तालिबान के नए विवह कानून: कुंवारी लड़की की खामोशी मतलब शादी की रजामंदी
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने नए विवाह और तलाक कानून को मंजूरी दी है।
- नए कानून के तहत शादी के प्रस्ताव पर 'कुंवारी लड़की की चुप्पी' को उसकी रजामंदी माना जाएगा।
- यह नया नियम किसी लड़के या पहले से शादीशुदा महिला की खामोशी पर लागू नहीं होगा।
- नया कानून कुछ खास शर्तों के साथ नाबालिग बच्चों की शादी (Child Marriage) कराने की भी अनुमति देता है।
- अगस्त 2021 में सत्ता में लौटने के बाद से तालिबान महिलाओं के अधिकारों को लगातार कुचल रहा है।
तालिबान का नया विवाह कानून
अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने देश की महिलाओं और लड़कियों पर एक और कड़ा और विवादित कानून थोप दिया है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदज़ादा ने एक नए पारिवारिक अध्यादेश को मंजूरी दी है। इस 31 अनुच्छेदों वाले दस्तावेज का नाम "पति-पत्नी के बीच अलगाव के सिद्धांत" (Principles of Separation Between Spouses) रखा गया है।
अफ़गानिस्तान के आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित इस कानून ने दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों को चौंका दिया है। इस कानून की सबसे विवादित धारा यह कहती है कि अगर किसी शादी के प्रस्ताव पर कोई "कुंवारी लड़की" शांत रहती है, तो उसकी इस खामोशी को ही शादी के लिए उसकी अंतिम सहमति मान लिया जाएगा।
खामोशी का मतलब हां
इस नए कानून में सहमति को लेकर अजीब और दोहरे मापदंड अपनाए गए हैं। कानून के मुताबिक, केवल कुंवारी लड़कियों की चुप्पी को ही रजामंदी का दर्जा दिया गया है।
दूसरी तरफ, यदि कोई लड़का या पहले से शादीशुदा (तलाकशुदा या विधवा) महिला किसी शादी के प्रस्ताव पर चुप रहती है, तो उनकी चुप्पी को सहमति बिल्कुल नहीं माना जाएगा। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह नियम पूरी तरह से लड़कियों की मर्जी को दबाने और उन पर जबरन शादी थोपने के लिए बनाया गया है।
नाबालिगों की शादी को मिली कानूनी मान्यता
इस नए कानून में बाल विवाह को लेकर भी कई ढील दी गई हैं। इसके अनुसार, पिता और दादा को अपने नाबालिग बच्चों की शादियां तय करने का पूरा अधिकार होगा।
- यदि दूल्हा सामाजिक रूप से उपयुक्त है और दहेज की रकम धार्मिक मानकों के अनुसार है, तो रिश्तेदारों द्वारा तय की गई नाबालिगों की शादी को पूरी तरह वैध माना जाएगा।
- कानून में 'खियार अल-बुलूग' यानी 'प्यूबर्टी के बाद का विकल्प' शामिल किया गया है। इसके तहत बचपन में हुई शादी को बच्चा बालिग होने पर रद्द करने की मांग कर सकता है। लेकिन इसके लिए तालिबान की धार्मिक अदालतों की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा।
सजा पर अब तालिबानी जजों का कब्ज़ा
यह नया कानून तालिबानी जजों को पारिवारिक और निजी मामलों में दखल देने की असीमित शक्तियां प्रदान करता है। अब पति-पत्नी के बीच के विवादों का निपटारा पूरी तरह से तालिबान की व्याख्या वाले शरिया नियमों से होगा।
यदि किसी मामले में व्यभिचार (Adultery), धर्म परिवर्तन, या पति के लंबे समय तक गायब रहने के आरोप लगते हैं, तो तालिबानी जज सीधे हस्तक्षेप करेंगे। जजों को यह अधिकार दिया गया है कि वे ऐसे मामलों में अलगाव (Divorce), जेल की सजा या कोई अन्य कठोर शारीरिक दंड दे सकते हैं।
इसमें 'जिहार' (एक पुरानी प्रथा जिसमें पति अपनी पत्नी की तुलना किसी प्रतिबंधित महिला रिश्तेदार से करता है) जैसे मामलों पर भी कड़े नियम बनाए गए हैं।
अफ़गान महिलाओं पर लगाई जा रही पाबंदियां
यह नया फरमान ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया में महिलाओं के प्रति तालिबान के रवैये की पहले से ही थू-थू हो रही है। अगस्त 2021 में सत्ता संभालने के बाद से ही तालिबान ने महिलाओं को समाज से पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है।
वर्तमान में अफ़गानिस्तान में लड़कियों के लिए छठी कक्षा से आगे की स्कूली शिक्षा पर पूरी तरह बैन है। महिलाओं के यूनिवर्सिटी जाने पर रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही उनके नौकरी करने, अकेले यात्रा करने और पार्कों जैसी सार्वजनिक जगहों पर जाने पर भी गंभीर प्रतिबंध लागू हैं। इस नए कानून ने अफ़गान महिलाओं के बचे-खुचे अधिकारों को भी संकट में डाल दिया है।
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