हर साल जांची जाएगी सैनिकों की मर्दानगी, इस देश की सेना का अनोखा फरमान

Sanjay Dhiman | Jul 18, 2026, 19:54 IST
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अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने 30 साल से ऊपर सभी सैनिकों के लिए सालाना टेस्टोस्टेरोन जांच अनिवार्य कर दी है। डॉक्टरों की गाइडलाइन इसका समर्थन नहीं करती।

सेना में अब हार्मोन की भी जांच एक टेस्ट, हर साल। उम्र 30 पार करते ही अनिवार्य। यह कोई फिटनेस टेस्ट नहीं है। यह टेस्टोस्टेरोन की जांच है। और यह अब अमेरिका की सेना के हर सक्रिय सैनिक की सालाना मेडिकल जांच का हिस्सा बन गई है।



समझें क्या है मामला

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने 15 जुलाई को यह नीति घोषित की। यह नीति 30 साल और उससे ऊपर के सभी सक्रिय सैनिकों पर लागू होगी। जिन सैनिकों में टेस्टोस्टेरोन की कमी मिलेगी, उन्हें आगे इलाज कराना है या नहीं, यह उनकी अपनी मर्जी होगी। 30 साल से कम उम्र के सैनिक चाहें तो स्वेच्छा से यह टेस्ट करा सकते हैं। लेकिन डॉक्टरों की मौजूदा गाइडलाइन बिना लक्षण वाले लोगों की ऐसी जांच की सलाह नहीं देती।



यह आपसे क्यों जुड़ा है?

आप सैनिक नहीं हैं, फिर भी यह खबर आपके काम की है। यह इस बात की मिसाल है कि सरकारें स्वास्थ्य नीति कैसे बनाती हैं, कभी वैज्ञानिक सबूत के आधार पर, तो कभी राजनीतिक मंशा के आधार पर। और अगर कल किसी और देश की सेना या कंपनी ऐसी ही नीति अपनाए, तो बहस वही रहेगी।



पहले क्या था- Background

अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग HHS (Health and Human Services) पहले ही टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी यानी TRT पर लगी कुछ पाबंदियां हटाने की तैयारी में था। इसी बीच यह नई सैन्य नीति आई है।



सेना में हार्मोन को लेकर विवाद नया नहीं है। एक साल पहले एक रंगरूट की मौत के बाद नेवी ने टेस्टोस्टेरोन से जुड़े पदार्थों की जांच के लिए ड्रग टेस्टिंग प्रोग्राम शुरू किया था। यानी टेस्टोस्टेरोन सेना के अंदर पहले से भी एक संवेदनशील विषय रहा है।



क्या हुआ और क्यों- Core Explanation

टेस्टोस्टेरोन पुरुषों का मुख्य सेक्स हार्मोन है। यह मांसपेशियों, हड्डियों, यौन क्षमता और मूड को प्रभावित करता है। उम्र के साथ इसका स्तर घटता है। यह एक सामान्य प्रक्रिया है, बीमारी नहीं।



एंडोक्राइन सोसाइटी की गाइडलाइन साफ कहती है, बिना लक्षण वाले स्वस्थ पुरुषों की टेस्टोस्टेरोन जांच जरूरी नहीं। कमी का पता तभी लगाना चाहिए जब लक्षण मौजूद हों और लगातार दो जांचों में स्तर कम आए। लेकिन Pentagon की नई नीति इस सिद्धांत को पलट देती है। यहां उम्र देखकर टेस्ट होगा, लक्षण देखकर नहीं।



सोचिए एक बार। एक 30 साल का पूरी तरह स्वस्थ सैनिक, बिना किसी शिकायत के, हर साल हार्मोन टेस्ट कराएगा। क्यों? क्योंकि उम्र 30 हो गई। यही वजह है कि अमेरिकन यूरोलॉजिकल एसोसिएशन (AUA) भी सिर्फ एक लैब रिजल्ट के आधार पर कमी की पुष्टि करने के खिलाफ सलाह देती है।



एक आंकड़ा ध्यान से देखिए। हेगसेथ के दफ्तर से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक 30 से 79 साल के करीब 5.6 प्रतिशत पुरुषों में ही टेस्टोस्टेरोन की कमी पाई जाती है। यानी बाकी 94 प्रतिशत के लिए यह सालाना टेस्ट सिर्फ एक औपचारिकता बन जाएगा।



PBS न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार Pentagon ने यह भी नहीं बताया कि इस नीति के पीछे कौन सी रिसर्च या अकादमिक अध्ययन आधार बना। सवाल पूछे जाने पर विभाग ने सिर्फ हेगसेथ के बयान की ओर इशारा किया।



कौन-कौन involved है

रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ इस नीति के मुख्य चेहरे हैं। वे इसे सैनिकों की "readiness" और "lethality" से जोड़ रहे हैं। दूसरी तरफ एंडोक्राइन सोसाइटी और AUA जैसे मेडिकल संगठन हैं, जो लक्षण-आधारित जांच पर जोर देते हैं। डेमोक्रेटिक सांसद और LGBTQ+ अधिकार समूह इस नीति पर सवाल उठा रहे हैं।



