2010 के दुष्कर्म के आरोपी की बदली सजा: पटना हाईकोर्ट ने अब लज्जा भंग के मामले में दोषी माना
यह मामला 8 फरवरी 2010 की रात हुई एक घटना से जुड़ा है। बेगूसराय की निचली अदालत ने 29 जुलाई 2013 को आरोपी को दुष्कर्म का दोषी ठहराया था। उसे चार साल जेल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अभियोजन ने क्या आरोप लगाए थे
अभियोजन के मुताबिक, घटना 8 फरवरी 2010 की रात करीब 10 बजे हुई थी। आरोप था कि मोहम्मद ऐनुल हक महिला की झोपड़ी में घुसा। उसने महिला के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की।
हालांकि, महिला की चीख-पुकार सुनकर 10 से 15 ग्रामीण मौके पर पहुंचे। ग्रामीणों ने आरोपी को पकड़ा। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि उपलब्ध सबूत दुष्कर्म का अपराध साबित करने के लिए काफी नहीं थे।
निचली अदालत ने क्या फैसला दिया था
बेगूसराय की निचली अदालत ने 29 जुलाई 2013 को इस मामले में फैसला सुनाया था। अदालत ने मोहम्मद ऐनुल हक को एक विधवा से दुष्कर्म का दोषी माना था। उसे चार साल जेल की सजा और जुर्माना लगाया गया था।
आरोपी ने इस फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान घटना से जुड़े गवाहों के बयान और सबूतों पर विचार किया गया। इसके बाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म की सजा को बदल दी।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान महिला को छोड़कर बाकी गवाह अपने पहले के बयानों से पलट गए थे। अभियोजन पक्ष दुष्कर्म साबित करने के लिए मेडिकल सबूत भी पेश नहीं कर सका। रिकॉर्ड में चोट या खरोंच से जुड़ा कोई मेडिकल सबूत नहीं था। महिला के कपड़े फटे या अस्त-व्यस्त होने जैसा कोई फिजिकल एविडेंस भी नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा कि महिला की गवाही को सही मानने पर भी दुष्कर्म साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे। कोर्ट के मुताबिक, उपलब्ध सबूत बिना इजाजत घर में घुसने और महिला पर हमला करने की ओर इशारा करते थे।
इसी आधार पर कोर्ट ने दुष्कर्म की दोषसिद्धि बदलकर महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला करने का दोष माना।
हाईकोर्ट ने किन फैसलों का हवाला दिया
जस्टिस संदीप कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के दो पुराने फैसलों का भी हवाला दिया है। इनमें अमन कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2004) और रूपन देओल बजाज बनाम केपीएस गिल (1995) शामिल हैं।
ये फैसले यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अपराध की श्रेणी और सही कानूनी धारा तय करने से संबंधित हैं। हालांकि, इस मामले में हाईकोर्ट ने किन खास बातों के लिए इन फैसलों का सहारा लिया, इसकी पूरी जानकारी मूल आदेश से देखना जरूरी है।
आरोपी को अब क्या सजा मिली
हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में बदलाव किया। आरोपी मोहम्मद ऐनुल हक को अब दुष्कर्म के बजाय महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमला करने का दोषी माना गया है।
कोर्ट ने उस पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। यह रकम तीन सप्ताह के अंदर महिला को देने का निर्देश दिया गया है। निचली अदालत ने आरोपी को चार साल जेल की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने दुष्कर्म की सजा को बदल दी है।
आगे क्या देखना होगा
राज्य सरकार या महिला हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देती हैं या नहीं। कानून के तहत हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
इसके साथ यह भी देखना होगा कि जुर्माने की 25 हजार रुपए की रकम महिला को तीन सप्ताह के अंदर मिलती है या नहीं। फैसले की पूरी कॉपी से जेल की सजा और कोर्ट के तर्कों की भी पुष्टि की जा सकेगी।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह मामला दिखाता है कि अदालतें सबूतों और गवाहों के बयानों के आधार पर फैसला करती हैं। इस मामले में महिला को छोड़कर बाकी गवाह अपने बयानों से पलट गए थे। मेडिकल या दूसरे फिजिकल एविडेंस भी पेश नहीं किए गए थे।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने दुष्कर्म की सजा को बदल दिया। हालांकि, इस फैसले को हर मामले पर लागू नहीं माना जा सकता। हर मामले में कोर्ट उपलब्ध सबूतों और परिस्थितियों के आधार पर फैसला करती है।
FAQs
- हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के मामले में क्या फैसला दिया?
हाईकोर्ट ने आरोपी मोहम्मद ऐनुल हक को दुष्कर्म के बजाय महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से हमले का दोषी ठहराया और उस पर 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। - निचली अदालत ने इस मामले में क्या सजा दी थी?
निचली अदालत ने 29 जुलाई 2013 को मोहम्मद ऐनुल हक को चार साल की जेल और जुर्माने की सजा दी थी। - इस फैसले के खिलाफ आगे क्या विकल्प हैं?
राज्य सरकार या महिला हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दे सकती हैं, और इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।