अंतरिक्ष में 192 करोड़ के टॉयलेट ने छुड़ाए पसीने, चंद्रमा से लौट रहे 4 यात्री अजीब मुश्किल में फंसे
2 अप्रैल, 2026 को नासा का आर्टेमिस 2 मिशन चंद्रमा के लिए रवाना हुआ। यह 53 सालों बाद चांद की ओर जाने वाला पहला मानवयुक्त मिशन था। लेकिन मिशन के शुरू होते ही टॉयलेट की तकनीकी खामी ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।
नासा की अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना कोच को टॉयलेट के पंखे को ठीक करने के लिए औजार उठाने पड़े। उन्होंने खुद को "स्पेस प्लंबर" (अंतरिक्ष का प्लंबर) कहकर इसे ठीक किया और टीम ने राहत की सांस ली।
क्यों फेल हुआ 192 करोड़ का सिस्टम?
इस टॉयलेट को 'कोलिन्स एयरोस्पेस' ने पूरे 192 करोड़ डॉलर खर्च करके बनाया था। इसे 'यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम' (UWMS) कहा जाता है। अंतरिक्ष में ग्रेविटी नहीं होती। धरती पर तो चीजें नीचे गिरती हैं, पर स्पेस में सब हवा में तैरती है। इसलिए वहां टॉयलेट एक हाई-टेक वैक्यूम क्लीनर की तरह काम करता है, जो कचरे को शरीर से दूर खींचता है।
लेकिन इस सफर में एक नहीं, बल्कि तीन बार यह सिस्टम जवाब दे गया:
- पंखे का जाम होना: सबसे पहले टॉयलेट का सक्शन पंखा ही रुक गया। जांच में पता चला कि पंप में पानी की कमी थी।
- पेशाब का जमना: अंतरिक्ष में तापमान शून्य से बहुत नीचे होता है। पेशाब की पाइप बाहर से ठंडी होकर पत्थर जैसी जम गई थी।
- केमिकल ब्लॉक: पाइप में बैक्टीरिया मारने वाले केमिकल ने यूरिन के साथ मिलकर एक सख्त परत बना दी, जिससे फिल्टर ब्लॉक हो गया।
क्यों अंतरिक्ष में टॉयलेट का इस्तेमाल इतना कठिन है?
धरती पर टॉयलेट काम करते हैं क्योंकि यहां गुरुत्वाकर्षण होता है, जो मल और मूत्र को नीचे की ओर खींचता है। लेकिन अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण न होने के कारण कचरा हवा में तैरने लगता है। इस समस्या को हल करने के लिए नासा ने यूनिवर्सल वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम (UWMS) को डिजाइन किया। इसमें वैक्यूम क्लीनर जैसा एक पंखा लगा है, जो कचरे को शरीर से दूर खींचता है।
अंतरिक्ष यात्री के पास टॉयलेट का बैकअप
आर्टेमिस 2 मिशन में बैकअप के तौर पर "कोलैप्सेबल यूरिनल बैग" दिए गए थे। प्रत्येक यात्री के पास ऐसे दो बैग थे। यह बैग प्लास्टिक थैलियों की तरह होते हैं, जो अंतरिक्ष यात्री टॉयलेट के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
आर्टेमिस 2 मिशन: एक बड़ी सीख
आर्टेमिस 2 की डिप्टी मैनेजर डेबी कोर्थ का कहना है कि यह एक टेस्ट फ्लाइट है। ऐसी गलतियों से ही हम सीखेंगे कि मंगल ग्रह जैसे लंबे मिशनों पर टॉयलेट फेल न हों। चांद की दूरी तय करना जितना बड़ा विज्ञान है, उतनी ही बड़ी इंजीनियरिंग एक साधारण मानवीय जरूरत को पूरा करना भी है। अब पूरी दुनिया को 11 अप्रैल का इंतजार है जब ये यात्री वापस लौटेंगे और इस 'स्पेस टॉयलेट' की लैब में जांच होगी।
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