मोबाइल, टीवी या फ्रिज खरीदने से पहले समझ लें नो-कॉस्ट ईएमआई का गणित, छोटी सी लापरवाही बढ़ा सकती है खर्च

Manya Jain | Sootr Creatives | Nov 01, 2026, 15:22 IST
मोबाइल, टीवी या फ्रिज खरीदने से पहले जान लें No-Cost EMI का सच, वरना जेब हो जाएगी खाली
No-cost EMI may look like an attractive deal, but hidden charges, reduced discounts and processing fees can increase the overall cost of your purchase.
आजकल नया मोबाइल, टीवी या फ्रिज खरीदना हो, तो दुकानदार सबसे पहले नो-कॉस्ट ईएमआई बताते हैं। इसमें आपको पूरी कीमत एक साथ नहीं देनी पड़ती। आप हर महीने थोड़ी रकम देकर सामान घर ला सकते हैं। सुनने में यह सौदा काफी अच्छा लगता है। खासकर तब, जब जेब में एक साथ ज्यादा पैसे न हो।

लेकिन इस सुविधा के पीछे कुछ खर्च भी छिपे हो सकते हैं। नो-कॉस्ट ईएमआई का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि आपको कोई अतिरिक्त पैसा नहीं देना होगा। कई बार कंपनी छूट कम कर देती है। वहीं, बैंक प्रोसेसिंग फीस और दूसरे चार्ज भी लगा सकते हैं। ऐसे में सामान की असली कीमत से ज्यादा पैसा देना पड़ सकता है।



इसलिए अगली बार मोबाइल या कोई महंगा सामान खरीदें, तो सिर्फ महीने की किस्त न देखें। दुकानदार से पूरी जानकारी लें। यह भी पूछें कि सभी चार्ज मिलाकर कुल कितने पैसे देने होंगे। याद रखें, छोटी किस्त देखकर सामान खरीदना समझदारी नहीं है। असली समझदारी यह जानना है कि सामान आपको कुल कितने का पड़ रहा है।



किस्त छोटी, लेकिन सामान की कीमत ज्यादा हो सकती है

मान लीजिए आप 50 हजार रुपए का मोबाइल या टीवी खरीदने जा रहे हैं। दुकानदार आपको नो-कॉस्ट ईएमआई का विकल्प देता है। वह कहता है कि हर महीने थोड़ी-थोड़ी रकम चुकानी होगी। इससे आपको एक साथ 50 हजार रुपए खर्च नहीं करने पड़ेंगे।



लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। अगर आप पूरा पेमेंट एक साथ करते हैं, तो दुकानदार 4 हजार रुपए की छूट दे सकता है। यानी 50 हजार का सामान आपको 46 हजार रुपए में मिल सकता है।



वहीं, नो-कॉस्ट ईएमआई चुनने पर यह छूट कम हो सकती है। मान लीजिए किस्तों में सामान खरीदने पर आपको सिर्फ एक हजार 500 रुपए की छूट मिलती है। ऐसे में एकमुश्त पेमेंट करने वाले को ज्यादा फायदा होगा। वहीं, ईएमआई लेने वाले को सामान के लिए ज्यादा पैसे चुकाने पड़ेंगे।



ऐसा कई ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट और दुकानों पर हो सकता है। ईएमआई चुनने पर कैशबैक और बैंक ऑफर भी बदल सकते हैं। क्रेडिट कार्ड से मिलने वाली छूट पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए खरीदारी से पहले दोनों विकल्पों की कीमत जरूर जांच लें।



बैंक की फीस और जीएसटी भी समझें

नो-कॉस्ट ईएमआई पर सामान खरीदने से पहले बैंक के चार्ज भी समझ लें। बैंक आपसे प्रोसेसिंग फीस ले सकता है। यह रकम कम लग सकती है। लेकिन महंगे सामान पर इसका असर ज्यादा पड़ता है।



इसके अलावा, कुछ मामलों में ब्याज पर जीएसटी भी लग सकता है। नो-कॉस्ट ईएमआई में ब्याज का खर्च विक्रेता उठाता है। फिर भी दूसरे चार्ज आपकी जेब पर भारी पड़ सकते हैं।



अक्सर लोग खरीदारी के समय सिर्फ ईएमआई देखते हैं। उन्हें लगता है कि हर महीने थोड़ी रकम देकर सामान मिल जाएगा। लेकिन बैंक का पहला स्टेटमेंट आने पर असली खर्च सामने आता है। इसमें प्रोसेसिंग फीस और दूसरे चार्ज शामिल हो सकते हैं।



इसलिए ईएमआई चुनने से पहले बैंक की शर्तें जरूर पढ़ें। कुल कितनी रकम चुकानी होगी, यह भी समझें। साथ ही, बैंक से दूसरे चार्ज की जानकारी भी लें।