दोनों sides की बात

Pentagon का पक्ष यह है कि यह पहल सैनिकों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए है, और इलाज पूरी तरह वैकल्पिक रखा गया है। हेगसेथ का कहना है कि इससे सैनिक अपने "बेहतरीन रूप" में काम कर पाएंगे।



लेकिन मेडिकल विशेषज्ञों का एक तबका मानता है कि बिना लक्षण वाली जांच से overdiagnosis और अनावश्यक इलाज का खतरा बढ़ सकता है। वहीं कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि इससे पहले से मौजूद, लेकिन अनदेखी की गई कमी पकड़ में आ सकती है। दोनों राय अपनी जगह वैध हैं, और अभी तक कोई निर्णायक क्लिनिकल सबूत इनमें से किसी एक पक्ष को पूरी तरह सही साबित नहीं करता।



राजनीतिक आलोचकों का कहना है कि यह नीति एक विरोधाभास दिखाती है। एक तरफ सेना ट्रांसजेंडर सैनिकों को जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी से रोकती है, दूसरी तरफ बाकी सैनिकों के लिए हार्मोन थेरेपी को बढ़ावा देती है।



सरकार का आधिकारिक तर्क

हेगसेथ के बयान से जो मंशा दिखती है वो सीधी है। सैनिकों की "readiness" और "lethality" बढ़ाना। उनका कहना है कि टेस्टोस्टेरोन का सही स्तर सैनिक को शारीरिक रूप से बेहतर बनाता है, और यह कदम एक व्यापक "warrior health" एजेंडे का हिस्सा है। यही टीम HHS में TRT पर पाबंदियां ढीली करने की भी वकालत कर चुकी है।



यानी एक व्यापक वैचारिक झुकाव दिख रहा है, टेस्टोस्टेरोन स्क्रीनिंग को उम्र बढ़ने से जुड़ी कमजोरी नहीं, बल्कि एक "ऑप्टिमाइज़ करने लायक" चीज़ मानने का।



आलोचकों की व्याख्या

यहीं से मामला पलटता है। डेमोक्रेटिक सांसद और LGBTQ+ समूह इसे एक वैचारिक विरोधाभास बताते हैं। एक तरफ सेना ट्रांसजेंडर सैनिकों को जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी से रोकती है। दूसरी तरफ बाकी सभी पुरुष सैनिकों के लिए टेस्टोस्टेरोन थेरेपी को बढ़ावा देती है। उनका तर्क है कि यह एक खास तरह की "मर्दानगी" की परिभाषा को सरकारी नीति के जरिए बढ़ावा देने जैसा है।



PBS की रिपोर्ट का एक अहम बिंदु

Pentagon ने यह भी नहीं बताया कि किस रिसर्च या डेटा के आधार पर यह फैसला लिया गया। जब सवाल पूछा गया तो जवाब सीधे हेगसेथ के बयान की तरफ मोड़ दिया गया। यह पारदर्शिता की कमी ही है जो आलोचकों को यह कहने का मौका देती है कि यह फैसला विज्ञान से कम, विचारधारा से ज्यादा प्रेरित है।



सच यह है कि दोनों व्याख्याएं फिलहाल अनुमान पर टिकी हैं, क्योंकि Pentagon ने अपनी असली प्रेरणा का कोई दस्तावेजी आधार सार्वजनिक नहीं किया।


आगे क्या होगा



Pentagon ने अभी तक यह नहीं बताया कि 30 साल की उम्र सीमा क्यों चुनी गई। आने वाले महीनों में यह देखना जरूरी होगा कि कितने सैनिक TRT का विकल्प चुनते हैं, और क्या इससे जुड़े दुष्प्रभाव सामने आते हैं। कांग्रेस में इस पर सुनवाई हो सकती है।



एक बात जो आप नहीं जानते थे

FDA ने टेस्टोस्टेरोन उत्पादों को सिर्फ उन पुरुषों के लिए मंजूरी दी है जिनमें मेडिकल कारणों से हार्मोन कम बनता है। उम्र बढ़ने से जुड़ी सामान्य गिरावट के लिए इसे मंजूरी नहीं मिली है। यानी अगर टेस्ट में हल्की कमी भी दिखे, तो इलाज कानूनन उतना सीधा नहीं जितना लगता है।



यह खबर क्यों जरूरी है?

यह नीति स्वास्थ्य विज्ञान और सरकारी अधिकार के बीच के तनाव को दिखाती है। जब कोई सरकारी संस्था मेडिकल गाइडलाइन से हटकर फैसला लेती है, तो यह पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल बन जाता है। सैनिकों की सहमति और निजता का अधिकार भी इसमें शामिल है, भले ही यह अमेरिकी संदर्भ में हो। लोकतांत्रिक निगरानी और नीति-निर्माण में वैज्ञानिक सबूत की भूमिका, दोनों यहां दांव पर हैं।



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