सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग के अबॉर्शन पर AIIMS की याचिका खारिज की

Anjali Dwivedi | Apr 30, 2026, 17:27 IST
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सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल की रेप पीड़िता की 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने का आदेश बरकरार रखा है। एम्स की भविष्य में मां न बन पाने' की दलील पर कोर्ट ने पीड़िता की मानसिक पीड़ा को बड़ा माना।

सुप्रीम कोर्ट में 30 अप्रैल, 2026 को एक ऐसा मामला सामने आया, जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया। यह मामला 15 साल की नाबालिग रेप पीड़िता की 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने से जुड़ा था। एक ओर जहां एम्स के डॉक्टर और केंद्र सरकार मेडिकल कारणों से गर्भपात रोकने की अपील कर रहे थे, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के मानसिक दर्द को सबसे अहम मानते हुए फैसला लिया।



क्या हा पूरा मामला?

यह मामला एक 15 साल की नाबालिग रेप पीड़िता की 30 हफ्ते की प्रेग्नेंसी को खत्म करने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने अबॉर्शन की अनुमति दी थी, जिसके खिलाफ AIIMS ने याचिका दायर कर कहा कि इतने हफ्तों में गर्भपात खतरनाक है और लड़की भविष्य में कभी मां नहीं बन पाएगी। हालांकि, कोर्ट ने पीड़िता की मानसिक पीड़ा को सर्वोपरि मानते हुए आदेश बदलने से इनकार कर दिया।



गर्भपात पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

एम्स अस्पताल ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश के खिलाफ एक उपचारात्मक याचिका (Curative Petition) दाखिल की। अदालत में केंद्र सरकार और एम्स की ओर से दलील दी गई कि 30 हफ्ते की गर्भावस्था को इस मोड़ पर खत्म करना जच्चा और बच्चा, दोनों के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है।



डॉक्टरों का कहना था कि अगर अभी गर्भपात किया गया, तो बच्ची को शारीरिक रूप से भारी नुकसान होगा। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि कम से कम चार हफ्ते और रुक जाएं ताकि एक सुरक्षित और सामान्य डिलीवरी (Normal Delivery) कराई जा सके।



वह फिर कभी मां नहीं बन पाएगी - ASG की दलील

सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बेहद भावुक लेकिन तकनीकी दलीलें पेश कीं। उन्होंने कहा, बेहद पीड़ा के साथ हमें यह याचिका लगानी पड़ी है। अगर इस समय बच्चे को गर्भ से बाहर निकाला गया, तो जन्म लेने वाले शिशु में गंभीर विकृतियां (Deformities) हो सकती हैं।



सबसे बड़ी चिंता यह है कि खुद नाबालिग मां को उम्रभर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है और मुमकिन है कि वह भविष्य में कभी मां न बन पाए।



सुप्रीम कोर्ट ने कहा- वह मानसिक पीड़ा कौन झेलेगा?

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच एम्स की दलीलों से सहमत नहीं दिखी। सीजेआई ने तीखा सवाल करते हुए पूछा, यह एक रेप का मामला है। अगर वह बच्ची इस बच्चे को जन्म देती है, तो क्या वह जिंदगीभर उस मानसिक आघात और पीड़ा से उबर पाएगी? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल शारीरिक स्वास्थ्य का मामला नहीं है, बल्कि उस 15 साल की बच्ची की पूरी जिंदगी और उसकी मानसिक शांति का सवाल है।



मुख्य न्यायधीश सूर्यकांत ने क्या कहा

भ्रूण बनाम बच्ची किसका हक बड़ा?

एएसजी ऐश्वर्या भाटी ने स्पष्ट किया कि यह भ्रूण बनाम बच्ची की लड़ाई नहीं है, बल्कि बच्ची के लिए क्या बेहतर है, उसकी चर्चा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शादी के बाद की संभावित शारीरिक जटिलताओं से कहीं ज्यादा बड़ा वह दर्द है, जो वह बच्ची वर्तमान में हर पल महसूस कर रही है। अदालत ने अपने रुख को बदलते हुए प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने के आदेश को बरकरार रखा।



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