। अस्पताल और मेडिकल कंपनियों को भी अपनी प्राइसिंग साफ रखनी होगी। इससे लंबे समय में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद है। यह मामला सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश के अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था के लिए एक मिसाल बन सकता है।
अभी तक ज्यादातर मरीज बिल में लिखी रकम को ही अंतिम सच मानते हैं। उन्हें यह पता नहीं होता कि कीमत तय करने का पूरा तरीका कितना अस्पष्ट है। ऐसे में जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है जितना नियम बनाना। मरीज संगठन और उपभोक्ता समूह भी इस मुद्दे पर आवाज उठा सकते हैं। आने वाले समय में यह सर्वे स्वास्थ्य नीति में बड़े बदलाव की नींव बन सकता है।
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