65 साल बाद बदलेंगे शहरों और गांवों के पैमाने, जानें सरकार का मास्टर प्लान

Aman Vaishnav | Jun 15, 2026, 12:22 IST
65 साल बाद बदलेंगे शहरों और गांवों के पैमाने
भारत में 65 साल बाद ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों को तय करने के पैमाने बदलने की तैयारी चल रही है। मौजूदा भारतीय मानकों के अनुसार देश में 36% शहरी आबादी है। जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानकों के मुताबिक यह आंकड़ा करीब 80% तक हो सकता है।

65 साल बाद बदलेंगे नियम

1961 में पहली बार तय किया गया था कि किस क्षेत्र को ग्रामीण कहा जाएगा और किसे शहरी। तब से लेकर आज तक पिछले 65 सालों से वही पुराने नियम चले आ रहे हैं। वहीं अब सरकार इन पैमानों को बदलने की नीतिगत सुधार की कवायद शुरू कर चुकी है।



इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साल 2047 (विकसित भारत 2047) तक विकसित भारत बनाने का सपना है। सरकार का सोचना है कि पिछले कुछ सालों में देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन नेटवर्क पूरी तरह बदल गया है।



साथ ही डिजिटल कनेक्टिविटी और लोगों के रहने का तरीका भी बदल गया है। ऐसे में पुराने नियमों से देश का विकास नहीं किया जा सकता।



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शहरों को तय करने के मौजूदा पैमाने?

फिलहाल देश में किसी भी इलाके को शहरी क्षेत्र घोषित करने के लिए दो मुख्य तरीके अपनाए जाते हैं।



1. वैधानिक निकाय (Statutory Towns):

ये वे इलाके होते हैं जिन्हें राज्य सरकार अपनी तरफ से नगरपालिका, नगर निगम या नगर परिषद जैसा शहरी निकाय घोषित कर देती है।



2. सेंसस टाउन (Census Towns)

जनगणना के हिसाब से उस इलाके को शहर माना जाता है जहां...



  • कुल जनसंख्या पांच हजार से ज्यादा हो।
  • जनसंख्या का घनत्व कम से कम 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर हो।
  • वहां के कम से कम 75% पुरुष कामकाजी लोग खेती को छोड़कर दूसरे गैर-कृषि कार्यों से जुड़े हों।

क्या हो सकते हैं शहरीकरण के नए पैमाने

अब सरकार सिर्फ आबादी को आधार नहीं बनाएगी। बल्कि जमीन पर मौजूद सुविधाओं को देखकर फैसला करेगी। नए पैमानों में इन चीजों को शामिल किया जा सकता है...



  • जनसंख्या का घनत्व और उस इलाके में पक्के निर्माण का प्रतिशत।
  • गैर-कृषि रोजगार का अनुपात और लोग रोज काम के लिए कितनी दूर आते-जाते हैं।
  • सड़क, यातायात और परिवहन की अच्छी सुविधाएं।
  • इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी।
  • पानी की सप्लाई, सीवरेज नेटवर्क और कचरा प्रबंधन की बेहतर व्यवस्था।
  • आर्थिक गतिविधियों में बदलाव और अलग-अलग तरह के व्यापार।

भारतीय बनाम संयुक्त राष्ट्र के मानक

हाल ही में ब्रिक्स (BRICS) देशों के शहरी योजनाकारों का एक बड़ा फोरम हुआ था। यहां अलग-अलग देशों के नियमों पर चर्चा हुई।



केंद्रीय शहरी विकास मंत्री मनोहर लाल ने बताया कि भारतीय मानकों के हिसाब से भारत की शहरी आबादी लगभग 36% है। वहीं इसके उलट संयुक्त राष्ट्र (UN) की डिगुर्बा पद्धति के अनुसार भारत की 80% आबादी किसी न किसी रूप में शहरी क्षेत्र में रह रही है।



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क्या है यह डिगुर्बा?

डिगुर्बा संयुक्त राष्ट्र, यूरोस्टेट और विश्व बैंक की एक आधुनिक मानकीकृत पद्धति है। इसमें किसी शहर को कागजी या प्रशासनिक इकाई मानकर नहीं देखा जाता। बल्कि इसमें उपग्रह से ली गई तस्वीरों से दिखने वाले पक्के मकानों, निर्मित क्षेत्र और वहां के जनसंख्या घनत्व को आधार माना जाता है।



आंकड़ों पर एक नजर

  • ग्रामीण आबादी (2011 की जनगणना): 68.9% (कुल गांव: छह लाख 40 हजार 930)
  • शहरी आबादी (2011 की जनगणना): 31.1% (कुल शहर: सात हजार 935)
  • दुनिया की स्थिति (2025): विश्व की 19% आबादी गांवों में, 45% शहरों में और 36% आबादी कस्बों में रह रही है।

इस बदलाव के लाभ और जोखिम

नए पैमानों के लागू होने से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के विकास पर इसका सीधा असर पड़ेगा।



होने वाले फायदे

  • नियोजित विकास (Planned Development): शहरों के आसपास वाले इलाकों के लिए बेहतर नीतियां बन सकेंगी।
  • ज्यादा संसाधन: वित्त आयोग से मिलने वाला अनुदान, सरकारी सहायता और शहरी विकास बजट का पैसा ज्यादा मिलेगा।
  • बेहतर सुविधाएं: मास्टर प्लानिंग और भूमि उपयोग नीति लागू होने से घर, पानी, सीवेज और कचरा प्रबंधन का काम ज्यादा सटीक तरीके से होगा।

संभावित जोखिम

बढ़ती समस्याएं: जैसे ही कोई क्षेत्र शहर बनता है, वहां प्रदूषण, कचरा कुप्रबंधन और अपराध जैसी समस्याएं भी बढ़ने का खतरा रहता है।



सरकार ने साफ किया है कि इन नियमों का मकसद किसी भी क्षेत्र से योजनाओं का लाभ छीनना नहीं है। बल्कि इसका उद्देश्य ग्रामीण बनाम शहरी के भेदभाव को खत्म करना है।



साथ ही उस इलाके में शहरीकरण के स्तर के आधार पर संसाधन और बजट बांटना है। हालांकि इस पूरी योजना को लागू करने के लिए अभी कोई तय समय सीमा तय नहीं की गई है।



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