क्या है नॉर्वे की तरक्की का राज? दिल्ली से भी कम आबादी, खजाना भारत की आधी GDP के बराबर

Sanjay Dhiman | May 22, 2026, 14:02 IST
Photograph: (the sootr)
नॉर्वे की आबादी दिल्ली से भी कम है, लेकिन उसका सरकारी फंड $2.1 ट्रिलियन का है। यह देश तेल की कमाई घरेलू बाजार में खर्च न करके दुनिया की 7200 कंपनियों में निवेश करता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहे।

क्या आपने कभी सोचा है कि किसी देश के पास इतना पैसा हो कि वह अपने हर नागरिक को साढ़े तीन करोड़ रुपए दे सके, फिर भी वह एक भी रुपया अपने देश में खर्च न करे? सुनने में यह बिल्कुल फिल्मी कहानी जैसा लगता है, लेकिन यह हकीकत है। उत्तरी यूरोप के एक छोटे से देश नॉर्वे ने कुछ ऐसा ही करिश्मा कर दिखाया है।



नॉर्वे की कुल आबादी सिर्फ 56 लाख है, जो हमारे दिल्ली की आबादी के चौथे हिस्से के बराबर भी नहीं है। लेकिन इस छोटे से देश के पास जो सरकारी खजाना है, उसे देखकर बड़े-बड़े महाशक्तियों के पसीने छूट जाते हैं। नॉर्वे का सरकारी फंड आज की तारीख में लगभग 2.1 ट्रिलियन डॉलर का हो चुका है। अगर इस रकम की तुलना भारत से करें, तो यह हमारी पूरी देश की जीडीपी का लगभग आधा बैठता है।



इस भारी-भरकम पैसे को नॉर्वे अपने देश की सड़कों, पुलों या मॉल बनाने में खर्च नहीं करता है। नॉर्वे ने इस पैसे से दुनिया के 68 देशों की 7200 से ज्यादा कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी खरीद रखी है। यानी दुनिया की हर बड़ी कंपनी में नॉर्वे का थोड़ा बहुत पैसा जरूर लगा हुआ है।



भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नॉर्वे का दौरा किया था। उन्होंने नॉर्वे को भारत के क्लीन एनर्जी सेक्टर में भारी निवेश करने का खुला न्योता दिया था। आखिर इस छोटे से देश ने इतना बड़ा फंड कैसे खड़ा किया और यह पूरा सिस्टम कैसे काम करता है, आइए इसे विस्तार से समझते हैं।



जब मछुआरों के देश की किस्मत रातों-रात बदल गई

आज से करीब 60 साल पहले तक नॉर्वे की गिनती यूरोप के अमीर देशों में बिल्कुल नहीं होती थी। वहां की भौगोलिक स्थिति बहुत ही कठिन थी। चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़ और गहरे समुद्री रास्ते थे। साल 1960 तक वहां के लोग सिर्फ मछली पकड़ने, लकड़ी काटने या जहाजों पर मजदूरी करने का काम करते थे।



उस दौर में नॉर्वे के पास न तो कोई बड़ी टेक कंपनी थी और न ही कोई बड़ा भारी उद्योग था। देश के नौजवान नौकरियों की तलाश में दूसरे अमीर देशों का रुख कर रहे थे। लेकिन साल 1959 में नॉर्वे के पड़ोसी देश नीदरलैंड्स में नेचुरल गैस का एक बहुत बड़ा भंडार मिल गया। इसके बाद पूरे यूरोप के देशों में समुद्र के भीतर कच्चा तेल और गैस खोजने की एक नई होड़ मच गई।



साल 1962 में अमेरिकी कंपनी फिलिप्स पेट्रोलियम ने नॉर्वे से उत्तरी समुद्र में तेल खोजने की अनुमति मांगी और बदले में मासिक रॉयल्टी देने का प्रस्ताव रखा। 1965 में नॉर्वे ने 22 लाइसेंस जारी किए। शुरुआती 36 कुओं में तेल नहीं मिला। सभी कंपनियां निराश हो गईं, लेकिन फिलिप्स का आखिरी कुआं बाकी था। 23 दिसंबर 1969 को वहां अचानक काला तेल फूट पड़ा। इस क्षेत्र को ‘एकोफिस्क फील्ड’ कहा गया, जो बाद में दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार बन गया।



फ्रीबीज योजनाओं से अर्थव्यवस्था को लगा झटका

साल 1971 से नॉर्वे ने बड़े पैमाने पर तेल का व्यापार शुरू कर दिया और देश में विदेशी कंपनियों का तांता लग गया। सरकार ने तेल कंपनियों के मुनाफे पर सीधे 78% का भारी-भरकम टैक्स लगा दिया, जिससे देश का खजाना तेजी से भरने लगा। खजाना भरते ही नॉर्वे की सरकार ने देश के भीतर घरेलू खर्चों को बेतहाशा बढ़ा दिया।



