देश में सुपर अल नीनो की आशंका, देश में बारिश की कमी 35% तक पहुंची
समझें क्या है पूरा मामला
- देश में मानसून की रफ्तार थम गई है।
- बारिश की कमी अब 35% तक पहुंच गई है।
- मध्य भारत में सबसे ज्यादा 61% कमी दर्ज हुई।
- सरकार ने 200 जिलों को मॉनिटरिंग में रखा है।
- मौसम विभाग ने सुपर अल नीनो (El Nino) की चेतावनी दी है।
मानसून के सामान्य समय से एक हफ्ता ज्यादा बीत गया है। फिर भी बारिश के बादल मुंबई तक नहीं पहुंच पाए हैं। इससे देश भर में बारिश की कमी बढ़कर 35% हो गई है। यह आंकड़ा मंगलवार 16 जून तक का है। मानसून की रफ्तार रुकने से किसानों की चिंता भी बढ़ गई है।
अल नीनो का असरसबसे ज्यादा महाराष्ट्र, कोंकण तट और मध्य भारत में दिख रहा है। यहां मानसून की उत्तर दिशा की चाल कई दिनों से अटकी हुई है। मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर पश्चिम भारत में हालात थोड़े बेहतर हैं। वहां सामान्य से 5% ज्यादा बारिश हुई है। लेकिन बाकी सभी इलाके बारिश की कमी से जूझ रहे हैं।
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 43% कमी दर्ज हुई है। मध्य भारत में यह आंकड़ा सबसे खराब है, यानी 61% की कमी। दक्षिणी प्रायद्वीप में भी 14% कमी देखी गई है। इन आंकड़ों से साफ है कि मानसून का असर देश के बड़े हिस्से में कमजोर पड़ा है।
सरकार ने उठाए जरूरी कदम
बारिश की कमी को देखते हुए केंद्र सरकार हरकत में आ गई है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को खरीफ तैयारियों की समीक्षा बैठक की। इस बैठक में उन्होंने राज्यों को निर्देश दिया कि कम बारिश वाले जिलों की पहचान की जाए। साथ ही फसल के हिसाब से वैकल्पिक योजना बनाने को कहा गया है। चौहान ने कहा कि प्रभावित किसानों को तुरंत विकल्प, सलाह और मदद दी जानी चाहिए।
केंद्र सरकार ने देश के 150 से 200 जिलों को प्राथमिकता वाली मॉनिटरिंग में रखा है। इन जिलों पर हर हफ्ते अल नीनो को लेकर समीक्षा होगी। सरकार किसानों को कॉटन और दलहन जैसी फसलों की तरफ बढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित कर रही है। यह कदम इसलिए उठाया गया है क्योंकि यह फसलें कम पानी में भी अच्छी पैदावार दे सकती हैं।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि देश इस बार पहले से बेहतर स्थिति में है। उनके मुताबिक बीज और खाद का भंडार पर्याप्त है। साथ ही मई महीने में जल भंडार 30.4% क्षमता तक पहुंच गया है। पिछले अल नीनो वर्षों में यह औसतन सिर्फ 25.1% रहता था। इसलिए चौहान का दावा है कि देश पहले से बेहतर तैयार है।
जून में बारिश की कमी असामान्य नहीं
मौसम विभाग के विश्लेषण के मुताबिक जून में बारिश की कमी होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस साल यह कमी खास मानी जा रही है। वजह यह है कि दुनिया भर के मौसम विशेषज्ञों ने इस साल को सुपर अल नीनो वर्ष बताया है। साल 2000 के बाद के अल नीनो वर्षों के आंकड़े देखें तो जून के शुरुआती संकेत हर बार अलग रहे हैं।
जून 2015 में, जो अल नीनो का सबसे मजबूत वर्ष माना जाता है, बारिश सामान्य से 14% ज्यादा हुई थी। इसके उलट जून 2002 और जून 2004 में सूखे जैसी स्थिति बनी थी। उस समय बारिश सामान्य के आसपास रही, यानी क्रमशः 2% और 1% ज्यादा। उस दौरान असली कमी जुलाई और बाद के महीनों में आई थी।
सिर्फ 2009 और 2014 में जून का हाल इस साल जैसा खराब रहा था। साल 2009 में जून में 47% कम बारिश हुई थी। साल 2014 में यह आंकड़ा 44% था। साल 2023 में, जो सबसे हाल का अल नीनो वर्ष था, जून में बारिश 8% कम रही थी। यह आंकड़ा मौसम विभाग की सामान्य सीमा के अंदर ही था।
अल नीनो (El Nino) असल में मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ने की एक प्रक्रिया है। यह भारतीय मानसून को कमजोर करने का काम करता है। यह असर वसंत के मौसम में शुरू होता है। लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मानसून के बीच और बाद के समय में दिखता है।
चेन्नई स्थित मौसम विभाग के क्षेत्रीय निदेशालय में मुख्य मौसम पूर्वानुमानकर्ता डी.एस. पाई ने इस पर अपनी राय रखी। उनके मुताबिक जून की बारिश और मानसून आने का समय ज्यादातर स्थानीय और क्षेत्रीय कारणों पर निर्भर करता है।
मुंबई पहुंचने में देरी क्यों