एक साथ कई ईएमआई लेना पड़ सकता है भारी

आजकल लोग जरूरत का सामान खरीदने के लिए एक से ज्यादा ईएमआई ले लेते हैं। किसी ने मोबाइल किस्तों पर लिया, किसी ने फ्रिज और टीवी भी ईएमआई पर खरीद लिया। हर महीने अलग-अलग किस्त कटती रहती है। शुरुआत में ये रकम छोटी लगती है, लेकिन धीरे-धीरे कुल खर्च बढ़ जाता है।



मान लीजिए किसी व्यक्ति की आमदनी का एक हिस्सा पहले से ही घर के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जरूरतों में जाता है। इसके बाद मोबाइल, टीवी और दूसरे सामान की किस्तें भी जुड़ जाएं तो महीने का बजट बिगड़ सकता है।



एक साथ कई किस्तें चलने से आपका Credit Exposure भी बढ़ता है। इसका असर भविष्य में बड़े कर्ज की जरूरत पड़ने पर दिख सकता है। उदाहरण के लिए, आप आगे चलकर घर खरीदने के लिए होम लोन या कार खरीदने के लिए कार लोन लेना चाहते हैं। ऐसे में बैंक आपकी मौजूदा ईएमआई और भुगतान की क्षमता को भी देखता है।



इसलिए केवल इसलिए नया सामान ईएमआई पर न खरीदें कि किस्त छोटी है। पहले यह देखें कि आपकी आमदनी में से हर महीने कितनी रकम पहले ही किस्तों में जा रही है।



खरीदारी से पहले इन बातों का रखें ध्यान

नो-कॉस्ट ईएमआई लेने से पहले कुछ बातों की जांच करना जरूरी है। सबसे पहले सामान की एकमुश्त कीमत पता करें। इसके बाद ईएमआई वाले विकल्प की कुल रकम जोड़कर देखें। दोनों के बीच कितना अंतर है, यह समझना जरूरी है।



दूसरी बात, दुकानदार या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से पूछें कि ईएमआई पर खरीदने पर कैशबैक या बैंक डिस्काउंट मिलेगा या नहीं। कई बार एकमुश्त भुगतान पर मिलने वाली छूट ईएमआई चुनने पर नहीं मिलती।



तीसरी बात, बैंक की प्रोसेसिंग फीस, जीएसटी और दूसरे शुल्कों की जानकारी पहले ही ले लें। केवल विज्ञापन में दिखाई गई ईएमआई की रकम देखकर फैसला न करें।



आखिर कब चुनें नो-कॉस्ट ईएमआई?

नो-कॉस्ट ईएमआई हमेशा नुकसान का सौदा नहीं होती। अगर आपके पास एक साथ पूरी रकम खर्च करने का विकल्प नहीं है और ईएमआई पर खरीदने के बाद भी कोई बड़ा अतिरिक्त खर्च नहीं जुड़ रहा है, तो यह सुविधा काम आ सकती है।



लेकिन अगर एकमुश्त भुगतान करने पर अच्छी छूट मिल रही है और ईएमआई पर वही सामान महंगा पड़ रहा है, तो नकद या एक बार में भुगतान करना बेहतर हो सकता है।



खरीदारी का सही तरीका यही है कि सामान की कीमत, मिलने वाली छूट, बैंक के शुल्क और सभी किस्तों को जोड़कर अंतिम रकम निकालें। इसके बाद ही तय करें कि आपके लिए कौन-सा विकल्प फायदेमंद है।



याद रखें, हर महीने छोटी किस्त देना आसान जरूर लगता है, लेकिन असली बचत इस बात में है कि सामान खरीदने के बाद आपकी जेब से कुल कितने पैसे खर्च हुए।



FAQ



  1. नो-कॉस्ट ईएमआई (No-Cost EMI) क्या होती है?
    नो-कॉस्ट ईएमआई एक ऐसी योजना है जिसमें ग्राहक सामान की कीमत किस्तों में चुका सकता है। इसमें सामान्यतः ब्याज विक्रेता या कंपनी द्वारा वहन किया जाता है, परंतु अन्य शुल्क लग सकते हैं।
  2. क्या नो-कॉस्ट ईएमआई में बिल्कुल अतिरिक्त पैसा नहीं देना पड़ता?
    जरूरी नहीं है। बैंक प्रोसेसिंग फीस, लागू जीएसटी और अन्य शुल्क लग सकते हैं, और ईएमआई चुनने पर मिलने वाली छूट भी कम हो सकती है।
  3. नो-कॉस्ट ईएमआई कब लेना फायदेमंद हो सकता है?
    यह विकल्प तब फायदेमंद हो सकता है जब आपके पास एक साथ पूरी रकम खर्च करने का विकल्प नहीं हो और ईएमआई पर खरीदने से कुल खर्च में ज्यादा अंतर न आए। सभी शुल्कों की तुलना करके फैसले लेना चाहिए।
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