पूरे देश में सब्सिडी, मुफ्त की योजनाएं और फ्रीबीज की मानों बाढ़ सी आ गई। लेकिन इसका नतीजा बहुत ही भयानक निकला और देश में भयंकर महंगाई बढ़ गई। नॉर्वे की बाकी स्थानीय इंडस्ट्रीज पूरी तरह बर्बाद हो गईं।



दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब साल 1986 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें अचानक धड़ाम से गिर गईं। जो तेल 28 डॉलर प्रति बैरल बिक रहा था, वह सीधे 10 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। तेल की कमाई एक तिहाई रह जाने से सरकार भारी घाटे में चली गई और देश में बेरोजगारी चरम पर पहुंच गई। लोग बैंकों का कर्ज नहीं चुका पा रहे थे, जिससे देश के बड़े-बड़े बैंक दिवालिया होने की कगार पर आ गए।



नॉर्वे का ऐतिहासिक फंड कानून

मई 1990 में नॉर्वे की संसद ने गवर्नमेंट पेट्रोलियम फंड एक्ट पास किया। इसके तहत तेल से होने वाली अतिरिक्त कमाई सीधे खर्च नहीं होगी, बल्कि इसे एक अलग फंड में सुरक्षित रखा जाएगा।



‘काले सोने’ को ‘अमर धन’ में बदलना

विशेषज्ञों के अनुसार यह तेल सिर्फ वर्तमान पीढ़ी की संपत्ति नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। 1996 में पहली बार 400 मिलियन डॉलर जमा हुए, जो अब 2.1 ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ गए हैं। इस फंड का प्रबंधन नॉर्जेस बैंक इन्वेस्टमेंट मैनेजमेंट करता है।



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नॉर्वे के फंड मैनेजमेंट के तीन कड़े और सुनहरे नियम

1. पैसे को देश की सीमा से हमेशा बाहर रखना

तेल की कमाई का एक भी पैसा नॉर्वे के घरेलू प्रोजेक्ट्स जैसे सड़क, अस्पताल या मॉल बनाने में नहीं लगाया जा सकता। इस पूरे पैसे को अमेरिकी डॉलर, यूरो और पाउंड जैसी विदेशी करेंसी में बदलकर दुनिया के अन्य देशों के बाजारों में निवेश किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि देश के भीतर पैसों की बाढ़ न आए और महंगाई पर हमेशा लगाम कसी रहे।



2. फंड की कुल वैल्यू का सिर्फ 3% हिस्सा ही निकालना

साल 2001 में नॉर्वे की संसद ने एक खास राजकोषीय नियम बनाया, जिसे 'बर्ड-इन-द-हैंड रूल' कहा जाता है। इसके तहत सरकार अपने सालाना बजट की कमी को पूरा करने के लिए इस फंड के मूल पैसे (प्रिंसिपल अमाउंट) को कभी नहीं छू सकती। सरकार को हर साल फंड की कुल वैल्यू का सिर्फ 3% मुनाफा ही निकालने की इजाजत होती है, जिससे मूल खजाना हमेशा सुरक्षित रहता है।



3. नैतिक नियमों का कड़ाई से पालन करना

नॉर्वे का यह फंड सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए किसी भी गलत जगह पर पैसा नहीं फंसाता है। इसके निवेश करने के नियम बेहद कड़े और नैतिक हैं। यह फंड दुनिया की ऐसी किसी भी कंपनी में निवेश नहीं करता जो:



  • परमाणु हथियार, क्लस्टर बम या घातक बारूदी सुरंगें बनाती हैं।
  • तंबाकू, सिगरेट या सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले उत्पाद तैयार करती हैं।
  • कंपनियों में बाल श्रम करवाती हैं या मानवाधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
  • पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं या कोयले पर पूरी तरह निर्भर हैं।

भारत में नॉर्वे का निवेश और अडाणी समूह पर कड़ा एक्शन

नॉर्वे के इन्हीं कड़े नैतिक नियमों के कारण समय-समय पर इसके निवेश पोर्टफोलियो में बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं। जून 2025 में भी मानवाधिकारों के मुद्दों को लेकर नॉर्जेस बैंक के बाहर बड़े विरोध प्रदर्शन हुए थे। इसी तरह के कड़े नियमों का हवाला देते हुए नॉर्वे के इस सरकारी फंड ने भारत के अडाणी समूह की कुछ कंपनियों में अपना पैसा लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।



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