माता-पिता की दूरी से बच्चों में बढ़ा मौत का खतरा, शिशु मृत्यु दर सामान्य से ज्यादा
समझें क्या है पूरा मामला...
- देश में तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
- मुंबई के आईआईपीएस के शोधकर्ताओं ने दो लाख 32 हजार बच्चों का डेटा खंगाला है।
- माता-पिता का तलाक या मृत्यु होने पर बच्चों की मौत का खतरा दोगुना हो जाता है।
- शहरों की तुलना में गांवों के बच्चों में यह जोखिम और भी ज्यादा होता है।
क्या कहती है रिसर्च?
देश में एक तरफ तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ इसका असर बच्चों की जान पर पड़ रहा है।
मुंबई के इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज के शोधकर्ताओं ने एक गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने दो लाख बच्चों 32 हजार बच्चों का डेटा जांचा है।
रिसर्च में सामने आया कि माता-पिता का तलाक होने या उनकी मृत्यु होने पर छोटे बच्चों की मौत का खतरा दोगुना तक बढ़ जाता है। यह खतरा खासतौर पर पांच साल से कम उम्र के बच्चों में देखा गया है।
शिशु मृत्यु दर पर क्या पड़ता है असर
राष्ट्रीय स्तर पर शिशु मृत्यु दर (IMR – Infant Mortality Rate) प्रति एक हजार जन्म पर करीब 34 रहती है। लेकिन तलाक होने के बाद यह दर बढ़ जाती है।
रिपोर्ट के मुताबिक तलाक के बाद मुस्लिम परिवारों में आईएमआर बढ़कर 41 प्रति हजार तक पहुंच जाती है। हिंदू परिवारों में यह और अधिक होती है। इससे साफ होता है कि परिवार का टूटना बच्चे की सेहत और जीवन पर सीधा असर डालता है।
मुस्लिम बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि तलाक के बाद मुस्लिम परिवारों के बच्चों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। यहां आईएमआर प्रति हजार 41 तक पहुंच जाती है।
हिंदू परिवारों में यह दर मुस्लिम परिवारों की तुलना में और भी ज्यादा है। रिसर्चर इस अंतर की ठोस वजह बताने में अभी सक्षम नहीं हैं।
एसटी वर्ग में सबसे कम खतरा
सामाजिक वर्गों का विश्लेषण करने पर एक और बात सामने आई है। तलाक के बाद अनुसूचित जनजाति वर्ग के परिवारों में बच्चों की मृत्यु दर पर ज्यादा असर नहीं पड़ता है।
एसटी के बाद ओबीसी परिवारों में यह दर 48 प्रति हजार तक पहुंचती है। सामान्य वर्ग में 56 और एससी परिवारों में 62 तक पहुंच जाती है।
जैन समुदाय में यह दर सबसे कम 21 रहती है। सिखों में 64 दर्ज की गई है।
गांवों में जोखिम ज्यादा
रिसर्च में यह भी स्पष्ट हुआ कि शहरों की तुलना में गांवों के बच्चों को ज्यादा खतरा होता है। ग्रामीण इलाकों में परिवार टूटने पर सहारा देने वाला सामाजिक ढांचा कमजोर होता है।
इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी शहरों की तुलना में कम होती है। इन दोनों वजहों से गांव के बच्चों का जोखिम बढ़ जाता है।
देश में तलाक के मामले बढ़ रहे हैं
फैमिली हेल्थ सर्वे और जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश में करीब 1 प्रतिशत लोग तलाक लेते हैं। वहीं विवाह पंजीकरण प्रणाली 2024 के अनुसार यह दर 3.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में तलाक की दर 6 से 12 प्रतिशत तक बताई जाती है। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। बड़ी संख्या में मामलों में रिपोर्ट नहीं होने से वास्तविक आंकड़े और अधिक हो सकते हैं।
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