OBC क्रीमी लेयर विवाद: केंद्र की 2 साल की मांग पर SC का फैसला सुरक्षित

Neel Tiwari | Sept 25, 2026, 24:09 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEW DELHI. सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में केंद्र की याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है। केंद्र ने 11 मार्च के फैसले को दो साल बाद लागू करने की मांग की है। सरकार ने पुराने मामलों पर असर को लेकर चिंता जताई।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी क्रीमी लेयर मामले में फैसला सुरक्षित रखा।
  • केंद्र ने 11 मार्च के फैसले को दो साल टालने की मांग की।
  • केंद्र ने पुराने नियुक्ति मामलों पर बड़े असर की आशंका जताई।
  • कोर्ट ने आय को अकेला आधार मानने से इनकार किया था।
  • अब अदालत केंद्र की मांग पर अपना फैसला सुनाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र की याचिका सुनी। यह याचिका ओबीसी क्रीमी लेयर से जुड़े 11 मार्च के फैसले पर है। केंद्र ने फैसले को भविष्य में लागू करने की मांग की है। इसके लिए दो साल का समय मांगा गया है। पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा।



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केंद्र ने फैसले को दो साल टालने की मांग क्यों की

केंद्र सरकार ने पुराने मामलों पर फैसले के असर की चिंता जताई है। उसका कहना है कि इससे कई नियुक्तियां फिर से प्रभावित होंगी। वरिष्ठता और कैडर आवंटन भी दोबारा देखना पड़ सकता है। केंद्र के अनुसार इससे प्रशासनिक स्तर पर बड़ी परेशानी पैदा होगी। इसलिए सरकार ने फैसले को भविष्य से लागू करने की मांग की है।



केंद्र ने निजी और पीएसयू कर्मचारियों का मुद्दा उठाया

केंद्र ने निजी और पीएसयू कर्मचारियों के पद तय करने का मुद्दा उठाया। सरकार ऐसी तुलना के लिए दो साल का समय चाहती है। इसका मकसद सरकारी पदों जैसी समान स्थिति तय करना है। इससे ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने में मदद मिलेगी। केंद्र के अनुसार यह प्रक्रिया पहले पूरी होनी चाहिए।



कोर्ट ने छह महीने की समय सीमा की याद दिलाई

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को छह महीने की समय सीमा याद दिलाई। 11 मार्च के फैसले में इसे लागू करने का समय दिया गया था। इसके बावजूद केंद्र ने अगस्त के आखिर में नई मांग रखी। कोर्ट ने इस देरी को लेकर भी सवाल किया। केंद्र ने कहा कि वह मूल फैसले को चुनौती नहीं दे रहा।



सिविल सेवा भर्ती पर भी केंद्र ने चिंता जताई

केंद्र ने सिविल सेवा भर्ती नियमों का भी जिक्र किया। पिछले साल और इस साल के भर्ती नियम जारी हो चुके हैं। कुछ उम्मीदवार मार्च के फैसले का लाभ मांग रहे हैं। वे बेहतर सेवा आवंटन की मांग कर रहे हैं। केंद्र ने कहा कि इससे मौजूदा भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।



एक करोड़ से ज्यादा आय वाले उम्मीदवारों का भी जिक्र

केंद्र ने सुनवाई में एक खास स्थिति का जिक्र किया। सरकार के अनुसार कुछ माता-पिता की आय एक करोड़ से ज्यादा है। ऐसे उम्मीदवार फैसले के तहत ओबीसी लाभ पा सकते हैं। केंद्र ने इसी तरह की स्थितियों को लेकर नियम साफ करने की मांग की है। सरकार ने इसे लागू करने से पहले समय जरूरी बताया है।



11 मार्च के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था

सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को अहम फैसला सुनाया था। कोर्ट ने कहा था कि वेतन आय को अकेला आधार नहीं माना जा सकता। ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता का पद भी देखा जाना चाहिए। यह सवाल खासकर निजी और पीएसयू कर्मचारियों से जुड़ा था। सरकारी कर्मचारियों के लिए पद की स्थिति भी देखी जाती है।



मामला दो सिविल सेवा उम्मीदवारों से कैसे जुड़ा

मामला दो सिविल सेवा उम्मीदवारों से जुड़ी अपीलों से सामने आया था। एक उम्मीदवार के पिता निजी कंपनी में काम करते थे। उनकी आय अधिक होने के कारण ओबीसी लाभ नहीं मिला था। बाद में इस आधार पर उम्मीदवार ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाई कोर्ट ने उसे नॉन क्रीमी लेयर लाभ देने की अनुमति दी थी।



एक दूसरे मामले में उम्मीदवार के पिता पीएसयू में काम करते थे। अधिक आय के कारण उम्मीदवार को ओबीसी लाभ से बाहर किया गया था। दोनों मामलों में पद और आय के नियमों पर सवाल उठे। उम्मीदवारों ने सरकारी कर्मचारियों से समान नियम लागू करने की मांग की थी।



सुप्रीम कोर्ट ने पीएसयू कर्मचारियों पर क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने निजी और पीएसयू कर्मचारियों के बच्चों का मुद्दा देखा। कोर्ट ने केवल वेतन के आधार पर उन्हें बाहर करने पर सवाल उठाया। कोर्ट ने माता-पिता के पद को भी ध्यान में रखने की बात कही। फैसले में सरकारी कर्मचारियों से तुलना का मुद्दा भी सामने आया। इसी आधार पर मार्च में केंद्र की आपत्ति खारिज हुई थी।



क्रीमी लेयर व्यवस्था 1993 से लागू है

ओबीसी क्रीमी लेयर की व्यवस्था 1993 से चली आ रही है। यह 1992 के इंदिरा साहनी फैसले के बाद बनी थी। 1993 में केंद्र ने क्रीमी लेयर से जुड़ा आदेश जारी किया। इसमें ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने की व्यवस्था बनाई गई थी।



2004 के आदेश में आय को लेकर स्थिति साफ हुई

केंद्र ने 2004 में इस व्यवस्था पर स्पष्टीकरण जारी किया था। इसमें वेतन और दूसरी आय को अलग-अलग देखने की बात थी। कुछ स्थितियों में लगातार तीन साल की आय देखी जाती थी। मार्च के फैसले में इसी व्यवस्था की व्याख्या की गई। कोर्ट ने वेतन आय को अकेला आधार मानने से इनकार किया।



मार्च के फैसले का लाभ पाने वालों ने विरोध किया

मार्च के फैसले से लाभ पाने वाले पक्षों ने केंद्र की मांग का विरोध किया। उनकी ओर से वरिष्ठ वकीलों ने अदालत में अपनी दलील रखी। उन्होंने केंद्र की याचिका को समीक्षा याचिका जैसा बताया। उनका कहना था कि इसे स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने मार्च के फैसले को लागू रखने की मांग की।



अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नजर

इस महीने की शुरुआत में कोर्ट ने केंद्र की याचिका पर नोटिस दिया था। उस समय अदालत ने फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया था। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला लेने की बात कही थी। अब दोनों पक्षों की दलीलें पूरी हो चुकी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। फैसले के बाद पुरानी और नई भर्तियों पर स्थिति साफ होगी।



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