इस साल मानसून ने केरल में 4 जून को दस्तक दी थी। यह सामान्य तारीख से सिर्फ तीन दिन पहले की बात थी। लेकिन इसके बाद मानसून की रफ्तार धीमी पड़ गई। डी.एस. पाई ने बताया कि मानसून पल्स यानी लहरों में आगे बढ़ता है। पहली लहर मुंबई के बाहरी इलाकों तक पहुंच तो गई थी, लेकिन वह आगे टिक नहीं पाई।
द हिंदू को बताया गया कि मुंबई के उत्तर में एक एंटी साइक्लोनिक सर्कुलेशन बना है। इसके साथ ही मध्य अक्षांश से एक पश्चिमी हवा का दबाव भी आया है। इन दोनों वजहों से मानसून मुंबई में स्थिर नहीं हो पाया। इसका मतलब है कि मुंबई में मानसून के पहुंचने में पांच से छह दिन की और देरी हो सकती है। अगली लहर तभी मजबूत होगी जब बंगाल की खाड़ी में कोई कम दबाव वाला सिस्टम बनेगा।
इसके अलावा मैडेन जूलियन ऑसिलेशन नाम की एक मौसमी प्रक्रिया भी फिलहाल प्रतिकूल स्थिति में है। यह एक चलती हुई वायुमंडलीय पट्टी होती है, जो मानसून को मजबूत या कमजोर कर सकती है। फिलहाल यह मानसून के लिए मदद करने वाली स्थिति में नहीं है।
ग्लोबल एजेंसियों की चेतावनी
अमेरिकी मौसम एजेंसी नेशनल ओशियनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने 11 जून को अल नीनो की चेतावनी जारी की थी। इस चेतावनी में बताया गया कि अल नीनो की स्थिति बन चुकी है। साथ ही सर्दियों तक इसके बहुत मजबूत होने की संभावना 63% बताई गई है।
इससे पहले विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी अनुमान दिया था। उनके मुताबिक जून से अगस्त के बीच अल नीनो बनने की संभावना 80% है। भारतीय मौसम विभाग की जून बुलेटिन में भी यही बात दोहराई गई है।
बुलेटिन में बताया गया कि अल नीनो की स्थिति मौजूद है। समुद्र और वायुमंडल दोनों एक साथ काम कर रहे हैं। साथ ही इस बार पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल जैसी कोई सकारात्मक स्थिति भी नहीं बन रही, जो मानसून को संभाल सके।
मौसम विभाग ने अप्रैल में पहला अनुमान दिया था। उस समय मानसून के सामान्य से 92% रहने का अनुमान लगाया गया था। मई के अंत में यह अनुमान घटाकर 90% कर दिया गया। साथ ही इस साल बारिश कम रहने की संभावना 60% बताई गई। यह मौसम विभाग का साल 2015 के बाद सबसे ज्यादा निराशाजनक अनुमान है।
इन सभी चेतावनियों से साफ है कि आने वाले हफ्ते किसानों और सरकार दोनों के लिए अहम होंगे। अगर मानसून ने रफ्तार नहीं पकड़ी तो खेती और पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार का कहना है कि वह हर स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर देश की कृषि और जल सुरक्षा से सीधे जुड़ी है। भारत की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और मानसून इसकी जीवन रेखा है। बारिश की कमी से फसल उत्पादन, पानी की उपलब्धता और किसानों की आय पर असर पड़ सकता है। यह जानकारी आम लोगों को समय रहते सतर्क होने में मदद करती है।
सरकार की योजनाओं और मौसम विभाग के पूर्वानुमान को जानना नागरिकों का अधिकार भी है। पारदर्शी और सटीक सूचना से जनता बेहतर फैसले ले सकती है, खासकर किसान और जल प्रबंधन से जुड़े लोग।
FAQ
- भारत में अभी मानसून की बारिश में कितनी कमी है?
16 जून मंगलवार तक के आंकड़ों के मुताबिक देश में बारिश की कुल कमी 35% तक पहुंच गई है। यह कमी महाराष्ट्र, कोंकण तट और मध्य भारत में सबसे ज्यादा है। मध्य भारत में बारिश की कमी 61% तक पहुंच गई है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यह आंकड़ा 43% है। सिर्फ उत्तर पश्चिम भारत में बारिश सामान्य से 5% ज्यादा हुई है। - सुपर अल नीनो (Super El Nino) क्या है और यह मानसून को कैसे प्रभावित करता है?
अल नीनो मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के तापमान बढ़ने की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह भारतीय मानसून को कमजोर करने का काम करता है। जब यह घटना बहुत मजबूत रूप लेती है तो इसे सुपर अल नीनो कहा जाता है। अमेरिकी और विश्व मौसम एजेंसियों ने इस साल अल नीनो के बहुत मजबूत होने की चेतावनी दी है। इसी वजह से इस साल की बारिश की कमी को ज्यादा गंभीर माना जा रहा है। - बारिश की कमी से निपटने के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं?
केंद्र सरकार ने देश के 150 से 200 जिलों को प्राथमिकता वाली मॉनिटरिंग में रखा है। इन जिलों में हर हफ्ते अल नीनो की स्थिति की समीक्षा की जा रही है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों को कम बारिश वाले जिलों की पहचान करने का निर्देश दिया है।
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